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Right to Disconnect Law: ऑफिस समय के बाद कॉल या मैसेज का जवाब देना जरूरी नहीं… जानिए क्या है 'राइट टू डिस्कनेक्ट' बिल!

Updated at : 15 May 2024 10:31 AM (IST)
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Right to Disconnect: राइट टू डिस्कनेक्ट बिल दुनिया के 13 देशों में लागू किया जा चुका है. सबसे पहले इसकी शुरूआत फ्रांस से हुई. इसके अनुसार ऑफिस का समय खत्म होने के बाद इंप्लॉयज फोन बंद कर सकते हैं. इसके लिए कई देशों में कानून लागू किया गया है. अब इस कानून को लेकर भारत में चर्चा हो रही है.

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ऑफिस का समय खत्म होने के बाद अपने फोन और अन्य उपकरण को ऑफ भी कर सकते हैं.

Right to Disconnect: आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ का बैलेंस बुरी तरह बिगड़ गया है. सरकारी कर्मचारी हो या प्राइवेट, सब पर काम का प्रेशर बढ़ा है. वर्कर्स ऑफिस में नहीं होते हैं तब भी बहुत सारा काम घर से करना पड़ता है. अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर की 2023 की रिपोर्ट की मानें तो आधे से अधिक कर्मचारी (55%) का कहना है कि वे अपनी सामान्य ड्यूटी खत्म होने का बाद भी काम के ईमेल या अन्य मैसेज का जवाब देते हैं. कोरोना महामारी के बाद तेजी से वर्क फ्राम होम का कल्चर डेवलप हुआ है. लोगों का वर्क लाइफ बिगड़ गया है. यही कारण है कि दुनिया के कई देशों में वर्क-लाइफ बैलेंस को मेंटेन करने के इरादे से राइट टू डिस्कनेक्ट बिल लागू करने की मांग तेजी से बढ़ रही है. अभी अमेरिका के कैलिफोरनिया में राइट टू डिस्कनेक्ट बिल काफी चर्चा में है. वहीं, कुछ संगठन इस बिल का पुरजोर विरोध भी कर रहे हैं. भारत में भी इसी तरह का एक बिल 2018 में सांसद सुप्रिया सुले ने पेश किया था. हालांकि, यह प्राइवेट बिल था, जिस पर उस वक्त कोई चर्चा नहीं हुई.

राइट टू डिस्कनेक्ट बिल आखिर है क्या?, इसको लाने की जरूरत क्यों पड़ रही? कब से यह चर्चा में है? अगर यह बिल लागू हुआ तो किस तरह वर्क लाइफ लोगों की बदल जाएगी? इन सब सवालों इस एक्सप्लेनर में जानेंगे….

Right to Disconnect: अभी 13 देशों में लागू है बिल

2017 में फ्रांस में लागू होने के बाद ये बिल अब तक 13 देशों में लागू हो चुका है. कोरोना के पहले ही कई देश इसे लागू कर चुके हैं. हालांकि, कोरोना के बाद इसकी जरूरत ज्यादा बढ़ी. इस कानून को लोगों की नजर में आने का बीड़ा फ्रांस ने ही उठाया और सबसे पहले लागू किया. इसके तहत कंपनियों ने ऐसी व्यवस्था कायम की, जिससे कि ऑफिस समय के बाद ऑफिस से जुड़े कार्यों के लिए एक सिस्टम बनाया जा सके. इसके तहत अब कंपनी ऑफिस समय के बाद कर्मचारियों को किसी काम के लिए फोर्स नहीं कर सकती. आयरलैंड में यह कानून 2021 में लागू हुआ था और उसके बाद यह लक्जमबर्ग में लागू किया गया.अर्जेंटीना, चिली, मैक्सिको और यूक्रेन का राइट टू डिस्कनेक्ट मुख्य रूप से उन कर्मचारियों पर लागू होता है जो दूर से, घर पर या टेलीवर्कर के रूप में काम करते हैं. ग्रीस ने 3 दिसंबर, 2022 को एक घरेलू कानून स्थापित करके इसे एक कदम आगे बढ़ाया, जिसके तहत टेलीवर्कर्स को गैर-कार्य घंटों और छुट्टियों के दौरान काम देने से पूरी तरह से दूर रहना होगा.

Right to Disconnect: भारत में लाने की हुई थी कोशिश

भारत में एक बार इस बिल को लाने की कोशिश हुई थी. 6 साल पहले सांसद सुप्रिया सुले ने ऐसा बिल संसद में प्रस्तुत किया था. भारत में राइट टू डिक्यों है बिल की जरूरत सकनेक्ट बिल एक प्राइवेट मेंबर के रूप में पेश किया गया था. 2018 में इस बिल को प्रस्तुत करने के बाद कभी भी इस बिल पर चर्चा नहीं हुई.

Right to Disconnect: क्यों है बिल की जरूरत

इस बिल की जरूरत कर्मचारियों को तब ज्यादा पड़ने लगी, जब उनके हेक्टिक ऑफिस हावर्स के बाद भी लगातार कनेक्टेड रहना पड़ता था और कंपनी लगातार उन्हें संपर्क करती रहती थी. कुछ कर्मचारियों ने इसे लेकर बुली की भी शिकायत की जिसके बाद इस कानून की जरूरत बढ़ गई. 2021 में इटली ने स्मार्ट वर्किंग का कॉनसेप्ट लाया, जिसके बाद इसपर कोई कानूनी नियम नहीं बना. दिसंबर 2021 में पुर्तगाल ने नियोक्ताओं के लिए काम के घंटे के बाद बाहर संपर्क करने से बचने के लिए इसकी पेशकश की. स्वीडन, नीदरलैंड, जर्मनी और डेनमार्क सहित कई देशों में कर्मचारियों के डिस्कनेक्ट करने के अधिकार के बारे में कोई विशिष्ट नियम नहीं है. काम के घंटों के बाहर भी काम आम बात नहीं है.

Right to Disconnect: कानून का है विरोध

जब कानून की बात होने लगी और इसे लागू करने के लिए चर्चाएं हुईं, तो इसके लिए कई विरोध सामने आए. कुछ मैनेजमेंट गुरुओं का मानना है कि ऐसे कानून को अगर लागू किया गया तो नौकरी के संबंध में दिक्कतें आएंगी. ऐसी नौकरियों के संबंध में दिक्कतें हो सकती हैं, जिनमें आपातकालीन सेवाओं की आवश्यकता होती है या जहां मानव जीवन शामिल होता है. जैसे एक चिकित्सा व्यवसायी की नौकरी. कई उद्योगों में कार्य प्रवाह एक मूल्य श्रृंखला के साथ जुड़ा हुआ है, जो विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में फैला हुआ है. इससे ग्राहक या ग्राहकों की अपेक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया जा सकता, जिससे ग्राहकों के बाहर होने की संभावना हो सकती है. दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलिया के राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2024 की आलोचना करते हुए ऑस्ट्रेलिया के चैंबर्स के सीईओ के एक संयुक्त बयान में सीनेट से इस बिल पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया. तर्क दिया कि इससे बढ़ते व्यवसायों को नुकसान होगा. हालांकि, अतिरिक्त घंटे काम कराने को लेकर मौजूदा कानून को सही से लागू करने की जरूरत है.

Right to Disconnect: क्या भारत में अपनाई जा सकती है नीति

इस मसले पर जब हमने मैनेजमेंट कंपनियों और कॉरपोरेट जगत के लॉयर्स से बात की तो पता चला कि भारत में इसे लेकर लोग अलग-अलग तरीके से सोचते हैं. इस मामले में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि क्या भारत में इस नीति को अपनाया जा सकता है. इसे लेकर दो गुट हैं. एक पक्ष इसे सही बताता है, जिसके अनुसार यह पेशेवर और व्यक्तिगत जीवन में एक बैलेंस बनाने के लिए जरूरी है, जिससे लोगों को अपने काम के लिए वक्त मिल जाएगा. बढ़ती तकनीक के साथ 24 घंटे की कनेक्टविटी ने कर्मचारियों के जीवन में एक अलग प्रेशर और तनाव पैदा किया है.

वहीं जब इसे लेकर मैनेजमेंट टीम से बात की गई तो उनका कहना है कि भारत जैसे देश के लिए अभी ये नीति सही नहीं है. ऑस्ट्रेलिया या दूसरे प्रगतिशील देशों के बीच यह नीति अच्छी हो सकती है, लेकिन फिलहाल भारत के लिए ये वाजिब नहीं है. भारत जिस आकांक्षा के साथ आगे बढ़ रहा है, वैसे में अभी इसको अन्य देशों की तुलना में अधिक श्रम करने की जरूरत है.

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Neha Singh

लेखक के बारे में

By Neha Singh

Neha Singh is a contributor at Prabhat Khabar.

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