जानें भारत में विधवाओं की स्थिति के बारे में

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 Sep 2019 8:08 AM

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किसी भी समाज में वैवाहिक साथी की मृत्यु हो जाने के बाद हालात काफी चिंताजनक हो जाते हैं. इससे उत्पन्न वित्तीय और आर्थिक समस्याएं तो कई बार इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उनका समाधान बहुत मुश्किल नजर आता है, विशेषकर जब मृतक परिवार का एकमात्र कमाई करनेवाला व्यक्ति हो. ऐसे हालात में महिलाओं की […]

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किसी भी समाज में वैवाहिक साथी की मृत्यु हो जाने के बाद हालात काफी चिंताजनक हो जाते हैं. इससे उत्पन्न वित्तीय और आर्थिक समस्याएं तो कई बार इतनी बड़ी हो जाती हैं कि उनका समाधान बहुत मुश्किल नजर आता है, विशेषकर जब मृतक परिवार का एकमात्र कमाई करनेवाला व्यक्ति हो. ऐसे हालात में महिलाओं की स्थिति कहीं अधिक दयनीय होती है.
ज्यादातर समाज में महिलाओं के मुकाबले सभी प्रकार के धन और संपत्तियों पर गैर अनुपातिक ढंग से मालिकाना हक पुरुषों का होता है. लैंगिक स्तर पर यह विषमता सामाजिक और पारिवारिक स्तर पर ही नहीं, बल्कि आमदनी और कमाई में भी होती है. खानदानी जमीन-जायदाद में मालिकाना हक जैसे मामलों में महिलाओं की स्थिति हमेशा कमतर होती है. विधवा होने की स्थिति में इसका प्रभाव बहुत बड़ा होता है, जो असहनीय स्तर तक पहुंच जाता है. विधुर पुरुष की तुलना में विधवा महिला के हालात इतने खराब हो जाते हैं कि कई बार तो जीवन यापन तक मुश्किल हो जाता है.
5.5 करोड़ से अधिक विधवाएं हैं भारत में
दुनिया के कई देशों के मुकाबले में भारत में लैंगिक स्तर पर कई समस्याएं हैं. इसका असर सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है. एक अनुमान के मुताबिक भारत में साढ़े पांच करोड़ से अधिक विधवाएं हैं. यह संख्या दक्षिण अफ्रीका और तंजानिया जैसे देशों की आबादी के लगभग बराबर है. विधवाओं की यह संख्या दक्षिण कोरिया या म्यांमार की आबादी से अधिक है.
समाज का नकारात्मक दृष्टिकोण
सामाजिक स्तर पर नकारात्मक दृष्टिकोण की वजह से विधवाओं को कई कठिनाइयों और अभावों का सामना करना पड़ता है. समाज द्वारा उन पर और उनके क्रियाकलापों पर कई प्रकार की पाबंदियां लगा दी जाती हैं.
पितृसत्तात्मक रीति-रिवाजों, धार्मिक मान्यताओं और विरासती अधिकारों का भेदभाव पूर्ण असर होता है. कई विधवा महिलाओं को परिजनों द्वारा उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार होना पड़ता है. संपत्ति विवादों में अक्सर मामले विधवाओं से ही जुड़े होते हैं.
अनाथ जैसी स्थिति में भी हैं विधवाएं
विधुर पुरुषों के मुकाबले विधवाओं के पुनर्विवाह के मामले बहुत कम सामने आते हैं. तमाम सांस्कृतिक बंधनों में दबी ऐसी औरतों को अक्सर समाज और स्थानीय समुदाय नजरअंदाज कर देता है. वैवाहिक संपत्ति के बंटवारे में और बच्चों पर अधिकार में महिलाओं को वंचित कर दिया जाता है. कम संपत्ति और आय वाले परिवारों में विधवाओं को पूर्ण रूप से दरकिनार कर देने, यहां तक विधवा आश्रमों में भेज देने का भी चलन है. विधवा औरत की यह स्थिति बिल्कुल शरणार्थियों जैसी होती है. देश के कई शहरों में विधवाओं का आश्रम है, जहां निराश्रित महिलाओं शेष जीवन गुजार रही हैं.
उम्रदराज विधवाओं की संख्या अधिक
देश में उम्रदराज विधवाओं की संख्या अपेक्षाकृत अधिक है. एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2001 से 2011 के बीच विधवा महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है. हालांकि, इसका एक कारण पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की जीवन प्रत्याशा का अधिक होना भी है. उम्रदराज विधवा महिलाओं की गैर समानुपातिक ढंग से संख्या बढ़ने का प्रमुख कारण ज्यादातर विधुर पुरुषों का पुनर्विवाह होना भी है.
कुछ दक्षिणी राज्यों में विधवाओं की संख्या अधिक
विधवाओं की संख्या राज्य-दर-राज्य बदलती रहती है. कुछ दक्षिण राज्यों (जैसे पुदुचेरी, तमिलनाडु और केरल) में गैर समानुपातिक ढंग से विधावाओं का अनुपात अधिक है. हालांकि, इन राज्यों में पुरुषों की मृत्यु दर अधिक नहीं है. मानव विकास मानकों पर पिछड़े राज्यों विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार आदि राज्यों में विधवा महिलाओं का अनुपात अपेक्षाकृत कम है.
विधवापन का ‘अभिशाप’
सदियों से विधवा महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित करने की परंपरा रही है. कई बार तो उन्हें पारिवारिक संपत्ति में अधिकारों से वंचित कर मायके भेज दिया जाता है.
विधवाओं के अधिकार, उनके धर्म, क्लास, जाति और क्षेत्र पर निर्भर करते हैं. हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत संयुक्त हिंदू परिवारों में विधवाओं को जीवनयापन के लिए न्यूनतम धन पाने का अधिकार है. विधवाओं के जीवन सुधार के लिए समय-समय पर देश में कानून बनाये गये, लेकिन आज भी हमारे देश में विधवाओं के सामान्य जीवन से जुड़े तमाम मसले हैं, जिनका हल किया जाना अनिवार्य है.
दो लाख हैं देश में बाल विधवाएं
0.45 प्रतिशत है हमारे देश में बाल विधवाओं (10-19 वर्ष के बीच) की संख्या, 2011 की जनगणना के अनुसार.
1.94 लाख बाल विधवाएं हैं देशभर में , बाल विधवा निषेध अधिनियम 2006 के बावजूद, जो बेहद चिंता वाली बात है.
9.0 प्रतिशत है 20-39 आयु वर्ग की विधवाओं की संख्या.
32 प्रतिशत है देश में विधवाओं की संख्या 40-59 आयुवर्ग में.
58 प्रतिशत है 60 वर्ष से अधिक उम्र की विधवाओं की संख्या देशभर में.
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