असहिष्णुता के खिलाफ लड़ाई को ‘निराशा'' के तौर पर नहीं देखना चाहिए : अामर्त्य सेन

लंदन : नोबेल पुरस्कार विजेता आमर्त्य सेन ने कहा है कि धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ लडाई को ‘निराशा’ के तौर पर नहीं देखना चाहिए. जानेमाने अर्थशास्त्री सेन ने ‘लंदन स्कूल ऑफ एकनॉमिक्स’ में ‘धार्मिक असहिष्णुता और लोकतंत्र पर इसका असर’ विषय पर ‘आमर्त्य सेन व्याख्यान श्रृंखला’ की शुरुआत की. इसकी प्रस्तुति पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता असमा […]
लंदन : नोबेल पुरस्कार विजेता आमर्त्य सेन ने कहा है कि धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ लडाई को ‘निराशा’ के तौर पर नहीं देखना चाहिए. जानेमाने अर्थशास्त्री सेन ने ‘लंदन स्कूल ऑफ एकनॉमिक्स’ में ‘धार्मिक असहिष्णुता और लोकतंत्र पर इसका असर’ विषय पर ‘आमर्त्य सेन व्याख्यान श्रृंखला’ की शुरुआत की. इसकी प्रस्तुति पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता असमा जहांगीर ने की.
आमर्त्य सेन ने कहा, ‘‘एक भारतीय के तौर पर मैं यह कह सकता हूं कि हमारे ऐसे हालात हैं. जहां मानवाधिकार की अपनी कानूनी स्थिति है लेकिन पाकिस्तान में ऐसा नहीं हैं. यही बात असमा जहांगीर की लड़ाई को अद्भुत बनाती है जो सभी तरह की असहिष्णुता के खिलाफ लड़ रही हैं.” उन्होंने कहा, ‘‘महत्वपूर्ण सबक यह है कि किसी हालात को निराशा के तौर पर लेना गलत है. असहिष्णुता के भयावह हालात में भी हम कुछ कर सकते हैं.”
असमा ने कहा, ‘‘मैं अक्सर कहती हूं कि प्रोफेसर आमर्त्य सेन सिर्फ भारतीय नहीं, बल्कि वैश्विक बुद्धिजीवी हैं. उन्होंने लिखा है कि कैसे आजादी का दमन गरीबी ओर धकेल सकता है. चाहे भारत, पाकिस्तान हो या कोई देश, यहां हमेशा असहिष्णुता रही है. असहिष्णुता संक्रामक होती है.”
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