बस्तर यात्रा : विश्वरक्षा की पाठशाला है नया गोटुल

Updated at : 24 Jan 2020 8:11 AM (IST)
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बस्तर यात्रा : विश्वरक्षा की पाठशाला है नया गोटुल

जसिंता केरकेट्टा रंग-बिरंगी साड़ियां पहने, माथे पर सफेद रंग की पट्टी बांधे, पारंपरिक गहनों से लदी, बालों में कलगी खोंसे लया (लड़कियां) और सफेद धोती, गले में गहने पहने, सिर पर सफेद गमछा बांधे, कलगी खोंसे लयोर (लड़के) एक साथ गोटुल की ओर बढ़ रहे हैं. वे एक साथ, एक जगह अपने सयानों (बड़े-बुजुर्ग) को […]

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जसिंता केरकेट्टा
रंग-बिरंगी साड़ियां पहने, माथे पर सफेद रंग की पट्टी बांधे, पारंपरिक गहनों से लदी, बालों में कलगी खोंसे लया (लड़कियां) और सफेद धोती, गले में गहने पहने, सिर पर सफेद गमछा बांधे, कलगी खोंसे लयोर (लड़के) एक साथ गोटुल की ओर बढ़ रहे हैं. वे एक साथ, एक जगह अपने सयानों (बड़े-बुजुर्ग) को सेवा जोहार कर रहे हैं. पुरखों को भी हथेलियां खोल, हवा में हाथ उठाकर सेवा-सेवा कह रहे हैं. एक ओर गांव के बुजुर्ग पेन पुरखों की पूजा कर रहे हैं. लया-लयोर एक साथ झुककर उन्हें सेवा जोहार कर रहे.
यह छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग है. बस्तर के कांकेर जिला के खैरखेड़ा गांव का खैरखेड़ा जंगल. यहीं दिसम्बर की ठंड में देश भर से 600 से अधिक चयनित आदिवासी युवा जुटे हैं. यह ‘अखिल भारतीय गोंडवाना गोंड महासभा’ के बैनर तले पांच दिनों का केंद्रीय प्रशिक्षण शिविर है, जिसे कोया भूमकाल क्रांति सेना ने आयोजित किया है.
यह संगठन 15 सालों से लगातार भाषा, संस्कृति, प्रकृति, पेन पुरखों पर आस्था व आदिवासी व्यवस्थाओं का वैज्ञानिक, दार्शनिक, सांस्कृतिक अध्ययन कर रहा है और नयी पीढ़ी तक इसे पहुंचाने का काम कर रहा है. ये गतिविधियां छत्तीसगढ़ ही नहीं मध्यप्रदेश, ओड़िशा, महाराष्ट्र तक फैली हैं.
गोटुल को मिला एक बड़ा फलक : प्रशिक्षण शिविर एक नये तरीके का गोटुल है. नये और व्यापक स्वरूप में. कोया शब्द का अर्थ ‘मां के गर्भ से पैदा होनेवाला मनुष्य’ है. इस नयी व्यवस्था में सिर्फ कोया आदिवासी युवा नहीं, बल्कि दूसरे आदिवासी समुदाय के युवा भी इसका हिस्सा बनते हैं. यह उन्हें धर्म व जाति के हिंसात्मक संघर्ष से दूर विश्वरक्षक बनने को प्रेरित करता है. विश्वरक्षक के रूप में प्रकृति की रक्षा करने, अपनी भाषा-संस्कृति के पीछे छिपे एक बड़े जीवन दर्शन को समझने और उस जीवन शैली को जीने का आह्वान करता है.
यह कहता है कि प्रकृति की रक्षा सिर्फ आदिवासी समुदाय की रक्षा नहीं है, बल्कि यह सभी मनुष्यों की रक्षा है. धरती पर जीवन की रक्षा है. जंगल की रक्षा से ही पर्यावरण की रक्षा होगी और पर्यावरण की रक्षा से ही विश्व के मनुष्यों की. जंगल जीवों की विविधता को भी बचाए रखता है.
किसी एक प्रजाति के विलुप्त होने या नष्ट होने का दूसरे जीवों के जीवन पर भी असर पड़ता है. पर्यावरण का संतुलन बिगड़ता है. आदिवासी समाज की प्रकृति पर आस्था, ग्राम व्यवस्था, पेन पुरखों की शक्ति या उसकी गोत्र व्यवस्था, यह सबकुछ प्रकृति में जीवों के संतुलन को बनाये रखने में मदद करती हैं. गोटुल का नया स्वरूप इन सारे विषयों पर बात करता है.
सामूहिक वनाधिकार के तहत मिला जंगल : केबीकेएस ने लंबे संघर्ष के बाद खैरखेड़ा ग्राम को सामूहिक वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत ख़ैरखेड़ा जंगल के बड़े हिस्से पर सामूहिक मान्यता दिलायी है. इसलिए ग्रामीणों ने 65 एकड़ जमीन उन्हें सामाजिक कार्यों के लिए दी है.
खैरखेड़ा के इसी जंगल में केबीकेएस ने गोटुल को एक नया रूप देने का काम किया है. शिविर से पहले महीनों की तैयारी के दौरान केबीकेएस से जुड़े युवा नार्रे या ग्राम व्यवस्था का मॉडल तैयार करते हैं. ऐसे घरों का निर्माण करते हैं जो सिर्फ बांस से बने होते हैं. तालाब, गोहर घर, अखड़ा सबकुछ बांस से बनाते हैं. पेड़ों पर मचान तैयार करते हैं. इस नार्रे व्यवस्था में पूजा की जाने वाली जगहों को भी दर्शाया जाता है. पुरखों की कौन सी शक्ति किस जगह रहती है और कैसे इस पूरे व्यवस्था को संतुलित रखने में अपनी भूमिका निभाती है.
प्रतिद्वंद्विता नहीं, प्रेम और मित्रता की सीख : युवाओं को गोटुल में खेले जानेवाले गोटुल करसना (खेल) के बारे जानकारी दी जाती है. गोटुल में प्रेम व मित्रता के बिना कुछ भी नया नहीं सीखा जा सकता. यह प्रतिद्वंद्विता नहीं सिखाता. प्रेम व मित्रता से ही दूसरे व्यक्ति को बिना बोले भी समझा और महसूस किया जा सकता है. तभी किसी समाज में मनुष्यों और जीवों के बीच बेहतर सामंजस्य की स्थापना हो सकती है. गोटुल कहता है कि धरती पर मनुष्यों ने हजारों सालों से आपसी सहयोग से ही अपना अस्तित्व बचाये रख सका है. युद्ध और हिंसा से धरती नहीं बच सकती. शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य होने के गुणों और प्रकृति के साथ अपने संबंधों को मजबूत करना है. शिक्षा का उपयोग दुनिया और प्रकृति को नष्ट करने के लिए नहीं होना चाहिए.
स्व-रोजगार और स्वास्थ्य पर भी चर्चा : यह गोटुल युवाओं को आदिवासियों के लिए संविधान में दिये अधिकारों से भी अवगत कराता है. यहां उन्हें स्वरोजगार की जानकारियां दी जाती हैं. सरकारी नौकरियों में जाने के लिए जरूरी जानकारी उपलब्ध करायी जाती है. उन्हें स्वास्थ्य संबंधी जानकारियां दी जाती है जो आदिवासियों के पारंपरिक खान-पान से संभव है. केबीकेएस के युवा ब्लड बैंक तैयार करते हैं, ताकि दूरदराज में रहनेवाले लोगों को जरूरत पड़ने पर समय पर खून मिल सके. इस दौरान स्त्रियों के स्वास्थ्य पर भी बात होती है.
दुनिया भर में प्राचीन काल से आदिवासियों के अपने शिक्षण केंद्र रहे हैं
भाषा-संस्कृति, वाद्य-यंत्रों, प्रकृति पर आस्था को सहेजने की पहल
केबीकेएस युवाओं को जंगल की शिक्षा को आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से देखने का नजरिया देने का काम कर रहा है. यह भाषा, संस्कृति, वाद्य-यंत्रों, प्रकृति पर अपनी आस्था को बचाने के काम में जुटा है. इसने विश्व के प्राचीन और पहले शिक्षण केंद्र गोटुल, जिसकी गलत व्याख्या के कारण आदिवासी समाज के ऐसे शिक्षण केंद्र टूटने लगे, उसे नये रूप में खड़ा करने का काम कर रहा है. गोटुल की पुरानी परंपरा की तरह नये गोटुल का अनुशासन भी सख्त है. नियम न मानने, समय का पाबंद न होने या नशा करने पर दंड का प्रावधान है.
दुनिया का पहला शिक्षण केंद्र है गोटुल
गोटुल को विश्व का पहला और सबसे प्राचीन शिक्षण केंद्र कहा जा सकता है. लेकिन इतिहास में इसकी व्याख्या आदिवासी नजरिये से नहीं की गयी. तथाकथित सभ्य समाज ने इसे बदनाम करने का भरसक प्रयास किया.
हिंदी में जिसे ‘घोटुल’ कहा जाता है वह गोटुल का विकृत रूप है. गोंडी भाषा में घोटुल जैसा कोई शब्द नहीं है. कोया आदिवासी इसे ‘गोटुल’ कहते हैं. ‘गो’ का अर्थ है ज्ञान, मन, मां आदि. ‘टुल’ का अर्थ है ठाना, केंद्र, जगह, स्थान. हर आदिवासी समुदाय के नाम का अर्थ ही ‘मां के गर्भ से पैदा होने वाला मनुष्य’ है. भाव यह है कि मनुष्य धरती पर स्वत: नहीं आ जाता. गोटुल पारंपरिक ज्ञान का केंद्र है और दुनिया भर में प्राचीन काल से आदिवासियों के ऐसे शिक्षण केंद्र रहे हैं.
तैयार हो रहा पारंपरिक बीज बैंक
प्रशिक्षण शिविर में आनेवाले युवा अपने साथ पारंपरिक बीज लेकर आते हैं. इन बीजों का एक बीज बैंक बनाया जा रहा है. दूसरे राज्यों के आदिवासी समुदायों में बांटने और उन्हें अपने अपने क्षेत्रों के बीजों के संग्रहण के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि पारंपरिक खाद्य व्यवस्था को बचाया जा सके. देशभर से शिक्षित आदिवासियों को जो नौकरियों में हैं, प्रशासन में हैं, आर्थिक सशक्त हैं, उन्हें भी आदिवासी व्यवस्था की वैश्विक महत्ता समझने और उसे बचाये जाने के संघर्ष में जोड़ने का काम किया जा रहा है.
जंगलों में छिपी हैं ज्ञान की बातें
कई सालों से जंगलों में घूम-घूम कर प्रकृति का अध्ययन करने वाले नारायण मरकाम युवाओं को गोटुल खेलों के तरीके सिखाते हैं. उन्होंने बताया कि प्रकृति में जीवों को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि प्रकृति के पास खेल और व्यायाम के अपने अनोखे तरीके हैं, जिससे न सिर्फ शरीर बल्कि लोगों के साथ हमारा संबंध और हमारी सामाजिक व्यवस्था भी स्वस्थ रहती है. जंगल ही आदिवासियों की शिक्षा का विशाल केंद्र है.
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