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कांग्रेस को टक्कर देने की तैयारी में भाजपा

Updated at : 06 Mar 2016 8:58 AM (IST)
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कांग्रेस को टक्कर देने की तैयारी में भाजपा

डॉ मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें असम पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है. इसकी वजह भी साफ है. असम अकेला ऐसा राज्य है, जहां पिछले विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतनेवाली भाजपा को लग रहा है कि वह सत्ता की दौड़ में है. अन्य चार […]

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डॉ मुकेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार
जिन पांच राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें असम पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है. इसकी वजह भी साफ है. असम अकेला ऐसा राज्य है, जहां पिछले विधानसभा चुनाव में पांच सीटें जीतनेवाली भाजपा को लग रहा है कि वह सत्ता की दौड़ में है. अन्य चार राज्यो में वह हाशिये पर है.
इसीलिए उसने असम में पूरा जोर भी लगा रखा है. यह और बात है कि 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को उखाड़ने में उसके पसीने छूट रहे हैं.
प्रदेश भाजपा तो महीनों से तैयारियों में लगी ही हुई है, अमित शाह और राम माधव जैसे शीर्षस्थ नेता भी पूरा दिमाग वहीं खर्च कर रहे हैं. समूचा केंद्रीय मंत्रिमंडल लगभग डेढ़ साल से असम के मोर्चे पर तैनात है. खुद प्रधानमंत्री कई दौरे कर चुके हैं और बोडो पीपुल्स फ्रंट को अपने पाले में लाने के लिए एक हजार करोड़ रुपये का पैकेज भी घोषित कर चुके हैं. हालांकि, अभी तक कुल सौ करोड़ पहुंचे हैं और मुख्यंमंत्री तरुण गोगोई इसका मजाक बना रहे हैं.
जीत की उम्मीद में भाजपा ने कई समझौते भी कर डाले हैं. सारदा मामले में दागी हेमंतबिस्व सरमा को पार्टी में शामिल करने से लेकर मुख्यमंत्री पद के लिए अपना उम्मीदवार घोषित करने और असम गण परिषद्, बीपीएफ आदि से महागंठबंधन बनाने तक हर फाॅर्मूला वह आजमा रही है. इस चक्कर में उसका मिशन-84 मजाक का विषय भी बन गया है, क्योंकि इतनी सीटों पर वह अब चुनाव भी नहीं लड़ पा रही है. सहयोगी दलों को लगभग 46 सीटें देने के बाद उसके हिस्से में 126 में से 80 सीटें ही बचेंगी. जाहिर है कि सभी सीटों पर तो उसे विजय मिलने से रही. वह इस खुशफहमी में भी जी रही है कि लोकसभा चुनाव में 66 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी, इसलिए यहां वह अपने प्रदर्शन को दोहरा सकती है.
लेकिन दिल्ली एवं बिहार के चुनाव ने दिखला दिया है कि विधानसभा चुनाव में लोकसभा चुनाव की सफलता दोहराई नहीं जा सकती. दूसरी ओर कांग्रेस है, जो पंद्रह साल से सत्ता में होने और सत्ता विरोधी लहर होने की आशंका के बावजूद ताल ठोंक कर चुनौती दे रही है. तरुण गोगोई की अगुआई में वह कहीं से कमजोर नहीं दिख रही, बल्कि अत्यधिक आत्मविश्वास से भरी हुई है और आक्रामक भी है. कांग्रेस नेताओं की सभाओं में भीड़ भी खूब जुट रही है, जो इस बात का संकेत है कि कांग्रेस की चमक फीकी भले ही पड़ी हो, मगर वह निस्तेज नहीं हुई है. भाजपा के मुकाबले उसे बढ़त मिली हुई है.
चुनाव का तीसरा कोण इत्र के व्यापारी बदरुरद्दीन अजमल का ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट है, जो भाजपा द्वारा किये जा रहे हिंदू-मुसलिम ध्रुवीकरण का लाभ उठाने की ताक में है. पिछली विधानसभा में वह दूसरी सबसे पार्टी थी. ध्यान रहे कि असम में 34.2 फीसदी है, जो कि किसी भी भारतीय राज्य में सबसे ज्यादा है. दूसरे, करीब चालीस फीसदी सीटों पर मुसलिम मतदाता निर्णायक हैसियत रखते हैं, यानी इन सीटों पर वोट या तो एआइयूडीएफ के पक्ष में पड़ेंगे या फिर कांग्रेस के पक्ष में. भाजपा को कहीं से कुछ नहीं मिलनेवाला है.
वैसे तो चुनाव के मुद्दे कई हो सकते हैं, मगर भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बल पर फतह हासिल करना चाहती है. इसके लिए वह अवैध बांग्लादेशियों के मुद्दे को गरमाती रही है.
लेकिन लगता नहीं है कि इसका विशेष लाभ मिल पायेगा, क्योंकि असम के एक छोटे से वर्ग को छोड़ कर बाकी को इसमें कोई दम नहीं दिखता. वे असम आंदोलन और उसके बाद असम गण परिषद् के दो कार्यकाल में इसका हश्र देख चुके हैं. हां, इसका अगर उल्टा असर हुआ, तो कांग्रेस की लॉटरी लग सकती है.
(लेखक लंबे समय तक पूर्वोत्तर में कार्यरत रहे हैं़)
असम
कुल सीटें- 126
वर्तमान विधानसभा
कांग्रेस 78
एआइयूडीएफजी 18
बीएफपी 12
एजीपी 10
भाजपा 5
अन्य 3
कुल मतदाता- दो करोड़ (2016)
चुनाव कबः
चार अप्रैल- 65 सीटें
11 अप्रैल- 61 सीटें
प्रभावी कारक
– शासन, सांप्रदायिक तनाव, विस्थापन, जनसंख्या में असंतुलन, भ्रष्टाचार मुख्य मुद्दे हैं.
– राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहे तरुण गोगोई को अपने कामकाज पर भरोसा है, तो विपक्ष एंटी-इन्कम्बेंसी फैक्टर को भुनाने की जुगत में लगा है.
– भाजपा हेमंत बिस्वाल और अन्य कुछ कांग्रेसी नेताओं को अपने पाले में लाने में सफल रही है. भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में सर्बानंद सोनोवाल के नाम की पूर्व घोषणा से भी भाजपा को लाभ मिलने की आशा है.
– गोगोई की जीत कांग्रेस के हौसले में भारी इजाफा कर सकती हैं, वहीं भाजपा की जीत पूर्वोत्तर में उसके बढ़ते जनाधार का परिचायक होगा. जीत से उसे राज्यसभा चुनाव में भी फायदा हो सकता है.
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