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रामचरित मानस का नागपुरी में अनुवाद करने वाले झारखंड रत्न 'नहन' नहीं रहे

Updated at : 29 Jul 2021 9:34 PM (IST)
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रामचरित मानस का नागपुरी में अनुवाद करने वाले झारखंड रत्न 'नहन' नहीं रहे

Jharkhand News (गुमला) : नागपुरी भाषा के विद्वान, झारखंड रत्न व कोयला रत्न से सम्मानित साहनी उपेंद्रपाल सिंह 'नहन' का निधन हो गया. नागपुरी भाषा को प्रचलित करने व पुस्तक लेखन की शुरुआत करने वाले लेखकों में से एक थे. हिंदी में लिखी रामायण पुस्तक को नागपुरी भाषा में रूपांतरित करने वाले पहले लेखक थे.

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Jharkhand News (दुर्जय पासवान, गुमला) : नागपुरी भाषा के विद्वान, झारखंड रत्न व कोयला रत्न से सम्मानित साहनी उपेंद्रपाल सिंह ‘नहन’ अब हमारे बीच नहीं रहे. 95 वर्ष की उम्र में उन्होंने गुरुवार की शाम 6 बजे अंतिम सांस ली. गुमला शहर के गोकुल नगर स्थित आवास में उनका निधन हुआ. नहन के निधन से झारखंड में शोक की लहर है. नागपुरी भाषा को प्रचलित करने व पुस्तक लेखन की शुरुआत करने वाले लेखकों में से एक थे. हिंदी में लिखी गयी रामायण पुस्तक को नागपुरी भाषा में रूपांतरित करने वाले पहले लेखक स्वर्गीय नहन थे.

उन्होंने नागपुरी भाषा में करीब 20 पुस्तक लिख चुके हैं. उन्हें कई पुरस्कार भी मिला है. इनमें झारखंड रत्न व कोयल रत्न प्रमुख पुरस्कार है. नागपुरी भाषा के क्षेत्र में वे गुमला जिला ही नहीं झारखंड राज्य के कोहिनूर थे. नागपुरी कवि व लेखक नारायण दास बैरागी ने कहा कि स्वर्गीय नहन नागपुरी भाषा के हिमालय थे. उन्होंने नागपुरी भाषा को बहुत ऊंचाई तक पहुंचाने का काम किया है. वे दो दर्जन पुस्तक लिखे.

इसके अलावा कई प्रतिष्ठिक अखबारों में उनकी नागपुरी भाषा में लेखनी छपती रही है. वे झारखंड के अलावा कई राज्यों में नागपुरी भाषा का प्रचार करने के लिए अतिथि के तौर पर गये हैं. श्री बैरागी ने कहा कि नहन के निधन पर अगर कहा जाये तो मेरे तुलसी चले गये. आज मैं जो कुछ हूं. उन्हीं की शिक्षा का फल है.

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1951 से शुरू की थी पुस्तक लिखना

नारायण दास बैरागी ने बताया कि स्वर्गीय नहन ने मेवाड़ केशरी, सबरी, हसबुलिया, रामायण, अंबा मंजर सहित कई पुस्तक लिखे. इसके अलावा सातों रस शृंगार की लेखनी भी उनकी कलम से निकली जो जनमानस को छू गयी. उनके बिना नागपुरी भाषा अधूरी से लगती है. उनके खाली स्थान को भर पाना बहुत मुश्किल है. उन्होंने 1951-1952 ईस्वी से नागपुरी भाषा में पुस्तक लिखना शुरू किये. इसके बाद वे नहीं रूके. पुस्तक लिखने के साथ वे बेजोड़ के नागपुरी कवि भी थे. उनका सुनना मन को छू लेता था.

छोटे से गांव तारागुटू में हुआ था जन्म

साहनी उपेंद्रपाल सिंह का नाम घर का है. लेकिन, नागपुरी क्षेत्र में उनका एक नाम नहन भी पड़ा. बाद में वे झारखंड राज्य में नहन से ही प्रचलित हुए. उम्र के अंतिम पड़ाव में होने के बावजूद वे लगातार नागपुरी कार्यक्रमों में भाग लेते रहे हैं. गुमला के कई लोग उनसे शिक्षा लेने उनके घर जाते थे. स्वर्गीय नहन का पैतृक घर घाघरा प्रखंड के छोटे से गांव तारागुटू है.

जब बच्चे बड़े हुए, तो वे गांव से गुमला आ गये और गोकुल नगर में अपने बेटों के साथ रहने लगे. उनके चार पुत्र हैं. इनमें मधुसूदन पाल सिंह, बसंत पाल सिंह, रामसुंदर पाल सिंह व शशि भूषण पाल सिंह हैं. परिजनों के अनुसार स्व नहन का अंतिम संस्कार गुमला शहर के पालकोट रोड स्थित मुक्तिधाम में किया जायेगा. इधर, नहन की मौत की सूचना पर कई लोग उनके घर पहुंचे.

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Posted By : Samir Ranjan.

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