देश-विदेश की आर्थिक हलचलों से हिचकोले खाता रुपया
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 06 Sep 2018 7:36 AM
संदीप बामजई आर्थिक मामलों के जानकार सरकार के पास सीमित हैं विकल्प रुपया आजतक के अपने निम्नतम स्तर पर है और डॉलर के मुकाबले लगभग 72 के पास पहुंच गया है. इसके साथ ही रुपया अब दुनिया की छह सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक है. कच्चे तेल की कीमतों में आये उछाल से आयातित […]
संदीप बामजई
आर्थिक मामलों के जानकार
सरकार के पास सीमित हैं विकल्प
रुपया आजतक के अपने निम्नतम स्तर पर है और डॉलर के मुकाबले लगभग 72 के पास पहुंच गया है. इसके साथ ही रुपया अब दुनिया की छह सबसे कमजोर मुद्राओं में से एक है. कच्चे तेल की कीमतों में आये उछाल से आयातित वस्तुओं के मूल्य में भी बढ़ोतरी होगी, जिसका असर आम जनजीवन पर पड़ेगा. रुपये की इस चिंताजनक स्थिति के कारण भारत का व्यापारिक संतुलन भी बिगड़ रहा है और निवेशक यहां से पैसे निकालकर अमेरिका में निवेश कर रहे हैं. रुपये की इस गिरावट के कारण, प्रभाव और भारत के आर्थिक भविष्य की आशंकाओं पर प्रस्तुत है आज का इन-डेप्थ…
रुपये में आ रही लगातार गिरावट के पीछे कई महत्वपूर्ण कारक काम कर रहे हैं. चार कारक हैं, जिन्हें समझना बहुत जरूरी है.
पहला कारक
दुनिया के तमाम उभरते बाजार हैं (इमर्जिंग मार्केट), उनकी करेंसी डॉलर से लिंक है. इसलिए जब भी डॉलर मजबूत होगा, बाकी करेंसियों में गिरावट आ जायेगी. मसलन, टर्की भी भारत की तरह एक उभरता बाजार है, जिस पर अमेरिका बहुत बुरी तरह से आर्थिक दबाव डाल रहा है.
टर्की के राष्ट्रपति ने तो अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को यहां तक कह दिया है वह ऐसा भेड़िया है, जो हमारी अर्थव्यवस्था को बरबाद कर देगा. इस वक्त टर्की की मुद्रा लीरा 40 प्रतिशत नीचे आ गया है डॉलर के मुकाबले. गौरतलब बात यह है कि जबसे लीरा पर संकट आया है, भारतीय रुपये में भी तेजी से गिरावट आयी है, क्योंकि ये मुद्राएं डॉलर से लिंक हैं.
एक और मिसाल अर्जेंटीना का भी है. अर्जेंटीना की करेंसी पेसो में भी इस वक्त 50 प्रतिशत की गिरावट है डॉलर के मुकाबले. इसको संभालने के लिए अर्जेंटीना के राष्ट्रपति ने ब्याज दरों में 40-50 प्रतिशत की वृद्धि कर दी है, जिससे वहां के निवासियों पर आिर्थक दबाव बढ़ गया है. यह सब अमेरिकी नीतियों की वजह से हो रहा है.
दूसरा कारक
चीन-अमेरिका ट्रेड वार भी एक बड़ा कारक है, जो दुनिया के उभरते बाजारों में हलचल पैदा कर रहा है. इस ट्रेड वार के चलते, चीन और अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ता रखनेवाले देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ रहा है.
तीसरा कारक
कच्चे तेल के दाम में जरा सी भी बढ़ोतरी रुपये की गिरावट का बड़ा कारक है. भारत चूंकि तेल का सबसे बड़े आयातक देशों में एक है और भारत सालाना 110 बिलियन डॉलर का कच्चा तेल खरीदता है, जिसमें कि आॅयल पुल डेफिसिट (तेल मंगाने का घाटा) ही 85 बिलियन डॉलर है. कच्चे तेल में एक डॉलर की वृद्धि इस घाटे को बहुत ज्यादा बढ़ा सकती है. इसे समझते हैं. इस वक्त कच्चे तेल की कीमत 77 डॉलर प्रति बैरल है.
अगर यह 78 डॉलर प्रति बैरल हो जाता है, तो भारत को 6,000 करोड़ रुपये अतिरिक्त देना होगा तेल खरीदने के लिए, या कह सकते हैं कि 6,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा. वहीं सऊदी अरब यह चाहता है कि कच्चे तेल की कीमत 70 से 80 डॉलर प्रति बैरल ही तय कर दिया जाये, और कभी भी इससे नीचे न आने पाये. यही वजह है कि कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि भारतीय मुद्रा को कमजाेर बना रही है. कच्चे तेल की कीमत बढ़ती है, तो मुद्रास्फीति बढ़ती है और सरकारी बांड की कीमतें बढ़ जाती हैं.
चौथा कारक
चौथा कारक है अमेरिकी दादागिरी, जो कई देशों पर प्रतिबंध के रूप में सामने आ रही है. अमेरिका ने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाया है और आगामी नवंबर में वह ईरान के तेल पर भी प्रतिबंध लगायेगा. अभी से तेल आयातक कई बड़े देशों ने ईरान से तेल खरीदना बंद कर दिया है. अमेरिकी नीति यह है कि जो देश ईरान से तेल लेंगे, अमेरिका उनके खिलाफ कई आर्थिक प्रतिबंध लगा सकता है.
ईरान से चीन और भारत सबसे ज्यादा तेल खरीदते हैं. इसलिए यह संभावना भी है कि कल को यह दबाव भारत पर भी आयेगा, जब अमेरिका कहेगा कि भारत भी ईरान से तेल न खरीदे. यह बात न मानने पर क्या पता भारत के साथ भी अमेरिका ट्रेड वार पर उतर आये. तब भारतीय रुपया और अर्थव्यवस्था की हालत और भी खराब हो जायेगी.
विकल्प
जनवरी 2018 से लेकर अब तक भारतीय रुपये में 12.5 प्रतिशत की गिरावट आयी है. जो लोग या जो नेता यह कह रहे हैं कि रुपया कमजोर होने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर नहीं पड़ेगा, उन्हें सचेत हो जाना चाहिए और सरकार को भी चाहिए कि कोई ठोस कदम उठाये.
एक विकल्प यही है कि आरबीआई फ्यूचर और स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करे और डॉलर खरीदे. जिस तरह से पिछले दिनों भारतीय मुद्रा भंडार कम हुआ है, उससे लगता है कि संकट और बढ़ सकता है. मौजूदा सरकार के पास विकल्प भी सीमित हैं. इसलिए सरकार को चाहिए कि बहुत सोच-समझकर अब कोई ठोस कदम उठाये, ताकि निकट भविष्य के लिए कुछ बेहतर हो सके.
विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक हैं कारण
डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने के बाद अप्रैल-जून की अवधि में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के तीन बिलियन डॉलर से अधिक की राशि बाहर जाने और यूएस फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक कड़ाई की वजह से रुपये में एेतिहासिक गिरावट दर्ज हुई है.
– ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट
निवेशकों की अरुचि से अस्थिर हुआ है रुपया. उभरते बाजारों के प्रति कमजोर निवेशक भावना ने भारत में अस्थिर प्रवाह को बढ़ाया है.
– कून गोह, प्रमुख, एशिया रिसर्च, एएनजेड
रुपये का अवमूल्यन
वर्ष (31 दिसंबर को) मूल्य (प्रति डॉलर)
2010 44.7125
2011 53.015
2012 54.955
2013 61.795
2014 63.035
2015 66.1653
2016 (30 दिसंबर को) 67.855
2017 (29 दिसंबर को) 63.875
साल 2018 में रुपये की चाल
महीना मूल्य (प्रति डॉलर)
31 जनवरी 63.5825
28 फरवरी 65.21
29 मार्च 65.13
30 अप्रैल 66.51
31 मई 67.41
29 जून 68.51
31 जुलाई 68.535
31 अगस्त 71.005
5 सितंबर 71.90
रिकॉर्ड निम्नतम स्तर पर पहुंचा रुपया
भारतीय अर्थव्यवस्था के दिन ठीक नहीं चल रहे हैं. रुपये का मूल्य डॉलर के मुकाबले लगातार गिर रहा है और बुधवार को 71.90 प्रति डॉलर पर पहुंच गया. इस साल जनवरी से अब तक रुपये का मूल्य 12.5 फीसदी गिरा है.
पिछले सवा चार सालों में यह गिरावट 21.7 फीसदी की है. अब भारतीय रुपया रूस के रूबल, अर्जेंटीना के पेसो, ब्राजील के रिआल, तुर्की के लीरा और दक्षिण अफ्रीका के रैड के साथ दुनिया की छह सबसे कमजोर मुद्राओं में शामिल हो गया है. रुपये की इस गिरावट को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. माना जा रहा है कि फिलहाल अर्थव्यवस्था पर संकट गहरा नहीं है. इस कथन का आधार मौजूदा वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आर्थिक विकास के आंकड़े हैं.
अप्रैल से जून के मध्य 8.2 फीसदी की वृद्धि दर दर्ज की गयी थी, जो पिछले दो वर्षों में सर्वाधिक है. इससे पहले वित्त वर्ष 2016-2017 की पहली तिमाही में यह वृद्धि दर 8 फीसदी की थी और उस समय भी रुपये में गिरावट दर्ज की गयी थी. बीते मंगलवार को बाजार में रुपये के मूल्य में 21 पैसे की गिरावट देखी गयी थी और यह डॉलर के मुकाबले 71.79 पर चला गया था. मंगलवार को बाजार बंद होने तक यह 71.58 प्रति डाॅलर पर बंद हुआ था.
रुपये की गिरावट के प्रमुख कारण
भारतीय मुद्रा कारोबारियों के अनुसार उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं के संकट और कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोत्तरी रुपये को डॉलर के मुकाबले कमजोर कर रही है. इसके अलावा डॉलर सहित अन्य विदेशी मुद्राओं के लगातार मजबूत होने से रुपये के रुख में गिरावट दर्ज की जा रही है. भारत का व्यापार-संतुलन ठीक नहीं चल रहा है.
हमारी अर्थव्यवस्था के अंतर्गत आयात ज्यादा हो रहा है, निर्यात बेहद कम. इससे यह स्थिति पैदा हो गयी है कि डॉलर की मांग बढ़ती जा रही है और उसकी तुलना में आपूर्ति बेहद कम है. इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत के व्यापार घाटे में बढ़ोत्तरी हो गयी है. इसके अतिरिक्त विदेशी निवेश भी घटा है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये में गिरावट दर्ज की जा रही है.
रुपया गिरने की एक बड़ी वजह अमेरिकी बॉन्ड मार्केट में निवेश पर रिटर्न का बढ़ना है. इस वजह से, सभी बड़े निवेशक भारत जैसे देशों से पैसे निकालकर अमेरिका में लगा रहे हैं. जिससे रुपये की मांग और कीमत लगातार घटी है. इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोत्तरी हुई है, जिससे भारतीय बाजार में डॉलर की मांग बढ़ी और रुपया कमजोर हुआ है. अमेरिका के ईरान से परमाणु करार तोड़ने के बाद से जो गतिविधियां हुई हैं, उसकी वजह से कच्चा तेल प्रति बैरल 80 डॉलर पहुंच गया है.
भारत ज्यादातर कच्चा तेल आयात करता है, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है. इसके अतिरिक्त, विश्व की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका व चीन के बीच चल रहे ट्रेड वार के कारण भी निवेशकों में भय व्याप्त हो गया है. इस वजह से उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी लगातार बाहर जा रही है. निवेशकों के इस रुख के कारण बाजार असंतुलन के दौर से गुजर रहा है. चूंकि भारत भी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में एक है, ऐसे में रुपये का कमजोर होना लाजिमी है.
रुपया कमजोर होने का असर
रुपये में गिरावट से आयातित वस्तुओं की कीमत बढ़ती है. दुनिया की छठवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, भारत, कच्चे तेल का तीसरा सबसे बड़ा आयातक भी है. इसलिए रुपये में आयी गिरावट का इसकी कीमतों पर लगातार असर पड़ना तय है.
तेल की कीमत में बढ़ोत्तरी से निजी वाहन चलाना महंगा पड़ेगा और हवाई यात्रा शुल्क भी महंगा हो जायेगा. भविष्य में तेल की बढ़ती कीमतें हमें व्यापक रूप से प्रभावित करेंगी और रुपये की इस गिरावट का असर गिरती मुद्रास्फीति के रूप में सामने दिखायी दे सकता है. इनके सबके बीच, सूचना तकनीक, टेक्सटाइल और ऐसे अन्य क्षेत्र, भारत जिनका बड़े पैमाने पर निर्यात करता है, इन क्षेत्रों में लाभ बने रहने की संभावना है.
रुपये की गिरावट का बुरा असर जिन वस्तुओं पर पड़ेगा, उनमें तेल, उर्वरक, दवाइयां और लौह अयस्क जैसी वस्तुएं शामिल हैं, भारत जिनका बड़ी मात्रा में आयात करता है . हालांकि ये वस्तुयें, हमारे दैनंदिन से नहीं जुड़ी हैं, अत: इनका प्रभाव अप्रत्यक्ष ही रहेगा. आम लोगों के लिए बुरी खबर यह है कि रुपये के कमजोर होने का प्रभाव पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों के रूप में पड़ना है, जिससे सामानों के दाम ऊपर भागेंगे.
भारत क्रूड पाम ऑयल का भी बड़ा आयातक है, इसलिए क्रूड पाम ऑयल की कीमत बढ़ने से खाद्य तेल के खुदरा मूल्य में वृद्धि हो जायेगी.आगामी दिनों में साबुन, डिटर्जेंट, डियोड्रेंट और शैंपू जैसी आम जरूरत की वस्तुएं, जिनमें पाम ऑयल का इस्तेमाल होता है, वे महंगी होंगी. दाल और तेल का भी भारत बड़ा आयातक है, रुपये के कमजोर होने से इनके दाम भी बढ़ने ही हैं. जो भी उद्योग आयातित माल पर निर्भरता रखते हैं, उन्हें आयातित वस्तुएं ज्यादा महंगी पड़ेंगी.
रुपये की इस गिरावट से ऑटोमोबाइल क्षेत्र, पेपरबैक, पिज्जा और विदेशी रेस्त्रां में भोजन करना, नवीनतम लैपटॉप, कंप्यूटर, टीवी, मोबाइल फोन जैसे इलेक्ट्रॉनिक सामान भी महंगे होंगे. अर्थशास्त्र के जानकारों के अनुसार, उत्पादन, निर्माण और कृषि के क्षेत्र में सुधार देखी गयी है, जिससे आर्थिक वृद्धि दर बढ़ी है. लेकिन, इस वृद्धि दर के साथ-साथ अगर राजस्व में वृद्धि नहीं होती है, तो इससे राजकोषीय घाटे पर दोहरी मार पड़ती है.
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