Film Review : थ्रिलर और रोमांच से भरपूर है ''बाज़ार''
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Oct 2018 1:33 PM
II उर्मिला कोरी II फ़िल्म: बाजार निर्देशक: गौरव चावला कलाकार: सैफ अली खान,रोहन मेहरा,राधिका आप्टे,चित्रांगदा सिंह और अन्य रेटिंग: तीन ‘बाज़ार’ शेयर बाज़ार के उतार चढ़ाव और दांव पेंच की कहानी है जिसे शकुन कोठारी (सैफ अली खान) और रिजवान अहमद (रोहन मेहरा) के किरदारों के ज़रिए कहा गया है. शकुन बिजनेस टायकून है. शकुन […]
II उर्मिला कोरी II
फ़िल्म: बाजार
निर्देशक: गौरव चावला
कलाकार: सैफ अली खान,रोहन मेहरा,राधिका आप्टे,चित्रांगदा सिंह और अन्य
रेटिंग: तीन
‘बाज़ार’ शेयर बाज़ार के उतार चढ़ाव और दांव पेंच की कहानी है जिसे शकुन कोठारी (सैफ अली खान) और रिजवान अहमद (रोहन मेहरा) के किरदारों के ज़रिए कहा गया है. शकुन बिजनेस टायकून है. शकुन को पैसा कमाना है. इसके लिए वह गलत करने से भी नहीं झिझकता है. पैसा ही उसके लिए सबसे सही है।वह महत्वाकांक्षी युवाओं का भी अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करने से नहीं चूकता. इलाहाबाद (फ़िल्म के बनते हुए इलाहाबाद का नाम प्रयागराज नहीं हुआ था) से मुम्बई आया रिजवान का आदर्श शकुन है. वह शकुन के साथ काम करना चाहता है.
रिजवान इमोशन से काम करता है और शकुन फायदे के गणित से ऐसे में जब ये दोनों साथ में काम करेंगे तो क्या होगा. क्या एक बार फिर शकुन एक महत्वाकांक्षी युवा का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर पाएगा।यही फ़िल्म की कहानी है.
फ़िल्म की कहानी कॉरपोरेट कल्चर और शेयर बाजार के दुनिया के इर्द गिर्द बुनी गयी है. निर्देशक गौरव ने बखूबी यह दुनिया रची है. फ़िल्म के अंदर रोमांच और सस्पेंस का तड़का बखूबी लगाया गया है.
फ़िल्म की कहानी में इंटरवल के बाद थोड़ी भटकी हुई लगती है. उसे थोड़ा दुरुस्त किया जा सकता है।फ़िल्म शेयर बाजार के बाज़ार को सिंपल तरीके से समझाती है. जिससे फ़िल्म का विषय आम न होने के बावजूद आप उससे कनेक्ट हो जाते हैं.
अभिनय की बात करें तो सैफ अली खान ने शकुन कोठारी की भूमिका पूरे रुआब और रुतबे के साथ निभाया है. गुजराती बोलने से लेकर उनकी कुटिल मुस्कान सब प्रभाव छोड़ती है. नवोदित अभिनेता रोहन मेहरा अपने अभिनय से उम्मीद जगाते हैं. राधिका आप्टे भी अपने किरदार में पूरी तरह से रची बसी हैं. चित्रांगदा के लिए फ़िल्म में करने को कुछ खास नहीं था.
फ़िल्म के गीत संगीत औसत हैं अगर वह न होते तो कहानी और ज़्यादा प्रभावी बन सकती थी. फ़िल्म के संवाद अच्छे बन पड़े हैं. वह फ़िल्म को एक अलग रफ्तार देते हैं. फ़िल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा बन पड़ा है. कुलमिलाकर इस बाजार में ज़रूर एक बार जाना चाहिये.
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