अफ्रीकी चट्टानों ने खोला 460 करोड़ साल पुरानी धरती का रहस्य, जानें कैसे भयंकर घटनाओं ने दिया जीवन को जन्म!

Ancient Earth Life Old Africa Rocks Discovery / Ai Image
Ancient Earth Life: पृथ्वी की शुरुआत कैसे हुई? वैज्ञानिकों के अनुसार, जीवन की शुरुआत महासागरों, ज्वालामुखियों और विनाशकारी प्राकृतिक घटनाओं के बीच हुई. दक्षिण अफ्रीका की पुरानी चट्टानें बताती हैं कि कैसे, अरबों साल पहले, एक नीला ग्रह बना जहां जीवन बिना ऑक्सीजन के पनपा, और आज की दुनिया की नींव रखी.
Ancient Earth Life: आपने नासा के रोवर से आई मंगल ग्रह की तस्वीरें तो देखी होंगी. लाल जमीन, सूखी चट्टानें और वीरान माहौल. अब जरा सोचिए कि अगर कोई टाइम मशीन होती, जो हमें धरती के शुरुआती दौर में ले जाती और वहीं से तस्वीरें भेजती, तो क्या दिखता? लेखक और भूवैज्ञानिक के अनुसार, यह कोई फिल्मी कल्पना नहीं है. धरती के कुछ दूर-दराज इलाकों में आज भी ऐसी चट्टानें मौजूद हैं, जो हमें अरबों साल पुरानी धरती की झलक दिखाती हैं. दक्षिण अफ्रीका के मखोंज्वा पर्वत और पास के देश एस्वातिनी की चट्टानें धरती के लगभग 4.6 अरब साल (460 करोड़ साल) के इतिहास में से तीन-चौथाई से भी पुराने समय की कहानी कहती हैं. द इंडियन एक्सप्रेस के एक आर्टिकल में, लेखक ने अपनी किताब द ओल्डेस्ट रॉक्स ऑन अर्थ में इन्हें धरती की जियोलॉजिकल टाइम मशीन बताया है.
Ancient Earth Life in Hindi: जब धरती पानी ही पानी थी
वैज्ञानिकों के अनुसार, शुरुआती धरती पर चारों तरफ महासागर फैले थे. जमीन बहुत कम थी और समुद्र के नीचे लगातार ज्वालामुखी फटते रहते थे. उस समय धरती आज के मुकाबले कहीं ज्यादा गर्म थी. धरती के अंदर से निकलने वाला पिघला हुआ पत्थर यानी मैग्मा इतना गर्म था कि वह सफेद चमकता दिखाई देता था. समुद्र की गहराई में दरारों से बेहद गर्म पानी बाहर निकलता रहता था. इसी से धातुओं से भरे लंबे ढांचे बनते थे. और हैरानी की बात यह है कि इन्हीं जगहों पर जीवन फल-फूल रहा था.
ज्वालामुखी द्वीप और खतरे से भरी दुनिया
समंदर के बीच-बीच में ज्वालामुखी द्वीप उभरते थे. ये जगहें बेहद खतरनाक थीं. किनारों पर उबलती कीचड़ की झीलें थीं और कभी भी ज्वालामुखी फट सकता था. द इंडियन एक्सप्रेस के ही आर्टिकल में लेखक के अनुसार, इन्हीं द्वीपों के पास शांत पानी में सूक्ष्म जीवों की परतें बन चुकी थीं. समय-समय पर बड़े भूकंप आते थे. इन भूकंपों से समुद्र के भीतर चट्टानें खिसकती थीं और नीचे गहराई में गिर जाती थीं. उस दौर में धरती पर बड़े-बड़े उल्कापिंड भी गिरे, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार, इन टक्करों के बावजूद जीवन खत्म नहीं हुआ.
महाद्वीपों की पहली झलक
वैज्ञानिक बताते हैं कि धरती के अंदर की ताकतें जमीन को ऊपर उठा रही थीं. इसी से शुरुआती महाद्वीप बने. इनके किनारों पर रेतीले समुद्र तट थे, खाड़ियां थीं, लैगून थे और नदी के मुहाने थे. आज की तरह तब भी ज्वार-भाटा आता था. बाढ़ के समय नदियां अंदरूनी इलाकों से मिट्टी और कीचड़ बहाकर समुद्र तक लाती थीं. दूर पहाड़ों से निकलने वाली नदियां घने बादलों के बीच बहती थीं.
लेखक के अनुसार, उस समय भी धरती नीली दिखती थी. वजह वही थी जो आज है महासागर नीली रोशनी को फैलाते हैं. लेकिन हवा आज जैसी नहीं थी. वायुमंडल में मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी गैसें थीं. ऑक्सीजन बिल्कुल नहीं थी. यही गैसें धरती को गर्म रखती थीं, ताकि पानी जम न जाए. उस समय सूरज आज के मुकाबले काफी कमजोर था. वैज्ञानिकों के अनुसार, उस दौर के जीव ऑक्सीजन के बिना जीते थे. माना जाता है कि ये सूक्ष्म जीव गुलाबी या बैंगनी रंग के रहे होंगे.
ओशिनिया: आज की दुनिया में पुरानी धरती
लेखक के अनुसार, आज का ओशिनिया क्षेत्र जहां प्रशांत महासागर में ज्वालामुखी द्वीप और छोटे महाद्वीप हैं, शुरुआती धरती की सबसे अच्छी मिसाल है. यहां आज भी भूकंप आते हैं, ज्वालामुखी फटते हैं और धरती की प्लेटें आपस में टकराती हैं. ठीक वैसा ही माहौल, जैसा अरबों साल पहले धरती पर था. साल 2022 में टोंगा के पास हूंगा ज्वालामुखी फटा. वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी ताकत 60 मेगाटन परमाणु बम के बराबर थी. इससे दो लाख से ज्यादा बार बिजली गिरी. समंदर के नीचे एक गहरा गड्ढा बना, जो तरह-तरह के रसायनों से भरा था. वैज्ञानिक प्रयोग बताते हैं कि बिजली गिरने से जीवन के लिए जरूरी अणु बन सकते हैं. लेखक मानते हैं कि शुरुआती धरती पर हुए ऐसे लाखों विस्फोटों ने जीवन की शुरुआत की राह बनाई. यानी जीवन शांति से नहीं, बल्कि भयंकर प्राकृतिक घटनाओं के बीच पैदा हुआ.
Ancient Earth Life in Hindi: धरती ही क्यों बची?
लेखक के अनुसार, धरती अपने शुरुआती दस फीसदी जीवन में ही नीली बन गई थी. मंगल और शुक्र भी कभी ऐसे ही रहे होंगे. लेकिन धरती खास है क्योंकि यह न ज्यादा गर्म है, न ज्यादा ठंडी. इसे वैज्ञानिक गोल्डीलॉक्स ज़ोन कहते हैं. धरती इतनी बड़ी है कि उसका गुरुत्व और चुंबकीय ताकत हवा को थामे रख सके.
शुरुआत में एक बड़े टकराव से चांद बना, जिसने धरती के घूमने को संतुलित किया. बाद में जीवन ने भी मदद की. जीवों की गतिविधियों से चट्टानों ने जहरीली गैसों को सोखा और धरती संतुलित बनी रही. लेखक चेतावनी देते हैं कि हमें वह पीढ़ी नहीं बनना चाहिए जो धरती का जीवन देने वाला नीला रंग खो दे. एस्वातिनी की सिस्वाती भाषा में नीले रंग को कहा जाता है, “लुहलाता ल्वेसिभाकाभाका”, यानी आसमान जैसा नीला-हरा. यही रंग धरती की पहचान है. और अब इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है.
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लेखक के बारे में
By Govind Jee
गोविन्द जी ने पत्रकारिता की पढ़ाई माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय भोपाल से की है. वे वर्तमान में प्रभात खबर में कंटेंट राइटर (डिजिटल) के पद पर कार्यरत हैं. वे पिछले आठ महीनों से इस संस्थान से जुड़े हुए हैं. गोविंद जी को साहित्य पढ़ने और लिखने में भी रुचि है.
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