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रांची टेस्‍ट : जीत का मौका तो मिला था टीम इंडिया को

Updated at : 20 Mar 2017 7:27 PM (IST)
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रांची टेस्‍ट : जीत का मौका तो मिला था टीम इंडिया को

।। अनुज कुमार सिन्‍हा ।। रांची का टेस्ट ड्रॉ खत्म हो गया. चौथे दिन चाय के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि भारत मैच जीत सकता है. अंतिम दिन मार्श और हैंड्सकांब ने भारत से मौका छीन लिया. जब तक यह जोड़ी टूटती, भारत के हाथ से मौका जा चुका था. टेस्ट […]

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।। अनुज कुमार सिन्‍हा ।।

रांची का टेस्ट ड्रॉ खत्म हो गया. चौथे दिन चाय के बाद जो माहौल बना था, उससे लगा था कि भारत मैच जीत सकता है. अंतिम दिन मार्श और हैंड्सकांब ने भारत से मौका छीन लिया. जब तक यह जोड़ी टूटती, भारत के हाथ से मौका जा चुका था. टेस्ट पांच दिन चला और पांचवें दिन चाय तक रोमांच बना हुआ था, यह कम बड़ी बात नहीं है. अंतिम दिन भी विकेट से स्पिनरों को वह फायदा नहीं मिला, जिसकी पहले दिन से उम्मीद थी. भारत की ओर से अगर किसी स्पिनर ने प्रभाव डाला, वह थे जड़ेजा. अगर भारत मैच नहीं जीत सका, तो इसके दो प्रमुख कारण दिखे. पहला तो ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाज मार्श और हैंड्सकांब का धैर्य से खेलना, मैच बचाने के लिए खेलना, अपने स्वभाव के विपरीत खेलना. हैंड्सकांब ने अपने 72 रन के लिए 200 गेंदों का सामना किया. उसी प्रकार मार्श ने सिर्फ 53 रन बनाये लेकिन 197 गेंद खेली. इसके बाद भारतीय गेंदबाजों के पास समय ही कहां बचता था. दूसरा कारण था-अश्विन का नहीं चलना. अश्विन से खतरनाक तो जड़ेजा लग रहे थे.

ठीक है मैच ड्रॉ हो गया, इसका हर किसी को अफसोस है लेकिन इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि टॉस जीतने के बाद ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में जो बैटिंग की थी, उससे दबाव भारत पर बन चुका था. भविष्यवाणी भी यही थी कि विकेट दूसरे दिन से ही टर्न करेगा. भारत टॉस हार चुका था, इसलिए सारा कुछ भारत के खिलाफ ही जा रहा था. धन्यवाद देना चाहिए भारत के बल्लेबाजों को, जिसने ठोस बल्लेबाजी की और विशाल स्‍कोर (603 रन) खड़ा किया. मुरली विजय और राहुल की ठोस शुरुआत रही. लेकिन मैच को बचाने और बढ़त दिलाने में पुजारा (दोहरा शतक) और साहा (शतक) का योगदान रहा. इन दोनों के खेल से इतना लग गया था कि भारत मैच हारनेवाला नहीं है. उस समय तक जीत के बारे में कोई सोच भी नहीं रहा था. लेकिन जब जड़ेजा ने ताबड़तोड़ बल्लेबाजी की और बड़ी बढ़त बना ली, फिर पहले दिन के बाकी समय में दो विकेट साफ कर दिया तब लगा कि भारत अब जीत भी सकता है. अंतिम दिन जब 63 रन पर चार विकेट (स्मिथ भी) चले गये तो जीत की उम्मीद बन गयी थी. भारतीय गेंदबाज चढ़ गये थे. गेंदबाजी तो ठीक-ठाक हो रही थी लेकिन बाद में विकेट नहीं मिल रहे थे. हां, एक-दो मौके भी मिले लेकिन कैच छूट गया. कोहली कुछ नया प्रयोग नहीं कर सके. गेंदबाज सिर्फ चार थे, इसलिए भारत के पास बहुत ज्यादा विकल्प भी नहीं था.

भारतीय तेज गेंदबाजों ने थोड़ी लापरवाही जरूर की. जब ऑस्ट्रेलिया की टीम दबाव में थी, तो गेंद लगातार बाहर फेंक कर गेंद को बर्बाद की. मार्श और हैंड्सकांब गेंद को छोड़ते गये. ऐसा लगने लगा था कि भारत मैच बचाने के लिए खेल रहा है. चार विकेट गिराने के बाद भारत दबाव बनाने में असफल रहा. ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजों को तो मैच बचाना था. यही उन्‍होंने किया. रन बनाने का जोखिम क्‍यों लेते, नहीं लिया. मैच बराबरी पर खत्म. भारत के लिए आत्मविश्वास की बात. छह सौ से ज्यादा रन बनाया जो इस सीरिज में कभी नहीं बनाया था. ऑस्ट्रेलिया भी खुश क्‍योंकि उसने मैच बचा लिया. दोनों खुश.

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