सिर पर ईंटों का बोझ नहीं दबा सका उसकी प्रतिभा

।। अनुज सिन्हा।। (वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर) शनिवार को झारखंड के अखबारों में, पहले पन्ने पर एक लड़की की तसवीर छपी. यह तसवीर थी सिर पर ईंट-बालू ढोती एक लड़की की. यह मजदूरी करनेवाली कोई आम लड़की नहीं है. इसने इंटर आर्ट्स की परीक्षा में राज्य में नौवां स्थान हासिल किया है. नाम है जूलिया […]
।। अनुज सिन्हा।।
(वरिष्ठ संपादक प्रभात खबर)
शनिवार को झारखंड के अखबारों में, पहले पन्ने पर एक लड़की की तसवीर छपी. यह तसवीर थी सिर पर ईंट-बालू ढोती एक लड़की की. यह मजदूरी करनेवाली कोई आम लड़की नहीं है. इसने इंटर आर्ट्स की परीक्षा में राज्य में नौवां स्थान हासिल किया है. नाम है जूलिया मिंज. बेड़ो (जिला रांची) के करांजी गांव की है. दो साल की थी, तभी पिता का निधन हो गया था. पर इस आदिवासी परिवार ने हार नहीं मानी. मां कठिन मेहनत-मजदूरी कर बच्चों को पाल रही है. प्रतिभा की धनी जूलिया भी पढ़ाई के साथ-साथ मजदूरी करती है, ताकि परिवार का खर्च चल सके. जिस दिन रिजल्ट निकला, उस दिन भी वह काम पर गयी थी. ईंट-बालू ढो रही थी. जब उसे बताया गया कि वह राज्य में नौंवे स्थान पर आयी है, तो उसे सहसा यकीन नहीं हुआ. लेकन फिर उसे समझ में आ गया कि उसकी मेहनत रंग ले आयी है. अब वह आगे पढ़ना चाहती है.
झारखंड और बिहार में मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में कई ऐसी प्रतिभाएं सामने आयी हैं जिनके पास साधन का अभाव था. किताब खरीदने तक के पैसे नहीं थे, लेकिन इन बच्चों ने परीक्षा में दिखा दिया कि ये कितने आगे हैं. प्रतिभा है तो उसे कोई रोक नहीं सकता. जूलिया जब बड़ी हुई तो उसे पता था कि उसके पास दो रास्ते हैं. एक रास्ता है, जिंदगी भर मजदूरी करते रहें. दूसरा रास्ता है,मजदूरी कर पेट-परिवार तो पालें, पर साथ में पढ़ाई कर बेहतर भविष्य गढ़ें. जूलिया ने दूसरा रास्ता चुना. राह कठिन है. खेतों में मजदूरी कर, थकने के बाद पढ़ाई करना आसान नहीं है. लेकिन जब जज्बा हो तो राह आसान हो जाती है. जूलिया के मामले में भी ऐसा ही है. अब गांवों से, छोटी-छोटी जगहों से प्रतिभाएं निकल रही हैं.
कुछ साल पहले नक्सल प्रभावित क्षेत्र गुड़ा (डुमरिया) से एक गरीब आदिवासी छात्र ने आइआइटी की परीक्षा अच्छे रैंक से पास की थी. वह भी उसी गांव में रह कर. कुछ साल पहले इसी इंटर की परीक्षा में पूरे राज्य में जो छात्र टॉपर रहा था, वह एक लॉज में छात्रों का खाना बनाता था. छात्रों को पढ़ते देख कर उसने भी पढ़ाई शुरू की. लगन ऐसी थी कि टॉपर बन गया. इस बार भी इंटर की परीक्षा में बड़े शहरों या कॉलेजों के साथ-साथ इचाक, मुसाबनी, मूरी, घाघरा जैसी छोटी जगहों के बच्चों ने भी टॉप टेन में स्थान बनाया है. यह राज्य/देश के लिए शुभ संकेत है. सबसे बड़ा बदलाव यह दिख रहा है कि अब सुदूर गांवों के भी लोग अपने बच्चों (खास कर बेटियों) को पढ़ाने से पीछे नहीं हट रहे हैं.
अब ऐसी बात नहीं रही कि सिर्फ प्राइवेट स्कूलों में ज्यादा फीस देकर पढ़नेवाले बच्चे ही बेहतर करते हैं. सवाल है लगन का. अगर प्रतिभा है, लगन है तो आगे बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता. जूलिया या उस जैसे बिहार-झारखंड के छात्र-छात्रएं उन बच्चों के लिए आदर्श हैं, उदाहरण हैं, जिनके पास साधन नहीं हैं, जो गरीबी के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं. बच्चों के माता-पिता को भी यह समझना होगा कि शिक्षा ही वह हथियार है जिसके बल पर उनके बच्चों का भविष्य संवर सकता है. कभी-कभार आधा पेट खाना पड़े, कोई बात नहीं, कड़ी मेहनत करनी पड़े, करें, लेकिन बच्चों की पढ़ाई से कोई समझौता न करें. उन्हें हर हाल में पढ़ायें.
जूलिया अगर मजदूरी कर पढ़ाई करती रही तो इसमें शर्म की बात नहीं है. गर्व करने की बात है. मजदूरी से जो पैसा मिला, उससे उसने पढ़ाई पर खर्च किया और साबित कर दिया कि गांव-देहात में रहनेवाली, मेहनत-मजदूरी करनेवाली लड़की किसी से कम नहीं है. मौका मिले तो वह बेहतर कर सकती है और उसने ऐसा कर दिखाया. जूलिया की मां की हिम्मत की भी दाद देनी होगी जिसने पति की मौत के बाद संघर्ष जारी रखा. कठिन श्रम किया, पर बेटी की पढ़ाई को बाधित नहीं होने दिया. समाज का एक बड़ा तबका ऐसा है जहां पैसे का अभाव नहीं है, साधन है पर बच्चे बिगड़ रहे हैं. माता-पिता ध्यान नहीं दे पाते. दूसरी ओर जूलिया मिंज जैसी लड़की है. ऐसे लड़के -लड़कियों को अगर अवसर मिले तो वे अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सकते हैं.
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