2014 के लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होते ही कांग्रेस और भाजपा के नेता एक-दूसरे पर दंगों की राजनीति करने का आरोप लगा रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पिछले दिनों एक रैली में आरोप लगाया, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी सत्ता की अपनी भूख मिटाने के लिए सांप्रदायिक हिंसा भड़काने तथा जहर की खेती जैसी विभाजनकारी राजनीति में लिप्त हैं.
इसके जवाब में मोदी ने एक रैली में कहा, सोनिया गांधी कहती हैं कि सत्ता जहर है, तो सबसे ज्यादा सालों से देश पर राज कर कांग्रेस ने सबसे ज्यादा जहर चखा. जहर की खेती कांग्रेस करती आ रही है. कांग्रेस एक विभाजनकारी और विघटनकारी पार्टी है. यह जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बांट कर वोट बैंक की राजनीति करती है.
इन बयानों के आलोक में समझा जा सकता है कि 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले किस तरह की राजनीति तेज हो रही है. इस बीच संसद में लंबित सांप्रदायिक हिंसा निरोधी बिल पर भी सत्ता पक्ष और विपक्ष में कोई एक राय नहीं बन पा रही है. देश में हो रही जहर की राजनीति और संसद में लंबित सांप्रदायिक हिंसा निरोधी बिल के विभिन्न पहलुओं पर नजर डाल रहा है आज का समय.
विधेयक की खासियत
सांप्रदायिक दंगों के बीते अनुभवों को देखते हुए विधेयक में कुछ जरूरी प्रावधान हैं. सांप्रदायिक दंगों के पीडि़तों के बयान अब केवल धारा 164 के तहत दर्ज होंगे, यानी अदालतों के सामने. विधेयक के उपबंध 74 के तहत यदि किसी के ऊपर नफरत संबंधी प्रचार का इल्जाम लगता है, तो उसे तब तक गुनहगार माना जायेगा, जब तक कि वह निर्दोष साबित न हो जाये. यही नहीं उपबंध 67 के तहत किसी लोकसेवक के खिलाफ मामला चलाने के लिए सरकार की इजाजत लेने का प्रावधान, अनिवार्य रूप से लागू नहीं होगा.
केंद्र या राज्य सरकारों को, केस चलाने की अर्जी पर एक महीने के अंदर फैसला लेना होगा. यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया तो माना जायेगा कि उन्होंने केस चलाने की इजाजत दे दी. इसके बावजूद यदि उन्होंने अर्जी ठुकरायी, तो उन्हें इसकी वजह बतानी होगी. अदालत कारणों से संतुष्ट नहीं हुई, तो केस चलाने पर खुद फैसला करने में सक्षम होगी. शिकायतकर्ता पीडि़त को डराने-धमकाने, किसी प्रलोभन से बचाने के लिए उनका नाम और पहचान गुप्त रखी जायेगी. हां, संगठित सांप्रदायिक और किसी समुदाय को लक्ष्य बना कर की जाने वाली हिंसा, अब इस कानून के तहत राज्य के भीतर आंतरिक उपद्रव के रूप में देखी जायेगी.
* सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक
सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण से संबंधित विधेयक को सबसे पहले मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में लागू करने की कोशिश की थी, लेकिन विभिन्न दलों के विरोध को देखते हुए केंद्र सरकार ने इसे वापस ले लिया था.
इसका संशोधित प्रारूप संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा सोनिया गांधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् (नेशनल एडवाइजरी काउंसिल- एनएसी) ने तैयार किया था. एनएसी ने 14 जुलाई, 2010 को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का प्रारूप बनाने के लिए एक समिति का गठन किया था. 28 अप्रैल, 2011 की एनएसी ने बैठक के बाद नौ अध्यायों और 138 धाराओं में तैयार किया था.इसके बाद 2011 में यूपीए सरकार कुछ संशोधनों के बाद इस विधेयक को लेकर आयी और इसमें अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों को भी इस विधेयक के तहत लाया गया.
एससी/एसटी को शामिल करने को लेकर एक बार फिर इस विधेयक का भारी विरोध हुआ और विरोधियों ने कहा कि अगर कोई सांप्रदायिक हिंसा मुसलिमों और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातियों के बीच होती है, तो ऐसी हालत में यह विधेयक सिर्फ मुसलमानों का ही साथ देगा और बहुत संभव है कि तब दलितों की रक्षा के लिए बना दलित एक्ट भी अप्रभावी हो जायेगा. इस तरह यह विधेयक एक बार फिर पास होते-होते रह गया. दरअसल, इसकी सबसे अधिक विवादस्पद बात यह है कि इसमें यह बात पहले से ही मान ली गयी थी कि हिंसक केवल बहुसंख्यक होते हैं, अल्पसंख्यक नहीं. दिसंबर, 2013 में एक बार फिर कैबिनेट ने विधेयक को हरी झंडी दी. 5 फरवरी 2014 को राज्यसभा में पेश भी किया गया, लेकिन इसका हस्र भी पहले जैसा ही हुआ.
* विधेयक का विरोध
सांप्रदायिक हिंसा रोकथाम विधेयक को लाने पर केंद्र सरकार की कोशिश पर सिर्फ केंद्र और राज्य ही अलग-अलग खड़े नजर नहीं आये, बल्कि कुछ राजनीतिक दल भी विरोध में उतर गये. राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में कई मुख्यमंत्रियों द्वारा विधेयक पर विरोध दर्ज किया जा चुका है. प्रमुख दल भाजपा, शिवसेना, एआइएडीएमके तथा तृणमूल कांग्रेस सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद् जैसे कई संगठनों ने इसका विरोध किया. इन सभी का विरोध इस बात को लेकर था कि यह विधेयक सिर्फ अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन किसी हिंसा के दौरान अल्पसंख्यकों के आक्रमण से पीडि़त बहुसंख्यकों को यह कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता.
इसके विरोध में ऐसा भी माना गया कि यह विधेयक भारत के संघीय ढांचे के खिलाफ है और बहुत घातक है. जनता पार्टी के अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने तो इस विधेयक को लेकर एफआइआर भी दर्ज करवायी, जिसमें सोनिया गांधी और एनएसी पर आरोप लगाया कि सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा निवारण विधेयक बना कर भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया गया और हिंदुओं तथा मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक सौहार्द को खत्म करने की कोशिश की गयी.
* विधेयक के प्रावधान
दंगों के बाद अपराधियों को सजा और पीडि़तों को न्याय नहीं मिल पाने के जितने भी तकनीकी कारणों को सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अनुभव किया था, उन्हीं बातों को इस विधेयक के मसौदे में रखा गया था. इस बिल में कहा गया है कि सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा से अभिप्रेत और इसमें सम्मिलित ऐसा कोई योजनाबद्ध कार्य, जिसके परिणामस्वरूप व्यक्ति और उसकी संपत्ति को क्षति या हानि होती है और जो जान-बूझकर किसी व्यक्ति के विरुद्ध किसी समूह की उसकी सदस्यता के आधार पर निर्देशित की गयी है और जो राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को नष्ट करती है, वह सांप्रदायिक हिंसा के अंतर्गत आता है.
बिल के अनुसार संगठित सांप्रदायिक और लक्षित हिंसा का होना भारत के संविधान के अनुच्छेद-355 के अर्थ के अंतर्गत आंतरिक अशांति गठित करेगा और केंद्र सरकार इसके अधीन उल्लिखित कर्तव्यों के अनुसार ऐसे उपाय कर सकेगी, जो मामले की प्रकृति और परिस्थितियों के संबंध में अपेक्षित हो. मसलन, बाबरी विध्वंस या गुजरात दंगों जैसे मौकों पर केंद्र सरकार ने संविधान की व्यवस्थाओं के मद्देनजर खुद को असहाय बताया था. इसलिए सरकार का मानना है कि इसके पास होने से ऐसी परिस्थितियों से उपजी समस्याओं को आसानी से हल किया जा सकेगा.
* संघीय ढांचे पर खतरा : जेटली
सांप्रदायिक हिंसा निरोधक (न्याय और क्षतिपूर्ति) विधेयक, 2014 पर इस आधार पर आपत्ति है कि इसे कानून बनाने के लिए संसद में विधि संबंधी योग्यता का अभाव है. मेरा विरोध संविधान की सातवीं अनुसूची में शामिल विधि संबंधी प्रविष्टि के आधार पर था. सातवीं अनुसूची की सूची-2 राज्य की सूची है. प्रविष्टि-1 शांति व्यवस्था को संबोधित करती है. प्रविष्टि-2 पुलिस को और प्रविष्टि-41 राज्यों की सार्वजनिक सेवाओं को संबोधित करती है. ये सभी मुद्दे पूरी तरह से राज्य के अधिकार क्षेत्र में हैं. संसद के पास इन मुद्दों पर कानून बनाने की वैधानिक योग्यता नहीं है.
प्रस्तावित रूप में विधेयक ने अपराधों की एक नयी श्रेणी बना दी है. इसमें जो इलाके गड़बड़ी वाले हैं उन इलाकों की घोषणा करने और उन्हें अधिसूचित करने की बात है. इसमें सांप्रदायिक हिंसा की रोकथाम के लिए कदम सुझाये गये हैं. इसमें एक अध्याय है, जो शांति व्यवस्था को बनाये रखने से संबंधित है. इसके बाद इसमें मुआवजे की प्रक्रिया और राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ की जानेवाली कार्रवाई और उन पर जो जुर्माना लगाया जा सकता है, उसकी चरचा है. ये सभी मामले राज्य कार्यकारिणी के अधिकार क्षेत्र में आते हैं. केंद्रीय कानून मंत्री का जवाब था कि संघीय ढांचे के लिए तब तक कोई खतरा नहीं है, जब तक प्रत्येक विषय के संबंध में अधिकार राज्य कार्यकारिणी के पास है.
मेरा जवाब था कि विधायी शक्ति और कार्यकारिणी की शक्ति के बीच स्पष्ट अंतर है. विधायी शक्ति कानून बनाने की शक्ति है. कार्यकारिणी की शक्ति आवश्यक कदम उठाने के लिए कानून के अंतर्गत एक शक्ति है. मेरी आपत्ति विधि संबंधी योग्यता की कमी को लेकर थी. केंद्र यह नहीं कह सकता कि कानून बना कर, राज्य के अधिकारियों को अधिकार दिया जा रहा है. क्योंकि सूची-2, प्रविष्टि 1, 2, 41 के अंतर्गत पहली नजर में अधिकार केंद्र के पास नहीं है. लगभग सभी विपक्षी दलों ने भाजपा के विचार का समर्थन किया. इसलिए यह विधेयक शुरू में ही रोक दिया गया.
* राज्य के अधिकार क्षेत्र में दखल नहीं : कपिल सिब्बल
मैंने कानून मंत्री होने के नाते इस विधेयक के कानूनी पहलुओं को परखा है और इसे स्वीकृति दी है. प्रतिपक्ष के नेता की आपत्ति की महत्ता से मैं अवगत हूं. उन्होंने संघवाद की अवधारणा से जुड़े सवाल उठाये हैं. संघीय व्यवस्था हमारे संविधान का मूलभूत आधार है. कोई भी विधेयक और कोई भी कानून से परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर इस मूलभूत आधार पर चोट नहीं पहुंचना चाहिए.
विधेयक के प्रस्तावों को बनाते समय काफी सतर्कता बरती गयी है, क्योंकि हमलोग इस बात के प्रति गंभीर हैं. इस विधेयक में कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं है, जिससे राज्य के अधिकार क्षेत्र में केंद्र की दखलंदाजी हो. विधेयक की धारा 30 के प्रावधान में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं है.
यह दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिस्मेंट कानून की तरह है, जहां सीबीआइ को राज्य सरकार के अधीन कानून व्यवस्था के मामले में हस्तक्षेप का अधिकार है. लेकिन वह राज्य सरकार की सहमति से ही संभव है. ऐसा ही प्रावधान इस विधेयक में है, लेकिन यह अधिकार राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को दिया गया है, न कि केंद्र सरकार के किसी अधिकारी को. अगर राज्य सरकार मानवाधिकार आयोग से सहमत नहीं होगी, तो उसे जांच का अधिकार नहीं होगा. ऐसे में इस विधेयक में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो कानून-व्यवस्था के मामले में परोक्ष या अपरोक्ष तौर पर राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र की अवहेलना करता हो.
इस विधेयक का अधिकतर हिस्सा मुआवजे से संबंधित है. विधेयक में ऐसा प्रावधान नहीं है कि केंद्र कोई आदेश जारी करे. जब संविधान बना था, तो कभी नहीं सोचा गया था कि ऐसे हादसे देश में होंगे जहां शासन की भूमिका होगी. अगर ऐसा हादसा हो, तो उसके लिए हमें कोई न कोई तरीका अपनाना पड़ेगा, जिससे पीडि़तों को मुआवजा मिल सके. हमने एक संवैधानिक विधेयक पेश किया है. हिंसा के पीछे राज्य सरकार का हाथ हो, तो भी उसकी सहमति जांच के लिए आवश्यक होगी.
(प्रस्तुति : कमलेश कुमार सिंह)

