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रमजान में अली खामेनेई की ‘शहादत’ और मुजतबा की ‘ताजपोशी’, क्या नया सुप्रीम लीडर बदलेगा ईरान?

Updated at : 10 Mar 2026 10:23 AM (IST)
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Iran Ali Khamenei death Mojtaba's New Supreme Leader in Ramadan will Persia Change Now.

56 साल के मुजतबा अली खामेनेई ईरान के नए सुप्रीम लीडर हैं.

Iran Mojtaba Khamenei: ईरान में सत्ता परिवर्तन की अमेरिका और इजरायल की चाह पूरी हो गई. 28 फरवरी को सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हुई और 9 मार्च को उनके दूसरे बेटे मुजतबा नए नेता बन गए. लेकिन बड़ा सवाल है कि क्या ईरान अब बदलेगा?

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Iran Mojtaba Khamenei: रमजान के पवित्र महीने के दौरान ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई की मौत इस्लामी गणराज्य के इतिहास के सबसे अहम मोड़ों में से एक मानी जा रही है. उनके संभावित उत्तराधिकारी और पुत्र मुजतबा खामेनेई 1979 की ईरानी क्रांति के बाद स्थापित क्रांतिकारी व्यवस्था में एक साथ निरंतरता और विरोधाभास दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं. ईरान के सर्वोच्च नेता का चुनाव तो हो गया है, लेकिन लगभग 50 साल पहले वंशवादी शासन को खत्म करने का दावा करने वाली क्रांति आज ईरान का इस्लामी गणराज्य किस रूप में विकसित हो चुका है.

कौन हैं मुजतबा खामेनेई?

मुजतबा खामेनेई एक धर्मगुरु हैं, जिन्होंने अपने करियर का अधिकांश समय औपचारिक सार्वजनिक पद से दूर रहकर लेकिन सत्ता के बेहद करीब रहते हुए बिताया है. वे लंबे समय तक सर्वोच्च नेता के कार्यालय से जुड़े रहे और अक्सर उन्हें एक औपचारिक राजनीतिक नेता के बजाय सत्ता के गलियारों में प्रभाव रखने वाले मध्यस्थ और ‘द्वारपाल’ के रूप में देखा गया.

महज 17 वर्ष की उम्र में उन्होंने ईरान-इराक वॉर के दौरान कुछ समय के लिए सेवा भी दी थी. हालांकि उनका सार्वजनिक प्रभाव 1990 के दशक के अंत में बढ़ना शुरू हुआ, जब उनके पिता की स्थिति सर्वोच्च नेता के रूप में पूरी तरह मजबूत हो चुकी थी.

समय के साथ उनकी पहचान दो प्रमुख विशेषताओं के इर्द-गिर्द बनी. पहली, ईरान के सुरक्षा तंत्र, विशेषकर इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) और उससे जुड़े कट्टरपंथी नेटवर्क के साथ उनके करीबी संबंध. दूसरी, सुधारवादी राजनीति और पश्चिमी हस्तक्षेप के प्रति उनका कड़ा विरोध.

आलोचकों का आरोप है कि 2009 के विवादित राष्ट्रपति चुनाव के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के दमन में उनकी भूमिका रही थी. यह भी माना जाता है कि उन्होंने ईरान के सरकारी प्रसारण तंत्र पर प्रभाव डाला, जिससे देश के सूचना तंत्र और राज्य के विमर्श के कुछ हिस्सों पर उनका अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया.

साल 2019 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने उन पर प्रतिबंध लगाए थे. आरोप था कि बिना किसी औपचारिक सरकारी पद के भी वे सर्वोच्च नेता की ओर से प्रभावी रूप से काम कर रहे थे.

सर्वोच्च नेता बनने की वैधता का सवाल

ईरान के संविधान के अनुसार सर्वोच्च नेता का चयन असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स द्वारा किया जाता है. यह 88 सदस्यीय धर्मगुरुओं की संस्था है, जो संभावित उम्मीदवारों की धार्मिक, राजनीतिक और नेतृत्व क्षमता का आकलन करती है.

हालांकि इस प्रक्रिया की पारदर्शिता सीमित मानी जाती है. सभा के उम्मीदवारों की जांच और चयन की व्यवस्था भी अंततः उन्हीं संस्थानों के माध्यम से होती है जिन पर सर्वोच्च नेता का प्रभाव माना जाता है.

मुजतबा खामेनेई को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी उठता है कि उन्हें संभावित सर्वोच्च नेता क्यों माना जा रहा है, जबकि पारंपरिक रूप से इस पद के लिए वरिष्ठ और प्रतिष्ठित धर्मगुरु होना जरूरी समझा जाता है.

दरअसल, वर्ष 2022 में उन्हें अयातुल्ला की उपाधि दे दी गई थी, जो सर्वोच्च नेता बनने के लिए आवश्यक धार्मिक दर्जा है. इस पदोन्नति को कई विश्लेषकों ने संकेत माना कि उन्हें अपने वृद्ध और बीमार पिता के बाद सत्ता संभालने के लिए तैयार किया जा रहा था.

क्रांति और वंशवाद का विरोधाभास

1979 की ईरानी रिवोल्यूशन मूल रूप से वंशवादी शासन के खिलाफ खड़ी हुई थी. उस समय क्रांतिकारी नेताओं ने शाह की सत्ता को हटाकर यह घोषणा की थी कि ईरान में वंशानुगत शासन का अंत हो चुका है.

ऐसे में कई ईरानियों के लिए यह विचार असहज है कि पिता के बाद पुत्र सर्वोच्च नेता बन जाए. इससे इस्लामी गणराज्य की व्यवस्था ‘न्यायविद के संरक्षक’ वाली विचारधारा के बजाय एक धर्मतांत्रिक राजतंत्र जैसी प्रतीत हो सकती है.

हालांकि तकनीकी रूप से मुजतबा केवल पारिवारिक संबंधों के आधार पर यह पद नहीं पा सकते. उन्हें विशेषज्ञों की सभा द्वारा चुना जाना आवश्यक है.

फिर भी राजनीतिक व्यवस्थाएं बिना संविधान बदले भी वंशवादी रूप ले सकती हैं. जब अनौपचारिक शक्ति नेटवर्क- जैसे पारिवारिक संबंध, राजनीतिक संरक्षण, सुरक्षा संस्थानों से करीबी संबंध और मीडिया पर प्रभाव, किसी एक व्यक्ति को सबसे ‘स्वाभाविक’ या ‘अनिवार्य’ उम्मीदवार बना देते हैं, तो परिणाम वंशवादी दिखने लगता है.

मुजतबा की कहानी भी लंबे समय से इसी तरह बताई जाती रही है, एक ऐसे व्यक्ति की कहानी, जिसने चुनाव जीतकर नहीं बल्कि सत्ता के मार्गों को नियंत्रित करके अपना प्रभाव स्थापित किया.

खामेनेई की मौत और शिया प्रतीकवाद

अली खामेनेई की मौत की परिस्थितियां भी मुजतबा के संभावित सत्ता ग्रहण को एक अलग प्रतीकात्मक महत्व देती हैं. खासकर इसलिए क्योंकि यह घटना रमजान के महीने के दौरान हुई.

शिया परंपरा में रमजान के दौरान शहादत का विशेष महत्व है. शिया मुसलमानों के पहले इमाम अली इब्न अबी तालिब की 661 ईस्वी में रमजान की सुबह की नमाज के दौरान हमले में मृत्यु हो गई थी.

इसके अलावा पैगंबर मुहम्मद के नवासे हुसैन इब्न अली की कर्बला की लड़ाई में हुई शहादत शिया इतिहास में न्याय और अत्याचार के संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है.

इसी कारण शिया धार्मिक स्मृति में शहादत और प्रतिरोध का विचार गहराई से जुड़ा हुआ है. यदि ईरान की सरकार खामेनेई की मौत को इसी संदर्भ में प्रस्तुत करती है, तो इससे उनके बेटे मुजतबा को धार्मिक वैधता का एक प्रतीकात्मक आभामंडल मिल सकता है.

क्या मुजतबा अपने पिता से अलग होंगे?

ईरान के भविष्य के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि मुजतबा खामेनेई अपने पिता से कितने अलग साबित होंगे.

अली खामेनेई क्रांतिकारी पीढ़ी के प्रमुख नेताओं में से थे. उनकी शक्ति वैचारिक वैधता, दशकों तक सत्ता को मजबूत करने और अलग-अलग राजनीतिक गुटों के बीच संतुलन बनाए रखने की क्षमता पर आधारित थी. समय के साथ वे व्यवस्था के अंतिम निर्णायक बन गए थे.

इसके विपरीत मुजतबा को अक्सर एक सार्वजनिक धार्मिक नेता या करिश्माई राजनीतिक व्यक्तित्व के बजाय सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े व्यक्ति के रूप में देखा जाता है. उनकी पहचान उनके भाषणों या धार्मिक अधिकार से अधिक पर्दे के पीछे काम करने वाले नेटवर्क और समन्वय से जुड़ी रही है.

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संभावित नेतृत्व शैली

विश्लेषकों के अनुसार मुजतबा खामेनेई की छवि एक अधिक सुरक्षा-केंद्रित नेतृत्व शैली की ओर संकेत करती है. इसके तीन संभावित परिणाम हो सकते हैं.

पहला: देश के भीतर नियंत्रण और अधिक सख्त हो सकता है. सुरक्षा प्रतिष्ठान से उनके संबंधों को देखते हुए विरोध या अशांति को राजनीतिक संवाद के बजाय तेज दमन के जरिए दबाने की संभावना बढ़ सकती है.

दूसरा: IRGC क्षेत्रीय राजनीति में अपना प्रभाव और बढ़ा सकता है, क्योंकि मुजतबा के उसके साथ करीबी संबंध बताए जाते हैं.

तीसरा: पश्चिमी देशों के साथ किसी बड़े समझौते की संभावना कम दिखाई देती है. इसके बजाय रणनीतिक संतुलन और सामरिक दबाव की नीति जारी रह सकती है.

संक्षेप में, मुजतबा खामेनेई के नेतृत्व में ईरान की बयानबाजी अधिक टकरावपूर्ण हो सकती है, लेकिन अगर शासन के अस्तित्व पर खतरा पैदा होता है तो व्यावहारिक नीति अपनाने की संभावना भी बनी रह सकती है.

भाषा के इनपुट के साथ.

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Anant Narayan Shukla

लेखक के बारे में

By Anant Narayan Shukla

इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट. करियर की शुरुआत प्रभात खबर के लिए खेल पत्रकारिता से की और एक साल तक कवर किया. इतिहास, राजनीति और विज्ञान में गहरी रुचि ने इंटरनेशनल घटनाक्रम में दिलचस्पी जगाई. अब हर पल बदलते ग्लोबल जियोपोलिटिक्स की खबरों के लिए प्रभात खबर के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं.

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