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रतन टाटा से 55 साल छोटा दोस्त, जिन्होंने अंतिम समय तक की देखभाल

Updated at : 10 Oct 2024 1:09 PM (IST)
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रतन टाटा से 55 साल छोटा दोस्त, जिन्होंने अंतिम समय तक की देखभाल

रतन टाटा का नन्हा मित्र शांतनु नायडू

Ratan Tata Friend: शांतनु नायडु का रतन टाटा से जुड़ाव की भी दिलचस्प कहानी है. इन दोनों की दोस्ती की शुरुआत साल 2014 से हुई. इन दोनों के बीच जानवरों के प्रति प्रेम की वजह से दोस्ती पनपी.

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Ratan Tata Friend: देश के सबसे बड़े परोपकारी और दानदाता उद्योगपति एवं टाटा संस के मानद चेयरमैन रतन टाटा अब हमारे बीच नहीं रहे. वे सशरीर हमारे बीच भले ही नहीं रहे, लेकिन देश और देश के लोगों के प्रति किए गए उनके सहरानीय कार्य हमारे साथ जरूर रहेंगे. वे हमेशा याद किए जाते रहेंगे. रतन टाटा के जीवन से जुड़ी कई रोचक कहानियां हैं, जिनमें से एक 55 साल छोटे दोस्त की कहानी भी है. रतन टाटा भारत के ऐसे परोपकारी उद्योगपति थे, जिन्हें दुनिया सलाम करती थी. इतने बड़े परोपकारी उद्योगपति होने के बावजूद उन्होंने अपनी उम्र से करीब 55 साल छोटे युवक शांतनु नायडू के दोस्ती की थी. वे शांतनु से बिजनेस की सलाह लेते थे. शांतनु नायडू हमेशा रतन टाटा के सहायक बनकर रहे और आखिरी सांस तक उनकी देखभाल करते रहे. आइए, उस युवक शांतनु नायडू के बारे में जानते हैं, जिन्हें रतन टाटा ने अपना दोस्त बनाया हुआ था.

रतन टाटा के साथ साए की तरह रहते थे शांतनु

रतन टाटा के मैनेजर माने जाने वाले शांतनु नायडू उनके साथ साए की तरह रहते हैं. इन दोनों की दोस्ती के साथ ही डॉग की देखभाल के प्रति कोशिश और मुहिम के बारे में दुनिया वाकिफ है. शांतनु ने अपना खुद का स्टार्टअप गुडफेलोज की भी शुरुआत की है, जिसमें रतन टाटा ने निवेश किया है. गुडफेलोज बुजुर्गों की देखभाल करता है.

रतन टाटा के मित्र शांतनु ने भी की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई

रतन टाटा का 31 वर्षीय शांतनु नायडु खास जुड़ाव रहा है, लेकिन रतन टाटा का उनसे कोई पारिवारिक संबंध नहीं रहा है. रतन टाटा ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर खुद फोन करके कहा था कि मेरे असिस्टेंट बनोगे. शांतनु नायडू मुंबई के रहने वाले हैं. शांतनु नायडू का जन्म 1993 में पुणे महाराष्ट्र में हुआ था. शांतनु नायडू रतन टाटा को स्टार्टअप्स में निवेश का बिजनेस टिप्स देते थे. 31 साल के शांतनु नायडू ने भी कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से एमबीए की पढ़ाई की है, जिससे रतन टाटा ने वास्तुकला में स्नातक की डिग्री हासिल की थी. टाटा ग्रुप में जनरल मैनेजर के रूप में कार्यरत शांतनु रतन टाटा के काफी करीबी माने जाते हैं और अक्सर उनके साथ देखे जाते हैं. इतना ही नहीं, शांतनु नायडू अपने बॉस रतन टाटा को निवेश संबंधी सलाह भी देते रहते हैं.

टाटा ट्रस्ट के डिप्टी जेनरल मैनेजर हैं शांतनु नायडू

मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, शांतनु नायडू टाटा ट्रस्ट के डिप्टी जेनरल मैनेजर के रूप में देश भर में काफी लोकप्रिय हैं. वह एक प्रसिद्ध भारतीय व्यवसायी, इंजीनियर, जूनियर असिस्टेंट, डीजीएम, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, लेखक और उद्यमी हैं. शांतनु नायडू ने बिजनेस इंडस्ट्री में एक ऐसा मुकाम हासिल किया है, जिसे पाने के लिए कई लोग हमेशा सपना देखते रहते हैं.

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शांतनु के फेसबुक पोस्ट पढ़कर प्रभावित हुए थे रतन टाटा

शांतनु नायडु का रतन टाटा से जुड़ाव की भी दिलचस्प कहानी है. इन दोनों की दोस्ती की शुरुआत साल 2014 से हुई. इन दोनों के बीच जानवरों के प्रति प्रेम की वजह से दोस्ती पनपी. मुंबई में रात को सड़कों पर आवारा कुत्तों को गाड़ियों की टक्कर से बचाने के लिए रिफ्लेक्टिव कॉलर बनाए थे. इस पर शांतनु ने फेसबुक पर लंबे पोस्ट लिखे थे. रतन टाटा ने शांतनु नायडू के एक फेसबुक पोस्ट पढ़ने के बाद उनकी पहल से प्रभावित होकर उनके लिए काम करने के लिए आमंत्रित किया. फेसबुक पोस्ट में शांतनु ने आवारा कुत्तों के लिए रिफ्लेक्टर के साथ बनाए गए डॉग कॉलर के बारे में लिखा था, ताकि ड्राइवर उन्हें मुंबई की सड़कों पर देख सकें. उनके लिंक्डइन प्रोफाइल के मुताबिक शांतनु जून 2017 से टाटा ट्रस्ट के डिप्टी जेनरल मैनेजर के तौर पर काम कर रहे हैं. इसके अलावा, शांतनु नायडू ने टाटा एलेक्सी में डिजाइन इंजीनियर के तौर पर भी अपनी सेवाएं दी हैं.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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