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बिहार के प्रवासी मजदूरों का घर वापसी के बाद छलका दर्द, बोले- उस पल को याद करने से दुःख पहुंचेगा, सब भूलना पड़ेगा

Updated at : 20 May 2020 6:56 PM (IST)
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बिहार के प्रवासी मजदूरों का घर वापसी के बाद छलका दर्द, बोले- उस पल को याद करने से दुःख पहुंचेगा, सब भूलना पड़ेगा

लॉकडाउन के कारण अन्य राज्यों में फंसे बिहार के प्रवासी कामगार हर हाल में अपने घर वापस आना चाहते हैं. कुछ तो अपने इस मिशन में कामयाब हो पा रहे है, लेकिन कुछ अभी भी दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं. बिहार में रह रहे उनके परिजन इस इंतजार में है कि हमारे घर का सदस्य किसी भी तरह से हम तक पहुंच जाये और हमलोग फिर से एक साथ जिंदगी जीने लगें. वहीं, अन्य प्रदेशों से अपने घर वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों के चेहरे पर अपने सुकून जरूर है, लेकिन यहां पहुंचने के बाद भी उनकी परेशानी कम नहीं हुई है. दरअसल, रोजगार की तलाश में घर से बाहर गये परिवार के कुछ सदस्य अब भी अन्य राज्यों में फंसे हुए है. जिनको लेकर परिवार में गम का माहौल है. पढ़िए बिहार के दरभंगा में ऐसे ही परिवारों से बातचीत के कुछ अंश.

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दरभंगा : लॉकडाउन के कारण अन्य राज्यों में फंसे बिहार के प्रवासी कामगार हर हाल में अपने घर वापस आना चाहते हैं. कुछ तो अपने इस मिशन में कामयाब हो पा रहे है, लेकिन कुछ अभी भी दूसरे राज्यों में फंसे हुए हैं. बिहार में रह रहे उनके परिजन इस इंतजार में है कि हमारे घर का सदस्य किसी भी तरह से हम तक पहुंच जाये और हमलोग फिर से एक साथ जिंदगी जीने लगें. वहीं, अन्य प्रदेशों से अपने घर वापस लौट रहे प्रवासी मजदूरों के चेहरे पर अपने सुकून जरूर है, लेकिन यहां पहुंचने के बाद भी उनकी परेशानी कम नहीं हुई है. दरअसल, रोजगार की तलाश में घर से बाहर गये परिवार के कुछ सदस्य अब भी अन्य राज्यों में फंसे हुए है. जिनको लेकर परिवार में गम का माहौल है. पढ़िए बिहार के दरभंगा में ऐसे ही परिवारों से बातचीत के कुछ अंश.

एक बेटा-बहू तो घर आ गये, तीन बेटा-बहू अभी भी दिल्ली में…. यह कहते मां की आखें हुई

नमकोनो तरहे एगो बेटा पुतौह त घरे चलि आयल, मुदा तीन गो बेटा पुतौह त दिल्लीये में फंसल हय. यह कहते हुए राजबेसर देवी की आंखें हो जाती है नम. रुंधे गले से कहती है, मकान मालिक कहै छै जे किराया दे दो, ओकरा बाद जाओ. 65 हजार के महीना दोकान के भाड़ा रहै. आब पैसा के जोगाड़ क के भेजे ला कहि रहल हय. खाय में दिक्कत भेलै त फोन पर कहलक, चारि हजार भेज देने रहियै. आब की करियै से किछु बुझाइये नई रहल हय. बीच में राजाराम बोले एगो के चिंता दूर भेल त दोसर के चिंता सतावे लागल. तीन गो बेटा पुतौह सब मिल क ओखला में मिठाई के दोकान चलबैैैत रहे. हंसी खुशी समय बितैत रहे. लॉकडाउन के बाद त खाहु पर आफत भ गेलै. आब घर केना आयत से नई बुझा रहल हय.

घर लौटे प्रवासी मजदूर ने बताया, एक साल पहले गये थे दिल्ली और…

बुधवार को होम क्वाॅरेंटिन में परिजनों के साथ समय बिता रहे अहियारी गोट निवासी राजाराम राय के पुत्र कामोद राय ने बताया कि तीन भाई ओखला में किराया के मकान में पहले से मिठाई दुकान चला रहे थे. हम एक साल पहले ही दिल्ली गये थे. वहां गोविंदपुर 15 नंबर में किराया के मकान में मिठाई दुकान चलाकर कमाने-खाने लगे थे. पत्नी और तीन बच्चे भी साथ ही रहते थे. लॉकडाउन के बाद जब दुकान बंद हो गया, तो कुछ दिन के बाद पेट भरना मुश्किल होने लगा. जो लोग पढ़े-लिखे थे, कूपन भरकर राशन या खाना प्राप्त कर लेते थे. हम उससे भी वंचित रह जाते थे.

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घर से मंगवाये थे पांच हजार, फिर मिली ट्रेन सेवा शुरू होने की जानकारी

कामोद ने बताया कि राशन और पैसा समाप्त होने पर घर से पांच हजार रुपये मंगवाये. इस बीच ट्रेन सेवा शुरू होने की जानकारी मिली. तोमर नाम के व्यक्ति ने टिकट का जुगाड़ करवा दिया. जिस दिन ट्रेन खुलने वाली थी, उस दिन सुबह बस आयी और ले जाकर स्टेशन पर छोड़ दिया. स्टेशन पर जांच हुई और इसके बाद सीट पर बैठा दिया गया. ट्रेन से मुजफ्फरपुर तक चले आये. मुजफ्फरपुर में जांच के बाद घर चले जाने को कहा गया. वहां से 14 सौ में टेम्पू भाड़ा किये और 18 मई की देर रात घर पहुंच गये. यहां परिजनों के साथ होम क्वॉरेंटिन में रह रहे हैं. बताया कि दिल्ली से मुजफ्फरपुर तक कहीं ट्रेन में न खाना मिला न पानी. कोई पूछने तक नहीं आया. मुजफ्फरपुर में जांच के बाद एक-एक पॉकेट खाना और एक बोतल पानी दिया.

लॉकडाउन के बाद मुश्किल से बीता दो महीना

कामोद ने बताया कि लॉकडाउन के बाद बीते क्षणों को याद कर सिहरन होने लगती है. कभी-कभी बच्चे भूख के मारे बिलखने लगते थे. सबसे छोटा बच्चा नौ महीने का है. उसके लिए दूध का जुगाड़ करना टेढ़ी खीर साबित होता था. मशक्कत के बाद एक लीटर दूध उपलब्ध होता था, उसमें पानी मिला कर तीन-चार दिन तक पिला कर रखते थे. अपने लिये तो नहीं, लेकिन बच्चे के दूध के लिए पुलिस की फटकार और फजीहत भी झेलना पड़ा. दो महीने का समय बड़ी मुश्किल से बीता. उस क्षण को याद कर कलेजा मुंह को आता है. यहां अपनो के बीच आने के बाद उस क्षण की चर्चा करना बेकार है. नहीं तो परिजनों को काफी दुःख पहुंचेगा. हो सकता है कुछ लोग हंसी भी उड़ायें. इसलिए सब भूलना पड़ेगा.

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एक के आने की खुशी तो तीन के नहीं आने का गम, चिंता में डूबे परिजन

इसी तरह उपेंद्र साह के दो पुत्र दिल्ली के शकूरपुर से गांव आ गये हैं. एक पुत्र संजय साह पत्नी और बच्चों के साथ होम क्वॉरेंटिन में परिजनों के साथ समय बिता रहा है. जबकि, दूसरा पुत्र गौड़ी साह विद्यालय के क्वॉरेंटिन केंद्र में समय बिता रहा है. दो पुत्र समयपुर बादली और एक शकूरपुर में ही फंसा है. उनलोगों को दो बार में पांच हजार घर से भेजा जा चुका है. लेकिन, अभी घर आने का जुगाड़ नहीं हुआ है. इसकी चिंता परिजनों को सता रही है. मां मंजू देवी ने बताया कि संजय को भी चार हजार घर से भेजे थे. उसे ट्रेन का टिकट मिल गया. जैसे-तैसे वह घर पहुंच गया.

लॉकडाउन के बाद बंद हो गया काम, मकान मालिक बनाने लगा दबाव

होम क्वॉरेंटिन में समय बिता रहे अहियारी गोट निवासी उपेंद्र साह के पुत्र संजय साह ने बताया कि शुकुरपुर जे ब्लॉक मदन डेयरी के समीप इलेक्ट्रिकल कंपनी में काम करते थे. लॉकडाउन के बाद काम बंद हो गया. जैसे-तैसे समय बीतने लगा. इधर, आकर मकान मालिक भी डेरा खाली करने का दबाब बनाने लगा. बोला अभी चले जाओगे तो कोई किराया नहीं लेंगे. लेकिन, नहीं जाओगे तो बाद में सब जोड़ कर लेंगे. किसी तरह ट्रेन के टिकट का जुगाड़ करवा दिया. उससे दरभंगा तक चले आये.

ट्रेन में दो बार बिस्कुट, नमकीन और पानी दिया गया

दिल्ली से दरभंगा तक ट्रेन में दो बार बिस्कुट, नमकीन और पानी दिया गया. दरभंगा पहुंचने के बाद प्रशासन द्वारा जांच के बाद खाने के लिए पूरी सब्जी और पीने को पानी बोतल दिया . इसके बाद जाले ब्लॉक भेज दिया. जाले से 18 मई की रात को घर पहुंचवा दिया गया. घर में जगह कम होने के कारण मुखिया द्वारा भाई को स्कूल पर ले जाया गया. (दरभंगा : कमतौल से शिवेंद्र कुमार शर्मा की रिपोर्ट)

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Samir Kumar

लेखक के बारे में

By Samir Kumar

More than 15 years of professional experience in the field of media industry after M.A. in Journalism From MCRPV Noida in 2005

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