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कसोल की हरियाली और फ्यूजन कल्चर

Updated at : 14 Jul 2019 7:47 AM (IST)
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कसोल की हरियाली और फ्यूजन कल्चर

सुमन बाजपेयी ट्रेवलर पार्वती नदी के किनारे बसे हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा गांव कसोल का शांत वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है. ऐसा लगता है जैसे एक सुकून सा हर ओर पसरा हुआ है. यह दिल्ली-चंडीगढ़-मनाली हाईवे पर कुल्लू से 39 किमी दूर है. कसोल की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद आप पूरे […]

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सुमन बाजपेयी
ट्रेवलर
पार्वती नदी के किनारे बसे हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा गांव कसोल का शांत वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है. ऐसा लगता है जैसे एक सुकून सा हर ओर पसरा हुआ है. यह दिल्ली-चंडीगढ़-मनाली हाईवे पर कुल्लू से 39 किमी दूर है. कसोल की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद आप पूरे वर्ष उठा सकते हैं.
हर तरफ हरियाली है, मानो जमीन पर हरा कालीन बिछा हो. यहां के नजारों को कैमरे में कैद करने की हमेशा एक आतुरता सी बनी रहती है. फिर चाहे हर तरफ फैली हरियाली हो या बर्फ से ढकी पहाड़ियां. चारों तरफ जिधर भी नजर जाती है, प्रकृति एक नये रंग, रूप और साज-सिंगार के साथ हर सैलानी की अगवानी करती प्रतीत होती है. नदियां, पहाड़, ऊंचे, लंबे पेड़, फल-फूल, नर्म मुलायम घास, वन्य जीवन और मिलनसार लोग- क्या कुछ नहीं है यहां. कसोल से लगभग दो किमी दूर छलाल गांव तक जानेवाला रास्ता पार्वती नदी के किनारे से होकर जाता है. रास्ते के एक ओर पार्वती नदी के पानी का मधुर स्वर कानों से टकराता है, तो दूसरी ओर ऊंचे पर्वत इस मार्ग को मनोहारी बना देते हैं. देवदार के घने वृक्षों से होकर छलाल तक की पदयात्रा एक अनूठा अनुभव है.
ट्रैकिंग प्रेमियों का गढ़
कसोल ट्रैकिंग लवर्स के लिए बेहद खास है. यहां ट्रेकिंग के लिए खीर गंगा ट्रेक, मलाना, द ग्रेट हिमालयन नेशनल पार्क ट्रैक आदि हैं, जो कसोल के पास से गुजरते हैं. पार्वती नदी के किनारे खड़े देवदार और चीड़ के पेड़ों से कसोल की सुंदरता और भी बढ़ जाती है.
यहां के कैंपिंग प्वॉइंट्स एडवेंचर पसंद करनेवाले लोगों को लुभाते हैं. पार्वती नदी के किनारे बने टेंट्स में स्टे करना एक अलग ही अनुभव था. कसोल से खीरगंगा और तोश तक ट्रैकिंग भी की हमने. कसोल से पांच किमी दूर मणिकर्ण के गुरुद्वारे की खास बात यह है कि यहां स्थित गर्म पानी के प्राकृतिक झरने में नहाने से कई बीमारियां ठीक हो जाती हैं.
कसोल का फ्यूजन कल्चर
इस छोटे से गांव की खासियत यह है कि कस्बाई संस्कृति के साथ-साथ यहां पश्चिमी संस्कृति भी देखने को मिलती है. कल्चर का फ्यूजन भी खाने-पीने में बहुत अधिक देखने को मिलता है. जगह-जगह स्ट्रीट साइड पर बने कैफों में इस्राइली, चाइनीज और इटैलियन खाने का लुत्फ उठाया जा सकता है. शुरुआत में इस्राइली जब कसोल आये, तो वे किराये पर जगह लेकर रहने लगे.
फिर धीरे-धीरे उन्होंने गेस्ट हाउस और कैफे हाउस खोलने शुरू कर दिये. स्थानीय लोगों ने देखा कि इस तरह से उनका गांव कुछ तरक्की कर सकता है, तो उन्होंने अपनी जमीनें उन्हें बेच दीं, ताकि व्यापार बढ़ सके. स्थानीय निवासियों ने खुद को अब इस्राइलियों के हिसाब से ढाल लिया है. इस तरह वहां हम्मस, पिटा ब्रेड और फालाफेल लोगों के मुख्य भोजन बन गये हैं. बातचीत में इस्राइल की हिब्रू भाषा का प्रयोग होने लगा है. कसोल में इस्राइल की हिब्रू भाषा में पोस्टर दिखना आम बात है. होटलों के नाम और इसके अलावा, मेन्यू में व्यंजनों के नाम भी हिब्रू में लिखे होते हैं.
मिनी इस्राइल बसा है यहां
कसोल में लोग नमस्कार की जगह ‘शलोम’ कहते हैं और रेस्तरां में सारे मैन्यू हिब्रू भाषा में हैं, और अचानक घूमते-घूमते महसूस होने लगता है कि यहां इस्राइली ही हर जगह दिखायी दे रहे हैं. इसलिए कसोल को मिनी इस्राइल भी कहा जाता है.
कसोल की सीमा में प्रवेश करते ही इस्राइली संस्कृति की झलक देखने को मिलने लगती है. यहां शाम की बयार में लहराते दिखते हैं तिब्बती या ‘स्टार ऑफ डेविड’ वाले इस्राइली झंडे. बेहद शांत और कुदरती खजानों से सराबोर कसोल को इस्राइलियों का मुख्य गंतव्य माना जाता है.
दिल्ली से कसोल जाने के लिए अब ट्रांसपोर्ट सेवा उपलब्ध है. पहले दिल्ली से कुल्लू के लिए हिमाचल सरकार या प्राइवेट टूर ऑपरेटर्स की बस पर ही निर्भर रहना पड़ता था और फिर कुल्लू पहुंच कर कसोल जाने के लिए बस या फिर प्राइवेट टैक्सी लेना पड़ता था. हालांकि, दिल्ली से कुल्लू जाने के लिए हवाई यात्रा भी है और वहां से फिर टैक्सी लेकर कसोल जाना पड़ता है.
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