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चंपारण सत्याग्रह के 100 वर्ष

Updated at : 05 Apr 2017 5:58 AM (IST)
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चंपारण सत्याग्रह के 100 वर्ष

लेखक और पत्रकार अरविंद मोहन पिछले काफी समय से गांधी के चंपारण आंदोलन पर शोध में लगे हैं. यह चंपारण सत्याग्रह का 100वां साल है और इसी अवसर पर अलग-अलग पहलुओं से लिखी उनकी कई किताबें आने वाली हैं. वे चंपारण के ही हैं और ऐसे गांधीवादी परिवार से आते हैं, जिसकी राजनैतिक यात्रा भी […]

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लेखक और पत्रकार अरविंद मोहन पिछले काफी समय से गांधी के चंपारण आंदोलन पर शोध में लगे हैं. यह चंपारण सत्याग्रह का 100वां साल है और इसी अवसर पर अलग-अलग पहलुओं से लिखी उनकी कई किताबें आने वाली हैं. वे चंपारण के ही हैं और ऐसे गांधीवादी परिवार से आते हैं, जिसकी राजनैतिक यात्रा भी गांधी के चंपारण पहुंचने के साथ ही शुरू हुई.
दिल्ली विश्वविद्यालय से आधुनिक भारतीय इतिहास का अध्ययन करने वाले अरविंद को चंपारण शोध-भ्रमण के दौरान एक पुराने कांग्रेसी परिवार के पास एक ऐसी डायरी होने की भनक मिली, जिसे गांधी की चंपारण डायरी कहा गया. छानबीन में बात विश्वसनीय भी लगी और अविश्वसनीय भी. सौभाग्य से जिले के अपने नायक राजकुमार शुक्ल की डायरी उपलब्ध है और उसे स्थानीय क्रांतिकारी/इतिहासकार विंध्याचल प्रसाद गुप्त ने छपवाकर सर्वसुलभ भी बना दिया है.
अरविंद ने अन्य स्रोतों से भी तथ्यों का मिलान किया तो प्राय: सही सूचना भी अजीब भाषा में मिली. सो उन्होंने इस डायरी को अन्य स्रोतों के आधार पर दुरुस्त कर लगभग नयी डायरी लिखी है. उन्होंने इसे गांधी के नाम से ही सामने लाने का फैसला किया-भले ही अब असली लेखक वे खुद बन गये हों. अाज से हम इस डायरी का क्रमवार प्रकाशन कर रहे हैं. पढ़िए पहली कड़ी.
चंपारण डायरी
गुरुवार, 5 अप्रैल, 1917
अरविंद मोहन
चं पारण और राजकुमार शुक्ल धीरे-धीरे अपना बनते जा रहे हैं. लखनऊ कांग्रेस से पहले मैंने चंपारण और नील की खेती का नाम भी नहीं सुना था, पर लखनऊ के बाद चंपारण और राजकुमार दोनों मेरे संग जुड़ते जा रहे हैं. जब मैं लखनऊ के बाद कानपुर और इलाहाबाद गया तब भी शुक्लजी वहां टकराये और उन्होने अपना न्यौता दोहराया. मैंने इस बीच कांग्रेस के चंपारण संबंधी प्रस्ताव को पढ़ने के अलावा अपने साथियों से भी इस बारे में बात की है.
उन सबकी राय है कि वहां जाकर खुद से देखने और स्थिति के अनुरूप काम हाथ में लेने में हर्ज नहीं है, बल्कि जब मैं अपने पुराने मित्र प्राणजीवन मेहता (बर्मा वाले) से मिला तो उन्होंने काम करने का कुछ तरीका भी सुझाया, जिसमें यह बात शामिल है कि चंपारण की पीड़ित प्रजा और बिहार के लोगों के सहारे ही मुद्दे को उठाया जाये और लड़ाई लड़ी जाये.
डॉ मेहता का यह भी कहना था कि मैं चंपारण जाने-आने और जरूरत पड़ी तो रुकने के लिए खर्च की चिंता न करूं. वे सारा खर्च उठायेंगे और चंपारण से किसी भी तरह का चंदा लेना उचित न होगा. पर अभी मुझे उनके या उन जैसे शुभचिंतकों की ज्यादा मदद कोचरब गांव में बन रहे साबरमती आश्रम के लिए लगती है, जिसका काम अभी जारी है. मैं आज कलकत्ता जा रहा हूं. कांग्रेस कार्यकारिणी की बैठक है. पिछली बार की कलकत्ता यात्रा महाराजा कासिम बाजार के न्यौते पर थी. तब ही मैं चंपारण जाना चाहता था पर राजकुमार शुक्ल लेने ही नहीं आ सके थे.
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