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धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भेदभाव क्यों ? समाप्त हो अनुच्छेद 30 : कैलाश विजयवर्गीय

Updated at : 06 Jun 2020 12:29 PM (IST)
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धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भेदभाव क्यों ? समाप्त हो अनुच्छेद 30 : कैलाश विजयवर्गीय

कोलकाता : भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अनुच्छेद 30 के तहत धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भेदभाव पर सवाल उठाया है और इसे समाप्त करने की मांग की है. श्री विजयवर्गीय ने कहा कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने की घोषणा की थी. मोदी सरकार ने 1500 ऐसे कानून समाप्त भी कर दिये हैं. पढ़िए अजय कुमार की रिपोर्ट.

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कोलकाता : भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने अनुच्छेद 30 के तहत धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भेदभाव पर सवाल उठाया है और इसे समाप्त करने की मांग की है. श्री विजयवर्गीय ने कहा कि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार बनने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गैरजरूरी कानूनों को खत्म करने की घोषणा की थी. मोदी सरकार ने 1500 ऐसे कानून समाप्त भी कर दिये हैं. पढ़िए अजय कुमार की रिपोर्ट.

लंबे समय से हो रही समाप्त करने की मांग

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक भेदभाव और सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेद 30 को समाप्त करने की मांग लंबे समय से हो रही है. कुछ कारणों से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2006 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा समाप्त किया था. संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत देश में धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को कई अधिकार मिले हैं. खास बात यह है कि संविधान में ‘अल्पसंख्यक’ शब्द परिभाषित नहीं है.

अल्पसंख्यक का दर्जा पाने की कोशिश

1980 में रामकृष्ण मिशन ने अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की थी. सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में रामकृष्ण मिशन को हिन्दू धर्म का ही अंग माना. एक समय आर्य समाज संस्था भी अपने को अल्पसंख्यक घोषित कराने के लिए अदालत में गयी थी. कुछ राज्यों में चर्च के प्रभाव में आदिवासी संगठन भी अल्पसंख्यक दर्जा पाने की मांग कर रहे हैं. इस तरह की मांग समाज को तोड़ने के लिए की जा रही है.

अनुच्छेद 30 के कारण बढ़ा धार्मिक भेदभाव

भारतीय समाज में अनुच्छेद 30 के कारण धार्मिक भेदभाव बढ़ा है. इसी कारण आठ राज्यों- लक्षद्वीप, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और पंजाब ने हिंदुओं की जनसंख्या कम होने के कारण सुप्रीम कोर्ट में हिन्दुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की मांग की है. तर्क दिया गया है कि इन राज्यों में हिन्दुओं को अल्पसंख्यकों का दर्जा न मिलने के कारण सुविधाएं नहीं मिल रही हैं.

अपनी ही भाषा में शिक्षा का अधिकार

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 28 के तहत सरकार की आर्थिक सहायता से संचालित शैक्षणिक संस्थानों में कोई भी धार्मिक निर्देश नहीं दिया जा सकता है. अनुच्छेद 29 में भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों को अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति बनाये रखने का अधिकार मिला है. अनुच्छेद 30 देश में धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यकों को कई अधिकारों के साथ अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के लिए अधिकार देता है. अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अधिकार है कि वे अपने बच्चों को अपनी ही भाषा में शिक्षा दिला सकते हैं.

तीन तरह के चल रहे अल्पसंख्यक संस्थान

देश में तीन तरह के अल्पसंख्यक संस्थान चल रहे हैं. पहला है सरकार से मान्यता लेने के साथ-साथ आर्थिक सहायता की मांग करने वाले संस्थान, दूसरा आर्थिक सहायता के बिना राज्य सरकार से मान्यता लेने वाले संस्थान हैं. ऐसे संस्थानों को सरकारों द्वारा तय नियमों शैक्षणिक मानकों, पाठ्यक्रम, शिक्षण कर्मचारियों के रोजगार, अनुशासन, स्वच्छता आदि से संबंधित का पालन करना होता है. तीसरी श्रेणी में ऐसे संस्थान आते हैं जो न तोउ राज्य से मान्यता लेते हैं और न ही आर्थिक सहायता मांगते हैं यानी इतना तो साफ हो रहा है कि ऐसे संस्थान विदेशी सहायता के आधार पर चल रहे हैं. ऐसे संस्थानों को अपने नियमों को लागू करने की छूट मिली है.

सिख-जैन संस्थान कर रहे बेहतर कार्य

श्रम कानून, अनुबंध कानून, औद्योगिक कानून, कर कानून, आर्थिक नियम आदि जैसे सामान्य कानूनों का इन संस्थानों को पालन करना होता है. अनुच्छेद 30 के तहत शैक्षणिक संस्थानों को प्रशासन का अधिकार मिला है. सरकार किसी भी स्थिति में ऐसे संस्थानों में दखल नहीं दे सकती है. अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा धर्मांतरण कराने के मामले में लगातार चर्चा में रहे हैं. सिख और जैन समाज द्वारा संचालित शिक्षण संस्थान के कार्य इन मामलों में अपवाद हैं. सिख और जैन संस्थाएं कई मामलों में बेहतरीन कार्य कर रही हैं.

अल्पसंख्यक का दर्जा

27 जनवरी 2014 के भारत के राजपत्र के अनुसार मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन धर्म के लोगों को भारत में अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा मिला है. उन्होंने कहा कि केंद्र में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन( यूपीए) सरकार के दौरान कर्नाटक में लिंगायतों को अल्पसंख्यक दर्जा देने की मांग जोर-शोर से उठायी गयी थी. राजनीतिक फायदे के लिए हजारों साल से हिन्दू धर्म के अभिन्न अंग रहे जैन मत को 2014 में अल्पसंख्यक का दर्जा दे दिया गया.

अनुच्छेद 30 को समाप्त कराने पर चर्चा तेज

भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि अनुच्छेद 29 और 30 के कारण अल्पसंख्यक संस्थानों में दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों को आरक्षण नहीं मिलता है. अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा समाप्त होने के बावजूद आरक्षण लागू नहीं है. अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान को सरकार 95 प्रतिशत तक आर्थिक सहयोग करती है. इसके लिए नेशनल कमीशन फॉर माइनॉरिटी इंस्टीट्यूट्स नामक संस्था बनायी गयी है. इलाबाद हाईकोर्ट ने 2006 में एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना था. एएमयू प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है. यह मामला सात सदस्यीय पीठ में हैं. मोदी सरकार ने इस मामले में यूपीए सरकार द्वारा दी गई चुनौती याचिका वापस ले ली है. धार्मिक भेदभाव बढ़ाने वाले अनुच्छेद 30 को समाप्त कराने पर चर्चा तेज है.

Posted By : Guru Swarup Mishra

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