आधा भारत नहीं जानता है Pink Tax, जान जाएगा तो समझदारी से खरीदारी करेगा

Pink Tax
Pink Tax: पिंक टैक्स कोई सरकारी टैक्स नहीं है जिसे सरकार वसूलती हो. दरअसल, यह कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली एक कीमत निर्धारण रणनीति (Pricing Strategy) है.
Pink Tax: क्या आपने कभी गौर किया है कि बाजार में एक ही तरह के सामान के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक कीमत चुकानी पड़ती है? चाहे वह शेविंग रेजर हो, परफ्यूम हो या फिर ड्राई क्लीनिंग की सर्विस. अक्सर ‘पिंक’ यानी गुलाबी रंग या महिलाओं के लिए बनी पैकेजिंग वाली चीजों के दाम ज्यादा होते हैं. अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ही ‘पिंक टैक्स’ (Pink Tax) कहा जाता है.
पिंक टैक्स असल में क्या है ?
पिंक टैक्स कोई सरकारी टैक्स नहीं है जिसे सरकार वसूलती हो. दरअसल, यह कंपनियों द्वारा अपनाई जाने वाली एक कीमत निर्धारण रणनीति (Pricing Strategy) है. इसके तहत कंपनियां एक जैसे उत्पादों और सेवाओं के लिए महिलाओं से पुरुषों के मुकाबले 7% से लेकर 15% तक ज्यादा पैसे वसूलती हैं. बस फर्क इतना होता है कि महिलाओं के उत्पाद अक्सर गुलाबी रंग के होते हैं या उनकी खुशबू और मार्केटिंग थोड़ी अलग होती है.
पिंक टैक्स हमारे रोजमर्रा के जीवन में हर जगह मौजूद है.
- पर्सनल केयर प्रोडक्ट : एक ही कंपनी का पुरुषों वाला ‘ब्लू रेजर’ सस्ता होता है, जबकि वही रेजर गुलाबी रंग में ‘महिलाओं के लिए’ टैग के साथ महंगा बिकता है. यही हाल शैम्पू, साबुन और डियोड्रेंट का भी है.
- कपड़े और एक्सेसरीज: महिलाओं के कपड़ों की सिलाई, कपड़े की बनावट और स्टाइल के नाम पर अक्सर पुरुषों के साधारण कपड़ों से ज्यादा पैसे लिए जाते हैं.
- सेवाएं (Services): सैलून में महिलाओं के ‘हेयरकट’ की कीमत पुरुषों के मुकाबले कहीं ज्यादा होती है, भले ही बाल छोटे ही क्यों न हों. इसके अलावा, महिलाओं के कपड़ों की ड्राई क्लीनिंग भी अक्सर महंगी होती है.
- बच्चों के खिलौने: रिसर्च में पाया गया है कि लड़कियों के लिए बने गुलाबी खिलौने, लड़कों के लिए बने वैसे ही समान खिलौनों से महंगे होते हैं.
यह क्यों गलत है ?
पिंक टैक्स भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह सीधे तौर पर महिलाओं की आर्थिक स्थिति पर प्रहार करता है. इसे ‘जेंडर-बेस्ड प्राइसिंग’ भी कहते हैं. विडंबना यह है कि दुनिया भर में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है (Gender Pay Gap), लेकिन उन्हें बुनियादी जरूरतों के लिए अधिक भुगतान करना पड़ता है.
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लेखक के बारे में
By Abhishek Pandey
अभिषेक पाण्डेय पिछले तीन वर्षों से प्रभात खबर में डिजिटल जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहे हैं। वे बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं। शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, MSME, कृषि और इंडस्ट्री जैसे विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे रिसर्च के साथ ऐसी खबरें और एक्सप्लेनर तैयार करते हैं, जिन्हें आम लोग भी आसानी से समझ सकें। इसके अलावा यूटिलिटी न्यूज और सक्सेस स्टोरीज लिखने में भी उनकी खास रुचि है।
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अभिषेक ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से की है, जिसे पत्रकारिता की दुनिया में 'दादा माखनलाल की बगिया' भी कहा जाता है।
करियर की शुरुआत उन्होंने राजस्थान पत्रिका के साथ की, जहां उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को करीब से समझा। इसके बाद वे प्रभात खबर से जुड़े और पिछले तीन वर्षों से डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में काम कर रहे हैं।
इस दौरान उन्होंने बिजनेस, शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, कृषि, MSME और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग और रिसर्च आधारित लेख लिखे हैं। इसके अलावा वे वीडियो स्क्रिप्टिंग, एक्सप्लेनर स्टोरी, डेटा स्टोरी और डिजिटल कंटेंट पर भी लगातार काम करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि जटिल आर्थिक और वित्तीय विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाया जाए।
शिक्षा
अभिषेक पाण्डेय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने रिपोर्टिंग, डिजिटल मीडिया, न्यूज़ राइटिंग, वीडियो प्रोडक्शन और मल्टीमीडिया जर्नलिज्म की बारीकियां सीखीं, जिनका इस्तेमाल वे आज अपनी पत्रकारिता में कर रहे हैं।
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