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परदेसी भाषा दिला रही रोजी-रोटी

Updated at : 04 Sep 2014 7:06 AM (IST)
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परदेसी भाषा दिला रही रोजी-रोटी

।। राजगीर से लौट कर अजय कुमार ।। राजगीर के गरम कुंड के सामने कभी स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले लालजीत यादव के कठिन दिन मानो गुजर चुके हैं. उनके दो बेटे हैं. एक ने कोरियाई भाषा सीखी और दूसरे ने चीनी. राजगीर में ऐसे कई परिवार मिल जायेंगे जहां विदेशी भाषा परायी नहीं रह […]

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।। राजगीर से लौट कर अजय कुमार ।।

राजगीर के गरम कुंड के सामने कभी स्टेशनरी की दुकान चलाने वाले लालजीत यादव के कठिन दिन मानो गुजर चुके हैं. उनके दो बेटे हैं. एक ने कोरियाई भाषा सीखी और दूसरे ने चीनी. राजगीर में ऐसे कई परिवार मिल जायेंगे जहां विदेशी भाषा परायी नहीं रह गयी है. जानकारों का कहना है कि बौद्ध सर्किट में आने वाले पर्यटक स्थलों के गांवों में विदेशी भाषाओं को लेकर आकर्षण बढ़ा है, क्योंकि वो आमदनी का जरिया बन रही हैं. इससे परिवारों की आर्थिक दशा भी सुधरी है.

लालजी यादव की तरह ही कई परिवारों के नौजवान दिल्ली जाकर या तो विदेशी भाषा सीख रहे हैं, या फिर सीखने के बाद अपना काम-धंधा कर रहे हैं. लालजी के बेटे धनंजय यादव ने चीनी सीखी और वहीं एक ट्रैवल एजेंसी में काम करने लगे. विनोद कुमार गुप्ता को संतोष है कि उनका बेटा चीनी बोलना सीख गया. वह बताते हैं कि दिल्ली में रह कर उनके बेटे ने 75 हजार खर्च कर कोर्स पूरा कर किया था. अभी उनका बेटा लुधियाना में है.

विजय के अनुसार भाषा सीखने के बाद उनके बेटे की व्यस्तता बढ़ गयी है. साल भर कहीं न कहीं विदेशी पर्यटकों के साथ आना-जाना होता है. कभी कुशीनगर तो कभी बनारस और कभी बोधगया. उन्होंने कहा कि बेटे की कमाई ठीक-ठाक हो जाती है. वह घर में पैसा भेजने लगा है.

राजगीर के ही दो नौजवान हैं विवेक चंद्र और प्रकाश चंद्र. दोनों भाई हैं. विवेक ने करीब ढाई साल पहले दिल्ली जाकर चीनी सीखी. नयी भाषा सीख लेने के बाद उनके पास काम की कोई कमी नहीं रही. हाल में चार महीने के लिए एक कंपनी के साथ वह चीन में रहे. उनके भाईर् प्रकाश दिल्ली में ही चीनी सीख रहे हैं.

विवेक के पिता और स्थानीय पत्रकार शिवनंदन कहते हैं कि भाषा की पढ़ाई से यहां के परिवारों को काफी लाभ हुआ है. यह लाभ आर्थिक है. राजगीर के नौजवानों में विदेशी भाषा के प्रति रुझान पैदा किया था पप्पू शुक्ला ने. कोई 20 साल पहले उन्होंने जापानी जुबान सीखी थी. पर जापानी पर्यटकों की तादाद कम होने के बाद उन्होंने कोरियाई भाषा सीखी. उन्होंने अपने भाईर् मोहन शुक्ला के साथ मिल कर दिल्ली में एक ट्रैवल एजेंसी खोल ली.

उनके एक और भाई मदन किशोर शुक्ला राजगीर में ही हस्तशिल्प की दुकान चलाते हैं. शुक्ला बंधुओं की भाषा के जरिये हुई आर्थिक प्रगति को देख कर दूसरे परिवारों में विदेशी भाषा के प्रति ललक बढ़ गयी. दिलीप गोस्वामी के लड़के भोली गोस्वामी और सोनू गोस्वामी ने भी चीनी सीख ली है.

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