पति की मौत के 29 साल बाद विधवा को मिलेगा ₹10 करोड़ का क्लेम, इंश्योरेंस कंपनियों की मनमानी पर कोर्ट का चाबुक!

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Insurance : जयपुर के कारोबारी किशोरी लाल की 1997 में एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी. बीमा कंपनी के चक्कर काटने के बाद, अब राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग ने पत्नी के हक में बड़ा फैसला सुनाया है.

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Insurance : अक्सर आपने देखा होगा कि इंश्योरेंस कंपनियां पॉलिसी बेचते समय बड़े-बड़े वादे करती हैं, लेकिन जब क्लेम देने की बारी आती है, तो चक्कर कटवाने शुरू कर देती हैं. लेकिन आज हम आपको एक ऐसे ऐतिहासिक मामले के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां एक बेबस परिवार ने बीमा कंपनी की मनमानी के खिलाफ पूरे 29 साल (लगभग 3 दशक) तक कानूनी लड़ाई लड़ी और आखिरकार जीत हासिल की.

राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी को आदेश दिया है कि वह जयपुर के एक दिवंगत व्यापारी की विधवा पत्नी आशा गर्ग और उनके परिवार को 10 करोड़ रुपये का क्लेम और उस पर 9 फीसदी की दर से ब्याज तुरंत चुकाए.

सड़क हादसा और ₹15 करोड़ का पूरा विवाद

यह मामला साल 1997 का है. जयपुर के एक बड़े कारोबारी किशोरी लाल शरण गर्ग 27 मार्च 1997 को जयपुर से दिल्ली जा रहे थे, तभी रास्ते में उनकी कार की एक ट्रक से आमने-सामने भीषण टक्कर हो गई और इस हादसे में उनकी मौत हो गई. किशोरी लाल ने अपने पीछे परिवार की सुरक्षा के लिए दो बड़ी पर्सनल एक्सीडेंट पॉलिसियां ले रखी थीं:

  • यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस: ₹10 करोड़ का कवर (पॉलिसी अवधि: फरवरी 1997 से फरवरी 1998)
  • नेशनल इंश्योरेंस: ₹5 करोड़ का कवर (पॉलिसी अवधि: जनवरी 1997 से जनवरी 1998)

पति की मौत के बाद जब परिवार ने क्लेम किया, तो दोनों बीमा कंपनियों ने सर्वेक्षकों, जांचकर्ताओं और जासूसी एजेंसियों को पीछे लगा दिया. कंपनियों ने आरोप लगाया कि किशोरी लाल ने अपनी वित्तीय पृष्ठभूमि और पुरानी पॉलिसियों से जुड़ी ‘महत्वपूर्ण जानकारी’ छिपाई है. इस बहाने का इस्तेमाल कर साल 2000 में दोनों कंपनियों ने क्लेम रिजेक्ट (खारिज) कर दिया.

पत्नी का 3 दशक का संघर्ष और सुप्रीम कोर्ट का मोड़

बीमा कंपनियों के इस रवैये से हार न मानते हुए मृतक की पत्नी आशा गर्ग ने राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया. साल 2005 में आयोग ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस के खिलाफ फैसला सुनाते हुए 10 करोड़ रुपये और 1 जुलाई 1997 से इस पर 9% ब्याज देने का आदेश दिया, लेकिन नेशनल इंश्योरेंस की 5 करोड़ वाली पॉलिसी के क्लेम को खारिज कर दिया. इसके बाद दोनों पक्ष इस फैसले को चुनौती देने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए.

जनवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उपभोक्ता आयोग के पुराने फैसले को रद्द किया और कहा कि इस हाई-प्रोफाइल मामले का फैसला सिर्फ कागजी हलफनामों पर नहीं होना चाहिए, बल्कि सबूतों और गवाहों के आधार पर नए सिरे से होना चाहिए. कोर्ट ने आयोग को आदेश दिया कि वह दोनों बीमा कंपनियों के सभी दफ्तरों से असली पॉलिसी प्रपोजल फॉर्म और अंदरूनी बातचीत के सारे रिकॉर्ड्स मंगवाए.

जब खुद बीमा कंपनी ही खो बैठी अपने सबूत!

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जब राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग में दोबारा सुनवाई शुरू हुई, तो मामला पूरी तरह पलट गया. पीड़ित परिवार के वकीलों ने कोर्ट में दलील दी कि बीमा कंपनी जिस ‘गलत जानकारी छिपाने’ का आरोप लगा रही है, वह असली प्रपोजल फॉर्म (कागज) तो दिखाए. चौंकाने वाली बात यह रही कि कोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बावजूद यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी वह प्रपोजल फॉर्म या डिस्पैच रजिस्टर ढूंढने में पूरी तरह नाकाम रही.

यानी कंपनी के पास अपने ही आरोपों को साबित करने का कोई लिखित सबूत नहीं था. सबूतों के अभाव और कंपनी की लापरवाही को देखते हुए एनसीडीआरसी के जस्टिस एपी शाही और प्रेसीडेंट भारत कुमार पाण्ड्या ने यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस को आदेश दिया कि वे पीड़ित परिवार को 10 करोड़ रुपये का क्लेम और पिछले 29 सालों का 9% ब्याज जल्द से जल्द दें. हालांकि, दूसरे पक्ष यानी नेशनल इंश्योरेंस का 5 करोड़ का क्लेम खारिज ही रहा.

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अभिषेक पाण्डेय

लेखक के बारे में

By अभिषेक पाण्डेय

अभिषेक पाण्डेय पिछले तीन वर्षों से प्रभात खबर में डिजिटल जर्नलिस्ट के तौर पर काम कर रहे हैं। वे बिजनेस और अर्थव्यवस्था से जुड़ी खबरों को आसान भाषा में पाठकों तक पहुंचाने का काम करते हैं। शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, MSME, कृषि और इंडस्ट्री जैसे विषयों पर उनकी अच्छी पकड़ है। वे रिसर्च के साथ ऐसी खबरें और एक्सप्लेनर तैयार करते हैं, जिन्हें आम लोग भी आसानी से समझ सकें। इसके अलावा यूटिलिटी न्यूज और सक्सेस स्टोरीज लिखने में भी उनकी खास रुचि है।

पत्रकारिता अनुभव

अभिषेक ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से की है, जिसे पत्रकारिता की दुनिया में 'दादा माखनलाल की बगिया' भी कहा जाता है।

करियर की शुरुआत उन्होंने राजस्थान पत्रिका के साथ की, जहां उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को करीब से समझा। इसके बाद वे प्रभात खबर से जुड़े और पिछले तीन वर्षों से डिजिटल जर्नलिस्ट के रूप में काम कर रहे हैं।

इस दौरान उन्होंने बिजनेस, शेयर बाजार, पर्सनल फाइनेंस, बैंकिंग, बजट, सरकारी योजनाएं, कृषि, MSME और अर्थव्यवस्था से जुड़े कई अहम विषयों पर रिपोर्टिंग और रिसर्च आधारित लेख लिखे हैं। इसके अलावा वे वीडियो स्क्रिप्टिंग, एक्सप्लेनर स्टोरी, डेटा स्टोरी और डिजिटल कंटेंट पर भी लगातार काम करते हैं। उनकी कोशिश रहती है कि जटिल आर्थिक और वित्तीय विषयों को आसान और भरोसेमंद भाषा में पाठकों और दर्शकों तक पहुंचाया जाए।

शिक्षा

अभिषेक पाण्डेय ने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय (MCU), भोपाल से पत्रकारिता एवं जनसंचार की पढ़ाई की है। यहां उन्होंने रिपोर्टिंग, डिजिटल मीडिया, न्यूज़ राइटिंग, वीडियो प्रोडक्शन और मल्टीमीडिया जर्नलिज्म की बारीकियां सीखीं, जिनका इस्तेमाल वे आज अपनी पत्रकारिता में कर रहे हैं।

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