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शिक्षकों के गले में लटके पत्थर जैसा एमडीएम

Updated at : 23 Feb 2016 6:32 AM (IST)
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शिक्षकों के गले में लटके पत्थर जैसा एमडीएम

शिक्षकों को नहीं दिया गया है व्यवस्था का प्रशिक्षण, शिक्षकों की रुचि भी नहीं श्रीश चौधरी डिस्टंग्विश्ड प्रोफेसर जीएलए विश्वविद्यालय मथुरा मध्याह्न भोजन सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के गले में लटका एक बड़ा पत्थर है. न तो इन शिक्षकों को इसकी व्यवस्था का प्रशिक्षण है, ना ही अधिकतर शिक्षकों की इसमें कोई रुचि है. अन्य […]

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शिक्षकों को नहीं दिया गया है व्यवस्था का प्रशिक्षण, शिक्षकों की रुचि भी नहीं
श्रीश चौधरी
डिस्टंग्विश्ड प्रोफेसर
जीएलए विश्वविद्यालय मथुरा
मध्याह्न भोजन सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के गले में लटका एक बड़ा पत्थर है. न तो इन शिक्षकों को इसकी व्यवस्था का प्रशिक्षण है, ना ही अधिकतर शिक्षकों की इसमें कोई रुचि है.
अन्य सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं में जहां भी भोजन पकाने-परोसने की व्यवस्था है, वहां यह व्यवस्था इस कार्य के लिए प्रशिक्षित लोगों के हाथ में हैं, परंतु इससे भी कठिन काम सरकार द्वारा दिये गये पैसों में इसकी व्यवस्था करना है.
अन्य वस्तुओं की निर्धारित मात्रा एवं दर भी कुछ ऐसी ही है, परंतु बाजार भाव तथा दैनिक जीवन की अन्य सच्चाइयां इन मात्राओं एवं दरों को एक कल्पना मात्र रहने देते हैं. पचास किलो वाले चावल के बोरे जो स्कूलों को दिये जाते हैं, उनमें कथित रूप से अक्सर पांच से दस किलो तक चावल कम होता है.
दाल के लिए मात्र 74 रु पये प्रति किलो का दर निर्धारित है, परंतु इसका बाजार भाव इससे कहीं अधिक है. नमक के साथ मसालों के लिए एवं तेल आदि के लिए जितने पैसे निर्धारित हैं, उनमें स्वादिष्ट एवं पौष्टिक भोजन दे पाना एक कठिन काम है. कई स्कूलों में अभी भी खाने-पकाने का गैस उपलब्ध नहीं है. जलावन की लकड़ी बिहार के गांव में भी 10 रुपये प्रति किलो की दर से बिकती है.
शहर में कुछ ज्यादा ही हो सकता है. पैसे भी उपिस्थति के आधार पर दिये जाते है. कई शिक्षकों का मानना है कि जितने बच्चे स्कूल आते हैं, उनकी उपस्थिति के अनुसार उन्हें खाना देना कठिन काम होगा. स्थिति से निपटने के लिए काल्पनिक आंकड़े भी जुटाने पड़ जाते हैं. कुछ शिक्षक ऐसी स्थिति से प्रसन्न हो सकते हैं, परंतु अधिकांश इसे गले से लटका पत्थर मानते हैं, जो किसी दिन उन्हें ले डूबेगा. मध्याह्न भोजन की व्यवस्था एवं गुणवत्ता से संबंधित अन्य और कई समस्याएं हैं, जिनकी समीक्षा और जिन पर पुनर्विचार होना चाहिए.

मध्याह्न भोजन के विभिन्न वस्तुओं के लिए एवं विभिन्न श्रेणी के बच्चों के लिए सरकार द्वारा दिये गये पैसों का दर निम्नांकित है.
श्रेणीकक्षाएंप्रति छात्र फंडवस्तुमात्रा
माध्यमिक1 से 5रु 5.65चावल150 ग्राम
प्राथमिक1 से 5रु 3.77चावल100 ग्राम
माध्यमिक…………दाल30 ग्राम
प्राथमिक…………दाल20 ग्राम
प्राथमिक……0.19मसाले……
प्राथमिक……1.00कुकिंग गैस……
माध्यमिक……1.50चावल……
प्राथमिक…………सब्जी50 ग्राम
माध्यमिक…………सब्जी75 ग्राम
प्राथमिक…………सरसों तेल50 मिली
माध्यमिक…………सरसों तेल75 मिली
मिला-जुला कर स्थिति यह है कि स्कूलों में मध्याह्न भोजन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं हो रहा है. ऐसे स्कूलों के बच्चे बड़े होकर क्या करेंगे? राष्ट्रीय एवं प्रादेशिक स्तरों पर उपलब्ध आरक्षण का लाभ भी इन्हें नहीं मिलेगा, राष्ट्रीय स्तर पर वह लाभ साठ से सत्तर प्रतिशत तक केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु एवं बंगाल तथा दो एक अन्य शहरी राज्यों के बच्चे ले जाते हैं.
बिहार-झारखंड के ये बच्चे प्राय: विभिन्न प्रकार की दैनिक मजदूरी करने को ही बाध्य होंगे, और इन बच्चों के भविष्य पर खड़े राज्य कैसे होंगे!
आवश्यकता है, मेरी राय में सबसे बड़ी आवश्यकता है, स्मार्ट स्कूलों की. देश और प्रदेश के कुल स्कूली बच्चों का सत्तर प्रतिशत के करीब अभी भी सरकारी विद्यालयों में पढ़ रहा है. यदि इनकी ही शिक्षा आधुनिक काल एवं स्तर के अनुकूल नहीं होगी तो समाज और देश कैसा होगा. विश्व का कोई भी विकिसत समृद्व एवं शक्तिशाली देश और समाज अपनी प्राथमिक शिक्षा की ठोस नींव पर ही खड़ा है. इस नियम का कोई भी अपवाद नहीं हैं. जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, पश्चिमी यूरोप एवं दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देश अपनी आय का एक अच्छा अंश स्कूली शिक्षा पर खर्च करते हैं. यदि हम भी एक सशक्त भारत एवं बिहार-झारखंड बनाना चाहते हैं, तो आवश्यकता स्मार्ट शहरों से कहीं अधिक स्मार्ट स्कूलों की है.
स्मार्ट स्कूल कैसे हों?
– हर कक्षा के लिए हवा-धूपयुक्त एक कमरा हो
– हर कमरे में सचित्न पुस्तकों का एक छोटा संग्रह हो
– हर कमरे में छोटे छोटे डेस्क एवं कुर्सी बेंच हों
– हर कमरे में कई चैनलों वाला टीवी कनेक्शन हो
– हर कमरे में वाइ-फाइ के साथ कंप्यूटर हो
– हर स्कूल में खेल का मैदान एवं खेल के उपकरण हों,
– हर स्कूल में पानी, बिजली एवं शौचालय हों,
– हर बीस बच्चे पर या कम-से-कम हर कक्षा के लिए एक प्रशिक्षित शिक्षक हो
– हर स्कूल में संगीत, कला एवं विज्ञान के लिए स्वचालित व्यवस्था हो
– हर स्कूल में पढ़ाई के अतिरिक्त खेल, संगीत, साहित्य, विज्ञान आदि की बाल-सुलभ सुविधाओं की व्यवस्था हो
– हर दिन स्कूल छह घंटे चले
– हर स्कूल कम-से-कम 250 दिन काम करे.
मकान एवं शिक्षकों के वेतन के अतिरिक्त प्रति स्कूल सालाना कुछ लाख रुपये का ही खर्चा इन चीजों की व्यवस्था में आयेगा. फिर ये सारी चीजें सभी स्कूलों में एक साथ ही नहीं करनी है. योजनाबद्ध तरीके से चार-पांच वर्षों में बारी-बारी से सभी स्कूलों के लिये इन सुविधाओं की व्यवस्था हो सकती है.
आवश्यकता इच्छाशक्ति की है. कुछ वर्षों पहले कौन कह सकता था कि सभी बच्चों को स्कूल में ही भोजन मिल जायेगा, परंतु आज यह एक आश्चर्य नहीं करने वाला यथार्थ है. पैसे हमारे पास हैं. आवश्यकता इच्छा शक्ति एवं उनके उचित नियोजन की है.
आवश्यकता एक सामाजिक आंदोलन की भी है. जहां आये दिन हमारे शहरों-देहातों में किसी न किसी बहाने से पार्टी, भोज, जन्म से श्रद्ध, विवाह, उपनयन, जन्मदिन, कीर्तन भजन आदि पर लाखों रु पये खर्च होते हैं, वहां उसी पड़ोस में स्कूल के बच्चों के लिए एक फुटबॉल, वॉलीबॉल, कबड्डी, गिल्ली-डंडा तक की व्यवस्था न हो एवं स्कूल के समय में वहां मंदिरों-घरों से टांग कर लाउडस्पीकर बजाया जाये, यह न सिर्फ लज्जा की बात है, बल्कि यह एक गंभीर नैतिक अपराध है. अक्षम्य है.
आवश्यकता एक और सामाजिक आंदोलन की भी है. हमारे समाज के हर शहरी गांव में हजारों की संख्या में इतने पढ़े लिखे लोग तो उपलब्ध ही हैं, जिन्हें थोड़े-से प्रशिक्षण से कम-से-कम निचली कक्षाओं में हर दिन कुछ घंटे ट्यूशन मास्टर की तरह पढ़ाने का काम दिया जा सकता है. आवश्यकता स्मार्ट सोच की है. स्मार्ट सोच हो तो स्मार्ट स्कूल बनेंगे, एवं स्मार्ट स्कूल हुए तो स्मार्ट शहर-देहात स्वयं उत्पन्न होंगे.
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