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वर्षांत 2018 : चुनौती भरी रही सामाजिक समरसता

Updated at : 31 Dec 2018 6:22 AM (IST)
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वर्षांत 2018 : चुनौती भरी रही सामाजिक समरसता

जैसे प्रकृति धरती को बंजर होने से बचाती है, ठीक वैसे ही साहित्य-कला-संगीत मनुष्यों को. लेखकों, कलाकारों की मौजूदगी समाज को सभ्य बनाती है, तो उनकी दृष्टि हमारे समय और समाज का दस्तावेज भी तैयार करती है. गुजरता साल उन्हीं के हवाले से आज की विशेष प्रस्तुति में… दु:स्वप्न जैसा गुजरा यह साल मंगलेश डबराल […]

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जैसे प्रकृति धरती को बंजर होने से बचाती है, ठीक वैसे ही साहित्य-कला-संगीत मनुष्यों को. लेखकों, कलाकारों की मौजूदगी समाज को सभ्य बनाती है, तो उनकी दृष्टि हमारे समय और समाज का दस्तावेज भी तैयार करती है. गुजरता साल उन्हीं के हवाले से आज की विशेष प्रस्तुति में…
दु:स्वप्न जैसा गुजरा यह साल
मंगलेश डबराल
वरिष्ठ कवि
साल 2018 एक दु:स्वप्न जैसा गुजरा है. कुछ ही चीजें अच्छी हुईं, नहीं तो बाकी चीजों ने बहुत निराश किया. इस साल ने हमें जो दिखाया है, वह निश्चित रूप से एक लोकतांत्रिक भारत के लिए ठीक नहीं है.
हमने समाज में सांप्रदायिक हिंसा को बढ़ते देखा. मुसलमानों और दलितों के प्रति हिंसा और विरोध को बढ़ते देखा. लेखकों, बुद्धिजीवियों और स्वतंत्र विचारकों पर तरह-तरह के दमन देखे. मीडिया को और भी गुलाम बनते हुए देखा. साहित्य, कला और सांस्कृतिक संस्थाओं में जहर फैलते और उन्हें अयोग्य हाथों में जाते देखा. हमने सत्ताधारी दल के विभिन्न मंत्रियों, नेताओं और समर्थकों के ऊटपटांग तर्क और मूर्खतापूर्ण बयानों की बाढ़ देखी, जिसका किसी भी प्रकार की वैज्ञानिकता से कोई संबंध नहीं है. कुल मिला कर अपने प्यारे देश को वैचारिक स्तर पर पीछे जाते देखा.
भविष्य के जो सवाल हैं, उनके जवाब अतीत में नहीं मिलते हैं. भविष्य के संबंध में अतीत के सिर्फ अनुभव काम आ सकते हैं, अतीत के तथ्य नहीं, लेकिन हमने बीते सालों में देखा कि भारत को किस तरह से उसके भविष्य के सारे जवाब अतीत से खोजने की सिर्फ कोशिशें ही नहीं हुईं, बल्कि जबरन कोशिशें हुईं. हमने देखा कि सत्तारूढ़ शीर्ष नेता किस तरह से एकाधिकारवादी राजनीति कर रहे हैं. यह सब एक दुखद जाल की तरह हमारे समाज पर छाया हुआ है, लेकिन यह भी सुखद है कि प्रतिरोध की आवाजें भी उठी हैं और लोग गलत का विरोध कर रहे हैं. आम जन का घुटन एक व्यापक असंतोष बनकर सामने आ रहा है.
हमारे देश का सामाजिक ताना-बाना बहुत मजबूत है. यहां जितने अधिक संप्रदाय, जातियां, धार्मिक शाखाएं, संस्कृतियां और इतने तरह के रहन-सहन हैं, शायद ही किसी अन्य देश में हों. इन सबके बीच अंतर्निर्भरता भी बहुत गहरे तक है, चाहे वह काम-काज की हो या फिर रहने-जीने-खाने की.
एक-दूसरे के बिना काम नहीं चलता है. ऐसे समृद्ध समाज में बीते सालों में ध्रुवीकरण करने की लगातार कोशिशें होती रहीं और बहुसंख्यकवादी वर्चस्व की राजनीति बेहद आक्रामक ढंग से समाज पर लादी गयी. इससे बहुत हमारा सामाजिक ताना-बाना कुछ टूटा है और सामाजिक दरारें आयी हैं, जिन्हें पाटने में अब काफी वक्त लगेगा. फिर भी, अंतत: यह सामाजिक ताना-बाना इतना मजबूत है कि उसकी आत्मा को अभी तक नुकसान नहीं पहुंचा है, जिसकी कोशिशें भ्रष्ट राजनीति करती रही है.
भारतीय जनमानस को चलानेवाले छोटे-मोटे उद्योग से लेकर बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक सद्भाव देखने को मिलता है, जिसे तोड़ने की कोशिशें हो रही हैं, मगर इसमें इतनी बहुवचनीयता है कि यह नहीं टूट रहा है. हमें आनेवाले साल से यही उम्मीद है कि यह कभी न टूटने पाये. हमारी बहुवचनीयता और विविधता ही हमारी ताकत है, जिसे किसी भी कीमत पर टूटने नहीं देना चाहिए. हिंदी के बड़े कवि रघुवीर सहाय कहते थे- हमारे यहां अनेकता में एकता नहीं है, बल्कि एकता में अनेकता है.
एकता में अनेकता वाले इस समाज को बहुत ज्यादा समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है. कुछ समय तक इसे गुमराह किया जा सकता है, लेकिन हमेशा नहीं, क्योंकि समाज की संरचना तो तोड़नेवालों को एक जवाब की तरह है. यही बात इस साल के दु:स्वप्न के सामने एक संबल बनी.
अब हमारा समाज जवाब देने लग गया है, क्योंकि यह पहचानने लगा है कि उसे बरगलाया जा रहा है. इसलिए नये साल में मुझे यही उम्मीद है कि यह समाज और मजबूती से जवाब देगा और गुमराह करनेवालों को डटकर जवाब देगा. हमारे देश का भविष्य और लोकतंत्र इस बात पर नहीं टिका हुआ है कि वह सांप्रदायिकता के साथ जीये.
यही वजह है कि बीते सालों में जिन लोगों ने इस समाज पर खतरा पैदा किया है, उन पर भी अब खतरों के बादल मंडरा रहे हैं. मैं समझता हूं कि आगामी साल से हमें इसी बात की उम्मीद होनी चाहिए कि हमें कोई गुमराह न करने पाये और हम एक बेहतरीन लोकतंत्र बनकर दुनिया में बड़ी मिसाल बनकर दिखाएं. हमें हर नये समय से उदार लोकतंत्र और सबको साथ लेकर चलनेवाले लोकतंत्र की जीत होनी चाहिए, हमें इसी बात की उम्मीद करनी चाहिए.
बरकरार रही असहिष्णुता
प्रो फैजान मुस्तफा
वीसी, नालसार यूनीवर्सिटी ऑफ लॉ
साल 2018 का हाल उसके पिछले सालों की परिणति थी. पूरे साल असहिष्णुता रही, जैसा उसके पिछले सालों में भी देखी गयी थी. एक अजीब तरह का माहौल रहा है.यह बहुत चिंता की बात है और विमर्श का विषय है कि जो देश सहिष्णुता के लिए पूरे विश्व में जाना जाता है, वहां जरा-सी बात पर कुछ लोग इकट्ठा होकर किसी को मार डालते हैं, मॉब लिंचिंग को अंजाम देते हैं. यह देश के लिए अच्छी बात नहीं है. बड़ा दुखद रहा है यह सब. पूरे साल समाज का माहौल बिगड़ा रहा और ऐसी स्थिति कहीं-कहीं अब भी बनी हुई है. यह हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है.
अगर किसी ने कोई जुर्म किया हो, तो कानून के मुताबिक उसको सजा हो, लेकिन भीड़ को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिए. इस एतबार से यह साल ठीक नहीं गुजरा. भीड़ को ही क्या, किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने का कोई अधिकार नहीं है. इससे समाज पर बुरा असर पड़ता है. हर हाल में ऐसी गतिविधियाें पर रोक लगायी जानी चाहिए. तभी यह मुमकिन है कि आनेवाले साल का हम बिना किसी संशय के स्वागत कर सकेंगे.
इस साल सुप्रीम कोर्ट के कुछ बड़े और अहम फैसले आये, जैसे कि धारा 377 और वयस्कता पर फैसले, लेकिन आधार कार्ड और राफेल पर जो फैसले आये, उनसे हमें बहुत निराशा हुई है. हालांकि, इन दोनों ही फैसलों की अब समीक्षा होने जा रही है.
इसलिए हम उम्मीद करते हैं कि आगामी साल, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले इतने रेशनल (तर्कसंगत) होंगे कि बौद्धिक लोग और देश की आम जनता भी उन फैसलों का स्वागत करेंगे और कोई भी उन फैसलाें पर संदेह नहीं करेगा.
कोर्ट से यह उम्मीद तो हमें हमेशा ही होनी चाहिए. लोगों को सबसे ज्यादा अगर किसी पर भरोसा है, तो वह ज्यूडिशियरी (न्यायपालिका) है और लोग यही सोचते हैं कि भले कहीं न्याय न मिले, लेकिन अदालतें उनके साथ न्याय करेंगी. इसलिए अदालतों से तर्कसंगत फैसले आने चाहिए, हम ऐसी उम्मीद करते हैं.
हमारे देश की एक पुरानी रवायत रही है सहिष्णुता. देश में इतनी विभिन्नताओं के साथ हम विचारों की विभिन्नता भी देखते हैं. हमारे खिलाफ आनेवाले विचारों को भी हम शांतिपूर्वक सुनते हैं और दूसरे के विचारों का सम्मान करते हैं, यही सहिष्णुता हमारे देश में सदियों से रही है.
इसी का बीते वर्षों में ह्रास हुआ है, जिसे संभाले जाने की जरूरत है. हम सामने वाले को बोलने का हक देते हैं और फिर उसका अहिंसक जवाब भी देते हैं, यही सहिष्णुता है. बीते कुछ वर्षों में तो यह कम हुई और इसकी जगह हिंसा और असहिष्णुता ने ले ली. हम उम्मीद करते हैं कि आगामी साल में ऐसी परिस्थितियां न बनें और हम खुशहाल एवं शांतिपूर्ण भविष्य की ओर तेजी से बढ़ें.
बीते दिनों अजमेर में एक लिटरेरी फेस्टिवल में बॉलीवुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह को शामिल नहीं होने दिया. यह बहुत ही भयानक है कि अब लिटरेरी फेस्टिवल को भी कट्टरपंथी हाइजैक कर लें! चाहे वह किसी भी धर्म के कट्टरपंथी हों, हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं हैं, क्योंकि हमारा लोकतंत्र स्वतंत्र विचारों का सम्मान करने के लिए जाना जाता है. समाज में हर एक को अपनी हर बात कहने का हक है.
यह अधिकार उसे हमारे संविधान से मिला है, लेकिन किसी को भी कानून को अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है, पर हो रहा है ठीक उल्टा. जो अपनी बात कहना चाहते हैं, उसे रोका जा रहा है और जो कानून अपने हाथ में ले रहे हैं, उन्हें बढ़ावा मिल रहा है. कुल मिला कर बीते साल के लेखा-जोखा में यही बात सामने आती है कि हम एक लोकतांत्रिक समाज में रहते हैं.
इसलिए हमें हमेशा अपने हक और अधिकार मालूम होने चाहिए, ताकि किसी की वजह से भी किसी दूसरे को कोई परेशानी न हो. आगामी साल से हम यही उम्मीद करते हैं कि समाज में सहिष्णुता बढ़े और लोग कानून अपने हाथ में न लें.
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