Bihar: पांच साल, नौ सरकारें, बिहार की सियासत में अस्थिरता का वो दौर, हर कुछ महीनों में बदलती रही सत्ता की तस्वीर

Published by : Paritosh Shahi Updated At : 01 Nov 2025 7:55 PM

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बिहार विधान सभा

Bihar: 1967 से 1972 तक बिहार की राजनीति में ऐसा घमासान मचा कि सत्ता की कुर्सी किसी म्यूजिकल चेयर से कम नहीं लगी. कभी कांग्रेस का किला ढहा, कभी नए गठबंधन बने और पलभर में टूट गए. विचारधाराएं बदलीं, दोस्त दुश्मन बने और पहली बार बिहार दल-बदल की राजनीति का केंद्र बना.

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Bihar, सुरेंद्र किशोर: सन 1967 से 1972 तक बिहार ने राजनीतिक अस्थिरता का एक अभूतपूर्व दौर देखा. महज पांच साल की इस अवधि में राज्य में नौ सरकारें बनीं. इस दौरान भोला पासवान शास्त्री तीन बार मुख्यमंत्री बने. इसी अवधि में बिहार की सत्ता की बागडोर संभालने वाले अन्य नेताओं में महामाया प्रसाद सिन्हा, सतीश प्रसाद सिंह, बीपी मंडल, सरदार हरिहर सिंह, दारोगा प्रसाद राय और कर्पूरी ठाकुर शामिल थे.

सन 1969 में बिहार में पहली बार विधानसभा का मध्यावधि चुनाव कराना पड़ा. उस समय राजनीतिक अस्थिरता इस हद तक बढ़ चुकी थी कि किसी भी सरकार का कार्यकाल पूरा होना मुश्किल था. सतीश प्रसाद सिंह को मुख्य रूप से एक विशेष काम के लिए मुख्यमंत्री बनाया गया था. वह काम था, बीपी मंडल को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत करना. उन दिनों राजनीति में कुछ आदर्श बाकी थे. कोई भी मुख्यमंत्री खुद को विधान पार्षद मनोनीत नहीं करना चाहता था, इसलिए यह जिम्मेदारी सतीश प्रसाद सिंह को सौंपी गयी.

पहली बार टूटा कांग्रेस का एकाधिकार

सन 1967 में बिहार की सत्ता से कांग्रेस का एकाधिकार पहली बार टूटा. तब लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते थे. दिलचस्प बात यह रही कि एक साथ चुनाव होने के बावजूद जनता ने राज्य में कांग्रेस को अल्पमत में पहुंचा दिया, जबकि लोकसभा की 53 सीटों में से कांग्रेस ने 34 सीटें जीत लीं. कांग्रेस सरकार के शासनकाल में भ्रष्टाचार और सूखा-अकाल राहत कार्यों में विफलता को लेकर जनता में भारी आक्रोश था.

जब एक साथ सरकार में थे जनसंघ और कम्युनिस्ट

1967 में महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में गठित गैर-कांग्रेसी सरकार में भारतीय जनसंघ और सीपीआइ (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) दोनों दलों के सदस्य एक साथ शामिल हुए थे. यह देश के इतिहास में पहली और आखिरी बार हुआ.

शुरुआत में दोनों दल एक साथ सरकार में शामिल होने को तैयार नहीं थे, लेकिन डॉ राममनोहर लोहिया के हस्तक्षेप के बाद सहमति बनी. कुछ महीनों बाद दल-बदल की राजनीति ने इस सरकार को गिरा दिया. इससे पहले यह धारणा थी कि कम्युनिस्ट सत्ता के लिए दल नहीं बदलते, लेकिन यह मिथक भी टूट गया.

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दल-बदल की राजनीति का नया अध्याय

महामाया सरकार को गिराने के लिए करीब तीन दर्जन विधायकों ने दल बदल किया. इनमें सबसे अधिक संख्या सोशलिस्ट विधायकों की थी. सभी दलबदलुओं को बीपी मंडल मंत्रिमंडल में मंत्री बना दिया गया. यह पहली बार हुआ कि सरकार गिराने वाले सभी विधायक मंत्रिमंडल में शामिल कर लिए गए. तब तक दल-बदल विरोधी कानून अस्तित्व में नहीं आया था.

महामाया सरकार ने पिछली कांग्रेसी सरकारों के छह प्रमुख नेताओं के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित किया था. यह कदम भी बिहार की राजनीति में पहली बार उठाया गया था. लेकिन यही कदम बाद में सरकार के पतन का बड़ा कारण भी बना.

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Paritosh Shahi

लेखक के बारे में

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परितोष शाही पिछले 4 वर्षों से डिजिटल मीडिया और पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत राजस्थान पत्रिका से की और वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल की बिहार टीम का हिस्सा हैं. राजनीति, सिनेमा और खेल, विशेषकर क्रिकेट में उनकी गहरी रुचि है. जटिल खबरों को सरल भाषा में पाठकों तक पहुंचाना और बदलते न्यूज माहौल में तेजी से काम करना उनकी विशेषता है. परितोष शाही ने पत्रकारिता की पढ़ाई बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) से की. पढ़ाई के दौरान ही पत्रकारिता की बारीकियों को समझना शुरू कर दिया था. खबरों को देखने, समझने और लोगों तक सही तरीके से पहुंचाने की सोच ने शुरुआत से ही इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया. पत्रकारिता में करियर की पहली बड़ी शुरुआत बिहार विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान हुई, जब उन्होंने जन की बात के साथ इंटर्नशिप की. इस दौरान बिहार के 26 जिलों में जाकर सर्वे किया. यह अनुभव काफी खास रहा, क्योंकि यहां जमीनी स्तर पर राजनीति, जनता के मुद्दों और चुनावी माहौल को बहुत करीब से समझा. इसी अनुभव ने राजनीतिक समझ को और मजबूत बनाया. इसके बाद राजस्थान पत्रिका में 3 महीने की इंटर्नशिप की. यहां खबर लिखने की असली दुनिया को करीब से जाना. महज एक महीने के अंदर ही रियल टाइम न्यूज लिखने लगे. इस दौरान सीखा कि तेजी के साथ-साथ खबर की सटीकता कितनी जरूरी होती है. राजस्थान पत्रिका ने उनके अंदर एक मजबूत डिजिटल पत्रकार की नींव रखी. पत्रकारिता के सफर में आगे बढ़ते हुए पटना के जनता जंक्शन न्यूज पोर्टल में वीडियो प्रोड्यूसर के रूप में भी काम किया. यहां कैमरे के सामने बोलना, प्रेजेंटेशन देना और वीडियो कंटेंट की बारीकियां सीखीं. करीब 6 महीने के इस अनुभव ने कैमरा फ्रेंडली बनाया और ऑन-स्क्रीन प्रेजेंस को मजबूत किया. 1 अप्रैल 2023 को राजस्थान पत्रिका को प्रोफेशनल तौर पर ज्वाइन किया. यहां 17 महीने में कई बड़े चुनावी कवरेज में अहम भूमिका निभाई. लोकसभा चुनाव 2024 में नेशनल टीम के साथ जिम्मेदारी संभालने का मौका मिला. इसके अलावा मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान भी स्टेट टीम के साथ मिलकर काम किया. इस दौरान चुनावी रणनीति, राजनीतिक घटनाक्रम और बड़े मुद्दों पर काम करने का व्यापक अनुभव मिला. फिलहाल परितोष शाही प्रभात खबर डिजिटल बिहार टीम के साथ जुड़े हुए हैं. यहां बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान कई बड़ी खबरों को रियल टाइम में ब्रेक किया, ग्राउंड से जुड़े मुद्दों पर खबरें लिखीं और वीडियो भी बनाए. बिहार चुनाव के दौरान कई जिलों में गांव- गांव घूम कर लोगों की समस्या को जाना-समझा और उनके मुद्दे को जन प्रतिनिधियों तक पहुंचाया. उनकी कोशिश हमेशा यही रहती है कि पाठकों और दर्शकों तक सबसे पहले, सही और असरदार खबर पहुंचे. पत्रकारिता में लक्ष्य लगातार सीखते रहना, खुद को बेहतर बनाना और भरोसेमंद पत्रकार के रूप में अपनी पहचान मजबूत करना है.

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