ePaper

रांची से 50 KM दूर इस गांव में आज भी 'अंधेरा कायम है', टॉर्च और लालटेन के सहारे लोग गुजारते हैं रात

18 Jan, 2026 5:55 pm
विज्ञापन
रांची से 50 KM दूर इस गांव में आज भी 'अंधेरा कायम है', टॉर्च और लालटेन के सहारे लोग गुजारते हैं रात
लालटेन और मोबाइल टॉर्च की रोशनी से खाना बनाती महिला, Pic Credit- Chatgpt

Jharkhand Village Story: झारखंड के खूंटी जिले का बलंगा गांव आजादी के 78 साल बाद भी अंधेरे में है. रांची से महज 50 किमी दूर स्थित इस गांव में बिजली नहीं पहुंची है. प्रभात खबर की ग्राउंड रिपोर्ट में जानिए ग्रामीणों का दर्द, सरकारी दावों की हकीकत और रोजमर्रा की मुश्किलें.

विज्ञापन

Jharkhand Village Story, खूंटी, (प्रशांत तिवारी): एक तरफ देश डिजिटल इंडिया और तकनीक की नई ऊंचाइयों की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड की राजधानी रांची से महज 50 किलोमीटर दूर खूंटी जिले का बलंगा गांव आज भी अंधेरे में जीने को मजबूर है. आजादी के 78 साल बाद भी इस गांव में बिजली नहीं पहुंच पाई है. यहां हर शाम सूरज ढलते ही पूरा गांव सन्नाटे और अंधेरे में डूब जाता है. बलंगा गांव मरहू प्रखंड में आता है. यहां के लोगों के लिए अंधेरा सिर्फ बिजली गुल होने की बात नहीं, बल्कि विकास से कटे रहने की कहानी है. प्रभात खबर के प्रतिनिधि प्रशांत तिवारी ने बलंगा गांव पहुंचकर ग्रामीणों की हालात को नजदीक से देखा और गांव में रहने वाले कई लोगों से बातचीत की. आइये जानते हैं गांव के लोगों ने प्रभात खबर के साथ बातचीत में क्या कहा.

आसपास के सब गांव रोशन, बस हमारा नहीं : संजय मुंडा

प्रभात खबर से बात करते हुए ग्रामीण संजय मुंडा ने गांव का दर्द साझा करते हुए कहते हैं कि जब से हमें आजादी मिली है तब से यहां बिजली नहीं पहुंच पायी है. जबकि आजादी मिले हुए हमारे देश को 78 साल से ज्यादा हो गये हैं. हमारे आसपास के सभी गांवों में सालों पहले बिजली पहुंची चुकी है, बस हम ही लोग छूट गए हैं.” आज भी हमारे गांव के लोग लालटेन और टॉर्च के सहारे चल रहे हैं.

बिजली कनेक्शन और मीटर लगाने के नाम पर मांगे जा रहे हैं पैसे

वहीं, ग्रामीण संदीप का आरोप है कि ग्रामीणों से बिजली का कनेक्शन और मीटर लगाने के नाम पर 300 से 400 रुपये मांगे जा रहे हैं. जिन्होंने पैसे दिये, उनके घरों में बिजली का कनेक्शन लगा दिया गया, जो नहीं दे पाए उनके घरों में आज भी अंधेरा छाया हुआ है.” सरकारी विज्ञापनों में उज्ज्वला योजना को मुफ्त का बताया जाता है, लेकिन गांव में ऐसे कई लोग हैं जो इस योजना के लिए भी पैसे देने को मजबूर हैं.

Also Read: धुस्का, रुगड़ा की सब्जी और चना-घुघनी, Vande Bharat ट्रेन में यात्रियों को मिलेगा अब झारखंडी खाने का स्वाद

कागजों में गांव रोशन, जमीन पर अंधेरा

साल 2018 में सरकार ने खुले मंच से कहा था कि देश का हर गांव में बिजली पहुंच चुकी है. लेकिन बलंगा गांव इस दावे की पोल खोलता है. सरकारी नियमों के मुताबिक अगर किसी गांव के 10 फीसदी घरों या किसी सार्वजनिक भवन में बिजली पहुंच जाए, तो गांव को कागजों में “रोशन” मान लिया जाता है. यही वजह है कि फाइलों में बलंगा गांव में बिजली तो है, लेकिन हकीकत में आदिवासी टोलों और पहाड़ी इलाकों तक तार और बिजली के खंभे नहीं पहुंचे पाए हैं.

मोबाइल का टॉर्च जलाकर बनाया जाता है खाना

बिजली नहीं होने से गांव की रोजमर्रा की जिंदगी बेहद मुश्किल है. ग्रामीणों के अनुसार पहले उन्हें महीने में 3 लीटर मिट्टी का तेल मिलता था. बाद में यह घटकर 2.5 लीटर, फिर 2 लीटर और अब सिर्फ 1 लीटर रह गया है. वह भी अब बंद होने की कगार पर है. रात में महिलाएं या तो लालटेन की कमजोर रोशनी में खाना बनाती हैं या मोबाइल का टॉर्च जलाकर चूल्हा जलाती हैं. जिनके पास यह सुविधा भी नहीं है, वे आज भी पेंसिल बैटरी वाली लाइट के सहारे रात गुजारते हैं.

गांव का सोलर पूरी तरह धूप पर निर्भर

ग्रामीण बताते हैं कि गांव में सोलर से चलने वाली मोटर लगी तो है, लेकिन वह पूरी तरह धूप पर निर्भर है. जैसे ही बादल आते हैं, पानी की सप्लाई बंद हो जाती है. ऐसे में महिलाओं को पीने के पानी के लिए पैदल कई किमी दूर में स्थित डांड़ी ( एक तरह का प्राकृतिक जल स्रोत) पर जाना पड़ता है.

वादे हुए, तारीखें बदलीं लेकिन बिजली नहीं आई

ग्रामीणों के मुताबिक पहले कहा गया था कि क्रिसमस तक गांव रोशन हो जाएगा, फिर नए साल की डेडलाइन दी गई. लेकिन अब तो क्रिसमस और नया साल दोनों गुजर गए, लेकिन गांव आज भी अंधेरे में है.

पढ़ाई पर पड़ रहा बुरा असर

गांव के सरकारी प्राथमिक स्कूल में स्मार्ट टीवी भी है. इसे चलाने के लिए पूरे स्कूल में वायरिंग कर दी गई, लेकिन बिजली नहीं होने से वह सिर्फ शोपीस बनकर रह गया है. स्कूल निगरानी समिति के अध्यक्ष बताते हैं कि गांव के कई बच्चे पढ़ाई छोड़ रहे हैं. इसके पीछे बिजली की कमी भी एक प्रमुख वजह है. अभिभावकों में जागरूकता की कमी और स्थानीय स्तर पर नशाखोरी की संस्कृति भी एक बड़ी वजह बनकर सामने आयी है.

कब आएगी पहली रोशनी?

बलंगा गांव की कहानी आजादी के अमृत काल में विकास के दावों पर सवाल खड़े करती है. यह गांव सिर्फ बिजली के खंभों का नहीं, बल्कि उस पहली रोशनी का इंतजार कर रहा है जो सच में इसकी जिंदगी बदल सके.

Also Read: टूरिज्म में इन्वेस्टमेंट का नया हॉटस्पॉट बनेगा झारखंड, फॉरेन इन्वेस्टर्स को न्योता देने की तैयारी

विज्ञापन
Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola

अपने पसंदीदा शहर चुनें

ऐप पर पढ़ें