जयंती विशेष : हिंदी व संस्कृत से प्रेम करने की प्रेरणा देते हैं फादर बुल्के

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 01 Sep 2018 11:00 AM

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संत जेवियर्स कॉलेज में स्थापित हिंदी के मनीषी, पद्मभूषण डॉ फादर कामिल बुल्के का समाधि स्थल न सिर्फ विद्यार्थियों को, बल्कि सभी को हिंदी व संस्कृत से प्रेम करने और इन भाषाओं के क्षेत्र में कुछ सकरात्मक करने की प्रेरणा देता है़ उनका पार्थिव अवशेष इसी साल 14 मार्च को संत जेवियर्स कॉलेज परिसर में […]

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संत जेवियर्स कॉलेज में स्थापित हिंदी के मनीषी, पद्मभूषण डॉ फादर कामिल बुल्के का समाधि स्थल न सिर्फ विद्यार्थियों को, बल्कि सभी को हिंदी व संस्कृत से प्रेम करने और इन भाषाओं के क्षेत्र में कुछ सकरात्मक करने की प्रेरणा देता है़ उनका पार्थिव अवशेष इसी साल 14 मार्च को संत जेवियर्स कॉलेज परिसर में स्थापित किया गया.

यह फादर बुल्के का विश्राम के लिए अपनी कर्मभूमि लौटने जैसा था़ कॉलेज में उनकी आवक्ष प्रतिमा (बस्ट) भी लगायी गयी और इन सबके साक्षी कार्डिनल तेलेस्फोर पी टोप्पो, पद्मश्री सिमोन उरांव, रोम से आये सोसाइटी ऑफ जीसस के असिस्टेंट जनरल फादर वरनन डिकुन्हा, विश्वभारती शांतिनिकेतन के प्राध्यापक डॉ मुक्तेश्वर नाथ तिवारी, विनोबा भावे विवि में हिंदी के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ शिवनंदन प्रसाद सिन्हा व रांची विवि में हिंदी के विभागध्यक्ष डॉ जंगबहादुर पांडेय समेत कई गणमान्य बने़ फादर बुल्के कुछ समय तक इस कॉलेज में हिंदी व संस्कृत के विभागध्यक्ष थे़ यहां उनके नाम पर शोध संस्थान व पुस्तकालय भी स्थापित किये गये है़ं उनका निधन 17 अगस्त 1982 को इलाज के क्रम में दिल्ली के एम्स में हो गया था़,

जिसके बाद उनका पार्थिव शरीर दिल्ली में ही कश्मीरी गेट स्थित संत निकोलसन कब्रिस्तान में दफनाया गया़ सोसाइटी ऑफ जीसस कांग्रीगेशन ने लगभग दो साल पहले उनका स्मृति शेष उनकी कर्मभूमि, रांची लाने का निर्णय लिया़ इसे रांची लाने में सोसाइटी आॅफ जीसस, रांची के प्रोविंशियल फादर जोसफ मरियानुस कुजूर, नयी दिल्ली के प्रोविंशियल फादर सेबेस्टियन जेरकास्सेरी व इंडियन सोशल इंस्टीट्यूट दिल्ली के एचओडी फादर रंजीत तिग्ग्ग ने अहम भूमिका निभायी़.

साहित्यकारों ने कहा

डॉ कामिल बुल्के का हिंदी और साहित्य में अद्वितीय योगदान है. उन्होंने हिंदी को मां की तरह स्वीकार किया़ रामचरित मानस की पंक्तियों से प्रभावित होकर पूरा जीवन हिंदी की सेवा में बिता दिया. उन्हें यदि कोई फादर कह कर बुलाता था तो कहते थे कि मुझे पिता कह कर बुलाओ. संपूर्ण भारत देश उनका ऋणी रहेगा़ होना तो यह चाहिए था कि पिता कामिल बुल्के के नाम पर हिंदी अकादमी खोली जाती और उनके संदेशों को युवा पीढ़ी के माध्यम से पूर्ण जीवित करने का प्रयास किया जाता.
ऋता शुक्ल
डॉ फादर कामिल बुल्के का पुण्य स्मरण आते ही आंखों के समक्ष उनकी चकाचक मिशनरी वेशभूषा और लंबी छरहरी काया उपस्थित हो जाती है़ ईसाई मिशनरियों से संबंध शोध कार्य के दौरान मैं लगातार उनके संपर्क सान्निध्य से उपकृत होता रहा़ डॉ बुल्के एक एेसे संत थे जिनका आगमन रांची की धरती को प्राणवान बनाने के लिए हुआ़ वह तुलसी दास से काफी प्रभावित थे़ हमारे लिए यह गौरव और गर्व का विषय है कि रांची नगरी डॉ बुल्के की कर्मभूमि और साधना स्थली रही है.
डॉ नागेश्वर सिंह
फादर बुल्के को याद करना एक वत्सल पिता अनन्य हिंदी सेवी और संपूर्ण भारतीय व्यक्तित्व को याद करना है़ उनके साथ कई प्रसंग आज भी याद है़ं अपने समय में वे तुलसी जयंती के एकमात्र विशेषज्ञ वक्ता हुआ करते थे. उन्होंने मौलिक लेखन के साथ-साथ अनुवाद का जो कार्य किया है, वह अत्यंत ही विशिष्ट है. उनका शब्दकोश अपने आप में अद्वितीय त्रुटिरहित है. हिंदी के क्षेत्र में उनके योगदान को नहीं भुलाया जा सकता.
डॉ अशोक प्रियदर्शी
डॉ बुल्के की कोई विशिष्ट कामना नहीं थी़ उनकी कोई महत्वाकांक्षा भी नहीं थी़ अपने समय में वह तुलसी जयंती के एकमात्र विशेषक वक्ता हुआ करते थे. फादर कामिल बुल्के तुलसी के अनन्य भक्त थे. उन्हें देखने से प्राचीन ऋषियों की याद आ जाती है. ना केवल वाह्य रूपरेखा में अपितु आंतरिक साधना में भी. सच्चे अर्थों में वह आधुनिक युग के तपस्वी थे. बुल्के के अनुसार अंग्रेजी केवल बुद्धि को ही संबोधित करती है जबकि हिंदी ह्दय को. हिंदी में उनके याेगदान को भुलाया नहीं जा सकता.
डॉ श्रवण कुमार गोस्वामी
शिक्षकों ने कहा
डॉ फादर कामिल बुल्के, डॉ धीरेंद्र वर्मा को प्रेरणास्त्रोत मानते थे़ महादेवी वर्मा को दीदी और इलाहाबाद के लोगों को मायकेवाले कहते थे़ वह सच्चे अर्थों में मानवता के साधक थे़ हिंदी व तुलसी साहित्य से अत्यधिक प्रेम करते थे़ उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध रचना है राम कथा : उत्पत्ति और विकास.
डॉ हाराधन कोइरी, हिंदी शिक्षक
फादर बुल्के आचार विचार से पूर्ण रूप से सात्विक थे़ मनुष्य मात्र के लिए प्रेम बांटने, धर्मों के विविध व व्यापक फलक के प्रति समभाव रखनेवाले थे़ आजीवन कर्म की उपासना करनेवाले, जाति, धर्म, संप्रदाय से ऊपर उठ चुके उदार, मानवता के पुजारी थे़ फादर बुल्के सही अर्थों में संत थे.
डॉ इआर टुडू, अध्यक्ष, हिंदी विभाग, गोस्सनर कॉलेज
एक गैर हिंदी, गैर भारतीय पृष्ठभूमि से आये व्यक्ति ने हिंदी प्रेम के प्रतिदान स्वरूप हिंदी कि जो सेवा की है, उसकी मिसाल दुर्लभ है. उन्होंने रामकथा के विभिन्न स्रोतों का अत्यंत प्रामाणिक और गवेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है. डॉ बुल्के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के धनी साधक रहे हैं.
डॉ प्रशांत गौरव, हिंदी शिक्षक
फादर बुल्के ने अपना जीवन हिंदी भाषा व साहित्य के लिए समर्पित कर दिया. हिंदी साहित्य जगत के लिए उनकी रचनाएं व शब्दकोश अनमोल धरोहर है़ं फादर बुल्के हिंदी भाषा साहित्य सेवियों के शिक्षक, गुरु, पथ प्रदर्शक है़ं उन्होंने हिंदी की जो सेवा की है, वह अतुलनीय है़ उनके द्वारा दिया गया फादर बुल्के पुस्तकालय हिंदी साहित्य के लिए अमूल्य निधि है.
डॉ रेणु सिन्हा, अध्यक्ष हिंदी विभाग, निर्मला कॉलेज
विद्यार्थियों ने कहा
डॉ कामिल बुल्के सच्चे अर्थों में मानवता के साधक थे़ उनके योगदान को आज भी याद किया जाता है़ भारतीय जीवन में विदेशी भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व न केवल उन्हें राष्ट्रीय स्वाभिमान का विरोधी लगा बल्कि हास्यास्पद भी लगा.
कुमार दिव्यांक राज
फादर कामिल बुल्के को सिर्फ उनकी जयंती पर याद न किया जाये. उनके जीवन को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाये. उन्होंने भारत के सार्वजनिक जीवन से अंग्रेजी के बहिष्कार और स्व भाषा हिंदी की प्रतिष्ठा के लिए संघर्ष का संकल्प लिया.
कीर्तिका टिड़वार
फादर बुल्के एक महान कोषकार के रूप में जाने जाते है़ं उन्होंने अंग्रेजी डिक्शनरी का निर्माण किया़ यह ऐसा शब्दकोश है जो अपने आप में अनूठा है. आज तक इसके 42 संस्करण आ चुके हैं, जो विद्यार्थियों के साथ-साथ अनुवादकों के लिए वरदान है.
रवीना देवगम
डॉ बुल्के ने हिंदी के लिए जीवन न्योछावर कर दिया. उनके जीवन से यही प्रेरणा मिलती है कि आगे बढ़ने के लिए कोई धर्म-संप्रदाय बाधा नहीं होती. वे ईसाई पुराहित थे. बावजूद धार्मिक परंपराओं की अच्छाइयों को वह सहज स्वीकार करते थे.
रोहित तिर्की
जिस तरह से डॉ कामिल बुल्के ने हिंदी के लिए काम किया, उसी तरह हमें भी राष्ट्रभाषा के महत्व के लिए लोगों को जागरूक करना चाहिए. उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी केवल बुद्धि काे संबोधित करती है जबकि हिंदी हृदय को.
पूजा मिश्रा
डॉ बुल्के के योगदान को याद करने के लिए हिंदी का प्रचार प्रसार करना चाहिए़ अंग्रेजी के कारण हिंदी को महत्ता नहीं दी जाती है़ उनकी लाइब्रेरी को और भी विस्तार करना चाहिए़ विद्यार्थियों में रुचि बढ़ाने के लिए उनके जीवन से जुड़ी कथाएं प्रकाशित की जानी चाहिए.
विकास कुमार साहू
हिंदी के लिए कुछ सकारात्मक करने की प्रेरणा देते हैं
भावी पीढ़ी को हिंदी के लिए कुछ करने की प्रेरणा देते हैं
तुलसीदास की पंक्ति ‘परहित सरिस धरम नहिं भाई, एक विदेशी को भी योगी बना सकती है़ जब उनकी प्रशंसा सुनता हूं, तब गर्व होता है कि फादर बुल्के उस कॉलेज के उस विभाग के विभागाध्यक्ष रहे, जहां हम पढ़ रहे है़ं वे भावी पीढ़ियों को हिंदी के लिए कुछ सकारात्मक करने की प्रेरणा देते है़ं
मनीष मिश्रा, एमए हिंदी पार्ट वन
हिंदी के प्रति उनका लगाव विस्मृत करता है
संत जेवियर्स कॉलेज के हिंदी विभाग में आने से पूर्व मुझे फादर कामिल बुल्के के हिंदी के प्रति योगदान के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी. हिंदी के प्रति उनका लगाव सचमुच विस्मृत करता है. एक विदेशी होने के बावजूद यहां की भाषा के प्रति उनके अनन्य प्रेम व कठिन परिश्रम ने उन्हें हिंदी व संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष के पद तक पहुंचाया.
शिवम साक्षी, बीए हिंदी पार्ट टू
दिखाया कि हिंदी समझना, सीखना सहज है
फादर बुल्के ने अंगरेजी – हिंदी शब्दकोश की निर्माण कर एक महत्वपूर्ण कार्य किया है़ वे पद्मभूषण से सम्मानित हुए. हिंदी के प्रति उनके असीम लगाव ने यह सिद्ध किया कि यदि लगन और मेहनत हो, तो हिंदी सीखना, समझना सहज है. मुझे गर्व है कि मैं हिंदी विभाग की विद्यार्थी हूं.
शिवानी कुमारी, एमए हिंदी पार्ट वन
उनके आने से शुरू हुई हिंदी प्रतिष्ठा की पढ़ाई
डॉ कामिल बुल्के एक ऐसे संन्यासी थे, जिन्होंने हिंदी की सेवा पूरे अंतरमन से की. उनके आने के बाद ही संत जेवियर्स कॉलेज में हिंदी प्रतिष्ठा की पढ़ाई शुरू हुई. वे हिंदी व संस्कृत के विभागाध्यक्ष थे. उन्होंने हिंदी विभाग में एक समृद्ध पुस्तकालय की स्थापना भी की, जहां विद्यार्थियों को अच्छी पुस्तकें सहजता से उपलब्ध थीं. उन्होंने पूरी निष्ठा से हिंदी की सेवा की.
कविता कुमारी, एमए हिंदी पार्ट वन
अदभुत व्यक्तित्व वाले शख्स
हिंदी हितैषी बाबा बुल्के का भारत आना हमारे लिए एक बड़ी बात हुई. बेल्जियम की धरती पर पैदा होने वाले, हिंदी को अपनी मां और भगवान राम को अादर्श पुरुष मानने वाले शख्स का व्यक्तित्व निश्चय ही अदभुत रहा है. मैं स्वयं को भाग्यशाली मानती हूं कि मैं उनकी कर्मभूमि संत जेवियर्स कॉलेज की छात्रा हू़ं
सचिन टोपनो, बीए हिंदी पार्ट थ्री
किसी को भी विदेशी या अपरिचित नहीं लगते थे
डॉ बुल्के को हिंदी के प्रति उनका विशेष लगाव उन्हें भारत ले आया. उनके बारे में महादेवी वर्मा ने कहा था, ‘मैं ऐसे व्यक्तित्व से मिली, जिनसे मिल कर मुझे नहीं लगा कि मैं एक विदेशी या अपरिचित से मिल रही हू़ं ‘ यह बात फादर बुल्के के स्वभाव और व्यवहार को बखूबी रेखांकित करता है.
अंजलि कुमारी, एमए हिंदी पार्ट वन
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