जॉन केरी की भारत यात्रा और दोनों देशों की चुनौतियां

Published at :31 Jul 2014 7:59 AM (IST)
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जॉन केरी की भारत यात्रा और दोनों देशों की चुनौतियां

।।मुकुन्द हरि।। अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी आज अपनी तीन दिनों की यात्रा पर भारत पहुंच गए हैं और इसी के साथ भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य के आयाम को लेकर दोनों देशों में महत्वाकांक्षाओं का ग्राफ़ ऊपर उठने लगा है. केरी की भारत यात्रा ऐसे समय में हो रही […]

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।।मुकुन्द हरि।।

अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी आज अपनी तीन दिनों की यात्रा पर भारत पहुंच गए हैं और इसी के साथ भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों के भविष्य के आयाम को लेकर दोनों देशों में महत्वाकांक्षाओं का ग्राफ़ ऊपर उठने लगा है.
केरी की भारत यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पिछले कुछ महीनों से भारत-अमेरिकी सम्बन्धों में थोड़ी खटास का असर पड़ा हुआ है. भारत में हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में जनता से मिले अपार समर्थन की बदौलत प्रधानमंत्री का कार्यभार सम्हालने के बाद अमेरिकी सरकार की कैबिनट स्तर के किसी मंत्री का यह पहला भारत दौरा है.
विदेश मंत्री जॉन केरी के साथ अमेरिकी वाणिज्य-मंत्री पेनी प्रित्जकर, अमेरिकी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता जेन साकी के अलावा अमेरिकी ऊर्जा विभाग, गृह सुरक्षा विभाग और नासा समेत कई एजेंसियों के अधिकारी भी इस दौरे पर साथ आये हैं. केरी आज भारत की विदेश-मंत्री श्रीमती सुषमा स्वराज के साथ भारत-अमेरिका रणनीतिक वार्ता की सह-अध्यक्षता करने वाले हैं. इसके बाद शुक्रवार को केरी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात होने की सम्भावना है.
हालांकि, जॉन केरी का समय पिछले कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रहा है और इसी दरम्यान पिछले हफ्ते हेरी ईजिप्ट पहुंचे थे. अमेरिकी पत्रिका टाइम के हवाले से छपी खबर के आधार पर जॉन केरी मध्य-एशिया में चल रहे गज़ा विवाद को लेकर इस्त्राइल और फिलिस्तीन के बीच संघर्ष-विराम की मध्यस्थता का पैगाम लेकर ईजिप्ट गए थे लेकिन शांति बहाली के लिए बड़ी मेहनत से तैयार किया गया उनका ‘ड्राफ्ट’ समय से पहले ही लीक हो गया और इस्त्राइल के एक अख़बार ने ऐन मौके से ठीक पहले केरी के उस ड्राफ्ट की खबर छापकर उनकी सारी मेहनत पर पानी फेर दिया.
स्वाभाविक रूप से अमेरिका को इस्त्राइल जैसे मित्र देश से ऐसी घटना की उम्मीद नहीं थी. नतीजतन जॉन केरी को बड़ी शर्मनाक स्थिति में ईजिप्ट से खाली हाथ वापस लौट जाना पड़ा था.लेकिन ऐसा लगता है कि ईजिप्ट का दर्द केरी को भारत में नहीं सताएगा क्योंकि यहां उनके आने का सबसे बड़ा मकसद न सिर्फ नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार की नब्ज टटोलना है बल्कि अमेरिका में सितम्बर में होने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात को सफल बनाने की एक कवायद भी है जिसे पूरा करने की चाहत दोनों देशों को है.
ये बात ज़रूर है कि दोनों देश उसके पहले कुछ पुराने मुद्दों को लेकर भी अपनी स्थितियां स्पष्ट करना चाहेंगे ताकि सितम्बर की शिखर बैठक में दोनों नेताओं के पास अपने-अपने देश को गिनाने के लिए कई उपलब्धियां रहें.
ऐसे कई मुद्दे हैं जिनको लेकर पिछले कुछ अरसे से दोनों देशों के रिश्ते थोड़े असहज चल रहे थे.
पिछले साल मनमोहन सिंह सरकार के कार्यकाल के दौरान अमेरिका में काम कर रही भारतीय राजनयिक देवयानी खोब्रागड़े की गिरफ़्तारी का मामला ऐसा रहा जिसने कूटनीतिक और राजनीतिक दोनों तरह से, दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट भर दी थी. हालांकि ये मुद्दा अब पुराना माना जाने लगा है मगर भारत ये जरूर चाहेगा कि दोनों देशों के अच्छे रिश्तों की खातिर भविष्य में दुबारा कभी उसके किसी राजनयिक के साथ ऐसा सलूक ना हो.
इसी कड़ी में भारत में अमेरिका की तत्कालीन राजदूत नैंसी पॉवेल को भारतीय राजनयिक देवयानी खोबरागड़े की गिरफ़्तारी से उपजे तनाव और बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के बुलंद होते सितारों का सही आकलन नहीं कर पाने का ख़ामियाज़ा ओबामा सरकार की तरफ से भुगतना पड़ा और नतीजतन तय वक़्त से पहले ही यहां से उनकी छुट्टी हो कर दी गई.
अमेरिका जानता है कि भारत में इस समय वही मोदी प्रधानमंत्री हैं जिनको 2002 में गुजरात दंगों के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के कार्यकाल में अमेरिकी सरकार ने साल 2005 में वीसा देने पर रोक लगा दी थी.
इसीलिए तो भारत आने से पहले ही केरी ने मोदी को खुश करने के लिए उनके ‘सबका साथ, सबका विकास’ नारे की जमकर तारीफ़ की है ताकि ऐसा करके वो प्रधानमंत्री मोदी को यह अहसास दिला सकें कि ओबामा सरकार की सोच जॉर्ज बुश के वक़्त से अलग है और अमेरिका, मोदी के साथ मिलकर दोस्ती के गठजोड़ को आगे ले जाने को तत्पर है. केरी ने अपनी इस यात्रा के बारे में ये भी कहा है कि अमेरिका के साथ भारत के संबंधों को मजबूत करना एक रणनीतिक अनिवार्यता है. अमेरिका ये मानता है कि ये वक़्त बदलाव का है और ऐसे में भारत और अमेरिका विभिन्न मुद्दों पर साथ मिलकर दुनिया के लिए ज्यादा समृद्ध भविष्य बना सकते हैं.
अमेरिकी विदेश मंत्री ने पहले ही कहा है कि मोदी की पाकिस्तान समेत तमाम सार्क देशों के प्रतिनिधियों को अपने शपथ-ग्रहण समारोह में निमंत्रण देने की पहल बहुत सार्थक है और अमेरिका का मानना है कि नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों में यह संभावनाओं से भरे बदलाव का समय है जिसके लिए दोनों देशों को आर्थिक-स्तर के अलावा स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु परिवर्तन, व्यापार, रक्षा समेत कई अन्य मुद्दों पर साथ मिलकर आगे कदम बढ़ाना होगा.
जानकारों की राय में वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को देखते हुए भारत-अमेरिका के आपसी संबंधों का और मजबूत होना दोनों देशों के लिए निहायत जरूरी है. अमेरिका भारत के साथ रिश्ते न सिर्फ अपने व्यापारिक हितों के लिए बढ़ाना चाहता है बल्कि इसके साथ ही वो ये भी सोच रहा है कि दिन-ब-दिन जिस तरह से चीन की ताकत आर्थिक और सामरिक रूप में बढ़ रही है वैसे में उसे भारत जैसे देश के रूप में एक ज्यादा मजबूत और भरोसेमंद साथी की जरूरत है ताकि भविष्य में अमेरिका चीन की चुनौती का बेहतर तरीके से सामना कर सके.
दूसरी तरफ भारत को भी ये सोचना होगा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत को परंपरागत साथी रहे रूस जैसे देश के अलावा नए साझीदारों की भी ज़रुरत होगी. वैसे भी ब्राज़ील में हाल ही में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मलेन में प्रधानमंत्री मोदी की रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ तय मुलाकात के निश्चित हुए समय के बावजूद पुतिन ने न सिर्फ मोदी को दो घंटों तक इंतजार करवाया बल्कि उस दिन की मुलाकात को रद्द कर दिया था जिसकी वजह से मोदी को पुतिन से अगले दिन मुलाकात करनी पड़ी थी. निश्चित रूप से ऐसी बातों से संकेत मिलता है कि भारत और रूस के रिश्ते भी बदलाव के दौर से गुज़र रहे हैं और वक़्त से पहले इस बदलाव की नब्ज को पहचानना ही भारत के हित में होगा. वैसे भी उक्रेन विवाद और मलेशियाई यात्री विमान के मार गिराए जाने के बाद अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबन्धों की घोषणा कर दी है.सितम्बर में मोदी के अमेरिका जाने से पहले केरी की भारत यात्रा एक रिहर्सल के रूप में देखी जा रही है ताकि भारत और अमेरिका विभिन्न मुद्दों पर पहले से ही तैयारी कर सकें.
भारत केरी के साथ बातचीत में कई मुद्दों पर सकारात्मक समर्थन चाहेगा जिनमें भारतीयों के लिए अमेरिकी वीसा नियमों में छूट, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ़ कड़े कदम, 2008 में हुए मुंबई हमलों के सम्बन्ध में डेविड हेडली से गहराई से पूछ-ताछ करने की छूट, भारतीय राजनेताओं की अमेरिकी एजेंसी की तरफ से की गई तथाकथित जासूसी, भारतीय राजनयिकों के साथ अमेरिका में भविष्य में कोई अपमानजनक व्यवहार न होने जैसे मुद्दे शामिल हो सकते हैं.
वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ये चाहेगा कि परमाणु ऊर्जा के लिए स्थापित होने वाले परमाणु बिजली संयंत्रों में निवेश के लिए भारत की सरकार सार्थक आश्वासन दे, रक्षा सौदों में अमेरिका को वरीयता, भारत में अमेरिकी पूंजीनिवेश को सरल बनाना, भारत-अमेरिकी द्विपक्षीय व्यापार को वर्तमान के 100 अरब डॉलर के मुकाबले 400 से 500 अरब डॉलर तक ले जाने समेत कई अन्य मुद्दों पर भारत अमेरिकी हितों का साथ दे.
हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी फिलहाल जॉन केरी के आगमन पर किसी भी बड़ी घोषणा से बचना चाहेंगे ताकि सितम्बर में ओबामा के साथ होने वाली उनकी मुलाकात का रंग फीका न पड़े मगर इतना तय है कि मोदी के साथ-साथ अमेरिकी सरकार केरी की इस यात्रा में सितम्बर की मुलाकात को सफल बनाने की हर संभव कोशिश करने में कोई कसार भी नहीं छोड़ना चाहेंगे.
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