आजमाये गये खर्च के अजब नुस्खे

Published at :01 Jun 2014 4:26 AM (IST)
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आजमाये गये खर्च के अजब नुस्खे

भारत का सबसे बड़ा प्रचार-आक्रमण दिखा इस बार ।। अरिंदम मुखर्जी।। इस बार लोकसभा चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक-एक लोकसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों ने पांच से पंद्रह करोड़ रुपये खर्च किये हैं, जबकि चुनाव आयोग की सीमा 70 लाख रुपये प्रति उम्मीदवार थी. प्रत्याशियों ने पैसे बांटने के लिए तरह-तरह के […]

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भारत का सबसे बड़ा प्रचार-आक्रमण दिखा इस बार

।। अरिंदम मुखर्जी।।

इस बार लोकसभा चुनाव में पानी की तरह पैसा बहाया गया. एक-एक लोकसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों ने पांच से पंद्रह करोड़ रुपये खर्च किये हैं, जबकि चुनाव आयोग की सीमा 70 लाख रुपये प्रति उम्मीदवार थी. प्रत्याशियों ने पैसे बांटने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाये. चुनाव आयोग की कड़ाई धरी की धरी रह गयी. इसी पर पढ़ें एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट..

अभी-अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में जिस तरह से पार्टियों ने खर्च किया है, वह विस्मित कर देने वाला है. खर्च के हिसाब से भी यह ऐतिहासिक चुनाव था. मार्केट के बड़े-से-बड़े धुरंधर भी चुनाव के इन दो महीनों में बहुत ही परेशान रहे. हालत यह थी कि देश के दो सबसे बड़े बाजार- दिल्ली और मुंबई- में अपने प्रोडक्ट के प्रचार के लिए विज्ञापन की जगह नहीं मिल पायी. न अखबारों में, न बिलबोर्ड पर और न ही सोशल मीडिया में.विज्ञापन के लिए सभी प्राइम एडवरटाइजिंग स्पेस राजनीतिक दलों ने खरीद ली थी. भारतीय राजनीति के इतिहास में अब तक के सबसे बड़ा प्रचार-आक्रमण दिखा.

पार्टियों, उम्मीदवारों, व्यापारियों, चुनाव प्रेक्षकों और चुनाव आयोग के प्रतिनिधियों से बातचीत के बाद ‘आउटलुक’ के द्वारा लगाये एक आकलन के अनुसार इस चुनाव में पार्टियों ने 31,950 करोड़ रुपये खर्च किये.चुनाव के लिए हुए सरकारी खर्च 3,426 करोड़ रुपये से 10 गुना ज्यादा. इस आंकड़े की तुलना वर्ष 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव से करें, जहां चुनाव में लगभग 42,000 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. यह राशि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम की राशि की आधी है. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं. यह जो मनी-पावर है, इस बात को दर्शाता है कि बड़े बिजनेस हाउस किस तरह पार्टियों को फंड कर रहे हैं. इस चुनाव में बिजनेसमैन उम्मीदवार की संख्या भी अच्छी खासी थी.

आउटडोर मैनेजरों और विज्ञापन के काम में लगे लोगों के अनुसार चुनाव का जो कुल खर्च है, उसमें से दो तिहाई खर्च अकेले भाजपा के खाते में दिखता है. सारे एक्सपर्ट स्वीकार करते हैं कि इसने सारा गेम बदल के रख दिया. मोदी कैंपेन के इस पूरे शो के लिए अहमदाबाद और हैदराबाद में बैठी कैंपेन की डिजिटल मीडिया आर्मी ने एक साल पहले ही योजना पर काम करना शुरू कर दिया था. भाजपा के प्रचार अभियान का जिम्मा मैडिसन एडवरटाइजिंग को मिला था. इस कंपनी के चैयरमैन सैम बलसारा कहते हैं-‘ भाजपा के मीडिया कैंपेन में बड़े पैमाने पर कई नये किस्म के इनोवेटिव प्रचार के काम पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हुए.’ इस वर्ष विज्ञापन उद्योग में की जो कुल वृद्धि दिखेगी, इसमें आधे का श्रेय राजनीतिक विज्ञापनों को मिलेगा.

आंध्र प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र से खबरें आयीं कि वोटरों को लुभाने के लिए नोट बांटे गये. सत्ता विरोध की लहर भांप कर नेताओं ने चुनाव जीतने के लिए हर तरकीब आजमायी. प्रचार-कार्य में खूब खर्च तो किया ही गया. उपहार और शराब तक बांटे गये. वोटरों को भोज दिये गये. वोटरों को लुभाने के काम में सबसे ज्यादा सुर्खियों में आंध्र प्रदेश रहा. लोकसत्ता पार्टी के अध्यक्ष जयप्रकाश नारायण के एक आकलन के मुताबिक आंध्र प्रदेश में इस बार के चुनाव में लगभग 3000 करोड़ रुपये खर्च हुए होंगे. वह बताते हैं कि, ‘आंध्र प्रदेश में 1990 के दशक में चुनाव में धनबल के उपयोग की शुरुआत हुई. अब तो यह बीमारी पूरे देश में फैल गयी है.’ जानकार बताते हैं कि वर्ष 2009 के विधानसभा चुनाव में एक-एक उम्मीदवार ने एक करोड़ रुपये प्रति सीट खर्च किये थे. इस हिसाब से देखें तो इस बार के चुनाव में तो यह खर्च आसमान पहुंच गया होगा. विशाखापत्तनम लोकसभा सीट से खड़ी वाइएसआर कांग्रेस की उम्मीदवार वाइएस विजयलक्ष्मी ने लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किये, क्योंकि यह सीट उनके लिए ‘प्रेस्टिज इश्यू’ बन गया थी. एक दूसरा उदाहरण देखिए. चेवेल्ला लोकसभा सीट से तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस)के उम्मीदवार कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी ने भी लगभग 100 करोड़ रुपये खर्च किये. विश्वेश्वर रेड्डी अपोलो ग्रुप वाले सी प्रताप रेड्डी के दामाद हैं.

जयप्रकाश नारायण की मानें तो, ‘ग्रामीण इलाकों में सभी वोट खरीदे गये हैं. यहां तक कि सभी दलों के उम्मीदवारों को गांव में घुसने से पहले ‘इन्ट्रेंस फी’ देनी पड़ी. हर वोटर को दो से तीन हजार रुपये देने पड़े. इन सारे रुपयों का इंतजाम उम्मीदवारों को करना पड़ा.’ इस बार के विधानसभा चुनाव में खड़े एक बड़ी पार्टी के नेता ने कहा, ‘वो दिन गये, जब वोटर सौ रुपये में मान जाते थे. अब तो चुनाव कैंपेन में लगे वर्कर को सात सौ रुपये से लेकर 1000 रुपये प्रतिदिन देने पड़ते हैं. शराब की बोतल और बढ़िया खाना अलग से. इन सबके अलावा एक-एक वोटर को 1000 रुपये दिया गया.’

नालगोंडा में चुनाव अभियान के दौरान एक टोयोटा इनोवा (इस गाड़ी पर कांग्रेस नेता का स्टिकर लगा था) की बोनट में से ढाई करोड़ रुपये बरामद हुए थे. कई एंबुलेंस पकड़े गये, जिसमें बड़ी मात्र में नकद राशि बरामद हुई. महाराष्ट्र में अधिकारियों ने लंचबॉक्स बरामद किये, जिसमें रुपये ठूंसे हुए थे. पंजाब में तो कुछ अलग ही जुगाड़ था. एक जगह पर अच्छी खासी संख्या में रेलवे टिकट बरामद हुआ, पता चला कि ये टिकट वोटरों को दिये जाते और इसे कैंसल कराने से उन्हें रुपये मिल जाते.

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज के एन भास्कर राव कहते हैं कि, ‘इस बार चुनाव में ज्यादा करोड़पतियों के खड़ा होने से वोटरों को ज्यादा माल मिलने की उम्मीद हो गयी थी. उत्तर प्रदेश में वर्ष 2009 में लगभग 20 फीसदी वोटरों को रुपये दिये गये थे, इस बार का आकलन है कि यह आंकड़ा 65 फीसदी तक पहुंच सकता है. मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 52 फीसदी का है.’

पॉलिटकल पब्लिसिटी मैनेजमेंट के एक्सपर्ट दिलीप चेरियन बताते हैं कि सबसे ज्यादा खर्च एडवरटाइजिंग, इवेंट मैनेजमेंट, ट्रांसपोर्टेशन और बेहिसाबी राशि (अनएकाउंटेड मनी) के क्षेत्र में हुए हैं. आउटडोर एडवरटाइजिंग और पब्लिसिटी के मद में राजनीतिक दलों ने इस बार बड़ा बजट बनाया था. उन्होंने बड़े पैमाने पर होर्डिग बुक किये थे. अखबारों के पहले पóो पर आधे और पूरे पóो भर के विज्ञापन बुक कर लिये थे. अंदाजा लगाइए: नयी दिल्ली के वसंत कुंज इलाके में एक बड़ी होर्डिग लगवाने का खर्च 8-10 लाख रुपये आता है, जबकि मुंबई के हाजी अली या वेस्टर्न एक्सप्रेस हाइवे वाले इलाके में यही खर्च 15-25 लाख रुपये का आता है. एक राष्ट्रीय अखबार में फुल फ्रंट पेज का विज्ञापन का खर्च लगभग एक करोड़ रुपये होता है. बड़ी मात्र में राजनीतिक दलों ने ये सारे स्पेस खरीद लिये थे.

एक अन्य पब्लिसिटी एक्सपर्ट संदीप गोयल के अनुसार इस बार इलेक्शन कैंपेन का खर्च, लोग जितना बता रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा है. आउटडोर स्पेंडिंग को मापा नहीं जा सकता है. इसका कोई फिक्स्ड रेट नहीं होता है. यह पूरी तरह से कैश मार्केट है. टीवी, रेडियो और डिजिटल का खर्च भी पांच गुना बढ़ा है. रैलियों का खर्चा लगभग एक करोड़ रुपये तक आता है. ट्रांसपोर्टेशन, हॉसपिटैलिटी, बफे मील और वॉलंटियर का खर्चा अलग जोड़ लीजिए.

इस बार पार्टियों ने की-रिंग, सन-ग्लासेस, कुशन कवर, टी-शर्ट और झंडे पर भी अच्छा-खासा खर्च किया. ट्रांसपोर्टेशन और हवाई यात्रओं के खर्चे में पचास फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. इस बार नेताओं ने 540 एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर का इस्तेमाल किया. हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध करानेवाले एक उद्यमी ने बताया कि वर्ष 2009 में रोजाना तीन से चार घंटे की बुकिंग मिलती थी. इस बार रोजाना नौ से दस घंटे की बुकिंग मिली.

जानकार बताते हैं कि इस बार चुनाव में एक-एक लोकसभा क्षेत्र में उम्मीदवारों ने पांच से पंद्रह करोड़ रुपये खर्च किये हैं, जबकि चुनाव आयोग की सीमा 70 लाख रुपये प्रति उम्मीदवार थी. एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनिल वर्मा के अनुसार ज्यादातर उम्मीदवार तयशुदा सीमा का 65 फीसदी ही खर्च के रूप में दिखाते हैं. पिछले चुनाव में 10 फीसदी उम्मीदवारों ने डिक्लेयरेशन में ट्रांसपोर्टेशन मद में कोई खर्च ही नहीं दिखाया और आठ फीसदी उम्मीदवारों ने वॉलंटियर मद में कोई खर्च नहीं बताया. यह पूरी तरह से अविश्वसनीय है.

इन सबमें पेंच यह है कि खर्च की सीमा उम्मीदवार पर लागू होती है, पार्टियों पर नहीं. चुनाव आयोग की आंख में धूल झोंकने के लिए पार्टियों ने एक-से एक अनूठे तरीके खोज लिये हैं.

(संपादित-संशोधित अंश. साभार: आउटलुक)

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