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एशिया में इबोला का खतरा

Updated at : 27 Oct 2014 8:58 AM (IST)
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एशिया में इबोला का खतरा

सिंगापुर : पश्चिम अफ्रीका में जितने लंबे समय तक इबोला का कहर जारी रहेगा , उतने ही समय तक किसी यात्री के इसकी चपेट में आकर एशिया में उसके फैलने की आशंका उतनी ही अधिक रहेगी. इस बीमारी पर नियंत्रण इस बात पर निर्भर करेगा कि इसका पता लगाने के लिए कितनी तेजी से कदम […]

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सिंगापुर : पश्चिम अफ्रीका में जितने लंबे समय तक इबोला का कहर जारी रहेगा , उतने ही समय तक किसी यात्री के इसकी चपेट में आकर एशिया में उसके फैलने की आशंका उतनी ही अधिक रहेगी. इस बीमारी पर नियंत्रण इस बात पर निर्भर करेगा कि इसका पता लगाने के लिए कितनी तेजी से कदम उठाए जाते हैं और उपचार में क्या तरीके अपनाए जाते हैं. उसी से तय होगा कि इस क्षेत्र में यह विषाणु कितना असर फैलाएगा जहां अरबों लोग गरीबी में रहते हैं और जहां स्वास्थ्य सेवाएं भी अक्सर खराब रहती हैं. सरकारें प्रतिक्रिया की योजनाएं बना रही है, हवाई अड्डों पर निगरानी बढाई जा रही है और अलग-थलग करने के उपायों पर विचार किया जा रहा है.

फिर भी, क्षेत्र के विकासशील देशों के स्वास्थ्य विशेषज्ञों को डर है कि वायरस का फैलाव घातक होगा और उस पर काबू पाना मुश्किल होगा. दिल्ली से सटे गुडगांव में स्थित मेदांता मेडिसिटी अस्पताल के चिकित्सक, यतिन मेहता कहते हैं, ‘‘यह एक लाइलाज बीमारी है, जिसकी मृत्यु दर बहुत ज्यादा है. यहां तक की अमेरिका जैसा देश भी पूरी तरह से इस पर रोक लगाने में सक्षम नहीं हो पाया है.’’ उन्होंने कहा ‘‘सरकार कोशिश कर रही है. वे तैयारियां कर रहे हैं और वे प्रशिक्षण कर रहे हैं, लेकिन इतिहास में हमारा आपदा प्रबंधन का रिकॉर्ड बहुत बदतर रहा है.’’ विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकडों के अनुसार, इबोला से 10,000 से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं और इनमें से करीब आधों की मौत हो गई है.

इबोला के शुरुआती लक्षणों में बुखार आना, सिर दर्द, शरीर में दर्द, खांसी, पेट में दर्द, उल्टी आना और अतिसार होना शामिल है. एशिया में दुनिया की 60 फीसदी आबादी रहती है. एशिया विकास के ज्यादातर मानकों में पश्चिम अफ्रीका से कहीं आगे है. एशिया में ही सिंगापुर, मलेशिया, दक्षिण कोरिया और जापान जैसे विकसित या उभरते हुए देश हैं.

लेकिन भारत, चीन, फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों में बडी संख्या में गरीब लोग रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर झुग्गी-झोपडियों में रहते हैं. यहां स्वास्थ्य सेवाओं पर पर्याप्त मात्र में धन भी खर्च नहीं किया जाता. भारत की पूर्व स्वास्थ्य सचिव सुजाता राव ने कहा कि जब स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है तो भारत की स्वास्थ्य प्रणाली अत्याधिक सक्रिय हो जाती है, जैसे 2009 में एच1एन1 महामारी के दौरान देखने को मिला था. उन्होंने कहा कि भारत में हम संकट प्रबंधन में बहुत अच्छे हैं, लेकिन रोजाना की देखभाल में निराशाजनक स्थिति है. जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत इबोला से निपटने के लिए तैयार है तो उन्होंने कहा, ‘‘ हम तैयार नहीं हैं, लेकिन उतनी तैयारी तो है जो कोई भी देश कर सकता है.’’

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