रंगमंच को समर्पित मोटले का चार दशक का सफर

Updated at : 14 Jul 2019 7:49 AM (IST)
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रंगमंच को समर्पित मोटले का चार दशक का सफर

अमितेश रंगकर्म समीक्षक साल 2010 का भारत रंग महोत्सव था. कमानी सभागार में मैंने हर्मन वुक के नाटक ‘केन म्युटिनी- द कोर्ट मार्शल’ का मंचन देखा. अंग्रेजी प्रस्तुति में युद्ध और कोर्ट मार्शल की नाटकीयता और निरर्थकता को उजागर किया गया था. टीवी और सिनेमा के कुछ परिचित नाम उस नाटक में अभिनय कर रहे […]

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अमितेश
रंगकर्म समीक्षक
साल 2010 का भारत रंग महोत्सव था. कमानी सभागार में मैंने हर्मन वुक के नाटक ‘केन म्युटिनी- द कोर्ट मार्शल’ का मंचन देखा. अंग्रेजी प्रस्तुति में युद्ध और कोर्ट मार्शल की नाटकीयता और निरर्थकता को उजागर किया गया था. टीवी और सिनेमा के कुछ परिचित नाम उस नाटक में अभिनय कर रहे थे जैसे किनीथ देसाई, अंकुर विकल आदि. प्रस्तुति समूह का नाम था ‘मोटले’ और निर्देशक का नाम था नसीरुद्दीन शाह. मंचन के दौरान शाह नहीं आये थे, लेकिन रत्ना पाठक शाह वहां मौजूद थीं.
नसीरुद्दीन शाह और रत्ना पाठक शाह का यह रंग समूह ‘मोटले’ इस साल जुलाई में चालीस साल पूरा कर रहा है. भारतीय रंगमंच में किसी पेशेवर रंग समूह का चालीस साल पूरा करना उपलब्धि है, वह भी तब जब इसके संचालक और अभिनेता सिनेमा और टीवी जैसे व्यस्ततम माध्यम से जुड़े हों. लेकिन शाह दंपती इस मुश्किल को मुश्किल मानते ही नहीं, क्योंकि रंगमंच उनके लिए निजात की जगह रही है. वे बताते रहे हैं कि एक के बाद एक खराब फिल्में करने के बाद रंगमंच ही वह जगह थी, जहां वे अपने अभिनय के शिल्प को मांज सकते थे, इसलिए रंगमंच के लिए समय निकालने के लिए नसीर अपने समूह के साथियों को भी वहीं बुला लिया करते, जहां उनकी शूटिंग चल रही होती और सेट पर बने मेकअप रूम में नाटक का रिहर्सल होता.
नसीरुद्दीन और रत्ना पाठक शाह दोनों ही राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के स्नातक रहे. रत्ना पाठक को रंगमंच अपने परिवार में ही मिला अपनी मां दीना पाठक और मौसी शांता गांधी से. नसीर रानावि में आने के बाद एफटीआइआइ पुणे में गये और उसके बाद सिनेमा में सक्रिय हुए.
मोटले भारतीय रंगमंच के सबसे सक्रिय रंग समूहों में से एक है. साल 2017 में इस समूह ने फ्रेंच नाटककार फ्लोरियन जेलेर द्वारा लिखित नाटक ‘फादर’ की दो महीने तक लगातार प्रस्तुति की. अब इस प्रस्तुति की तैयारी के दौरान लगनेवाले समय का अंदाजा लगाइए. मोटले ने चालीस सालों में बयालीस प्रस्तुतियां की हैं.
लगभग एक प्रस्तुति प्रति वर्ष यानी समूह की निरंतर सक्रियता. टॉम आॅल्टर, आकाश खुराना, बेंजामिन गिलानी, रणदीप हुड्डा जैसे नाम भी इससे जुड़े रहे हैं, जो रंगमंच के लिए इस समूह में बार-बार लौटते रहे हैं.
समूह की शुरुआत का विचार नसीरुद्दीन शाह और बेंजामिन गिलानी के मन में श्याम बेनेगल की फिल्म जुनून की शूटिंग के दौरान आया था. मोटले नाम बेंजामिन गिलानी ने रखा था, जिसका मतलब है विविधताओं का मेल, या बेमेल वस्तुओं का मेल. जुलाई 1979 में पृथ्वी थियेटर में सैमुअल बैकेट के नाटक ‘वेटिंग फॉर गोदो’ के मंचन से मोटले की शुरुआत हुई.
शुरुआती दो दशकों में मोटले ने अंग्रेजी भाषा में ही प्रस्तुतियां की और पश्चिम की क्लासिक कृतियों को पेश किया. इसमें एडवर्ड एल्बी की ‘जू स्टोरी’, जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की ‘आर्म्स एंड द मैन’, यूजीन आयनेस्को की ‘द लेसन’, हेराल्ड पिंटर की ‘द डंबवेटर’ जैसे नाटकों की प्रस्तुति हुई. साल 2000 के बाद समूह ने हिंदी या हिंदुस्तानी में भी प्रस्तुतियां शुरू की और मंटो, प्रेमचंद, इस्मत चुगताई, कृष्ण चंदर की कहानियों का सहारा लिया तथा ‘कथा कोलाज’, ‘इस्मत आपा के नाम’, ‘गधा और गधा’ जैसी प्रस्तुतियां की. हिंदुस्तानी प्रस्तुतियों की तरफ मुड़ने का कारण नसीर बताते हैं कि वे पश्चिम के चरित्रों को निभाते हुए उब गये थे और अपनी जबान में अपने आसपास के किरदारों को मंच पर पेश करना चाहते थे.
मोटले ने अपनी यात्रा में रंगकला के साथ कोई समझौता नहीं किया और निरंतर प्रयोग किया. अंग्रेजी भाषा के रंगमंच को भी इस समूह ने समृद्ध किया है. पिछले चालीस सालों में जब भारतीय रंगमंच पर अनेक समूह धूमकेतु की तरह उभरे और विलीन हो गये, उसमें मोटले समूह की यात्रा रंग-समाज के लिए प्रेरणादायक है.
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