आपके बच्चे के दिमाग पर क्या असर डाल रहे हैं मोबाइल फोन? देर होने से पहले स्क्रीन टाइम कर लें कंट्रोल

Published by : Rajeev Kumar Updated At : 17 May 2026 11:40 PM

विज्ञापन

बच्चों के लिए कितना खतरनाक है ज्यादा स्क्रीन टाइम / सिम्बॉलिक पिक एआई से

लगातार मोबाइल इस्तेमाल बच्चों की नींद, फोकस, भाषा और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. जानिए एक्सपर्ट्स क्यों मान रहे हैं ज्यादा स्क्रीन टाइम को बच्चों के लिए बड़ा खतरा.

विज्ञापन

आज मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. खाना खिलाने से लेकर पढ़ाई और एंटरटेनमेंट तक, हर जगह स्क्रीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. कई घरों में छोटे बच्चे घंटों मोबाइल पर वीडियो देखते या गेम खेलते नजर आते हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के दिमाग के विकास पर गहरा असर डाल सकता है. डॉक्टरों और रिसर्चर्स का कहना है कि लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने से बच्चों की सोचने, सीखने और ध्यान लगाने की क्षमता प्रभावित हो रही है. सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यह बदलाव उस उम्र में हो रहे हैं, जब बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित हो रहा होता है.

ध्यान और फोकस पर पड़ रहा असर

विशेषज्ञों के मुताबिक मोबाइल पर लगातार तेज और रंगीन कंटेंट देखने की आदत बच्चों के दिमाग को तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला बना रही है. इसका असर यह होता है कि बच्चे लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान नहीं लगा पाते. स्कूल की पढ़ाई, किताबें पढ़ना या शांत माहौल में बैठना उन्हें मुश्किल लगने लगता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बार-बार स्क्रीन बदलने और इंस्टैंट एंटरटेनमेंट की वजह से बच्चों की फोकस करने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है.

भाषा और सीखने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब बच्चे असली बातचीत की जगह ज्यादा समय स्क्रीन के साथ बिताते हैं, तो उनकी भाषा विकसित होने की गति धीमी पड़ सकती है. मोबाइल वीडियो शब्द तो दिखा सकते हैं, लेकिन इंसानी बातचीत की तरह भावनाएं, प्रतिक्रिया और संवाद नहीं दे सकते. छोटे बच्चों के लिए माता-पिता और परिवार के साथ बातचीत बेहद जरूरी होती है. यही बातचीत उनकी शब्दावली, समझ और भावनात्मक विकास को मजबूत बनाती है.

नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ रही चिंता

मोबाइल फोन का असर सिर्फ दिमागी विकास तक सीमित नहीं है. देर रात तक स्क्रीन देखने से बच्चों की नींद खराब हो सकती है. डॉक्टरों का कहना है कि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर के नैचुरल स्लीप साइकल को प्रभावित करती है. इसका असर मूड, याददाश्त और व्यवहार पर भी पड़ता है. कई मामलों में ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव और एंग्जायटी जैसी समस्याओं से भी जुड़ा पाया गया है.

असली दुनिया से दूर हो रहे बच्चे

विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मोबाइल बच्चों का वह समय छीन रहा है, जो उन्हें बाहर खेलने, दोस्तों से मिलने, नई चीजें एक्सप्लोर करने और क्रिएटिव एक्टिविटी में लगाना चाहिए. स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चे अक्सर फिजिकल एक्टिविटी कम करते हैं, जिससे उनकी सोशल स्किल्स और इमोशनल डेवलपमेंट भी प्रभावित हो सकता है.

एक्सपर्ट्स क्या सलाह दे रहे हैं?

डॉक्टर यह नहीं कहते कि मोबाइल पूरी तरह गलत है. उनका मानना है कि सही तरीके और सीमित समय तक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल फायदेमंद भी हो सकता है. लेकिन छोटे बच्चों को बिना निगरानी लंबे समय तक फोन देना नुकसानदायक साबित हो सकता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करें, सोने से पहले मोबाइल इस्तेमाल बंद करवाएं और बच्चों को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटी और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करें.

यह भी पढ़ें: IPL का मैच मोबाइल पर देखने में ज्यादा डेटा खर्च होता है या टीवी पर? यहां जानिए पूरा हिसाब

विज्ञापन
Rajeev Kumar

लेखक के बारे में

By Rajeev Kumar

राजीव कुमार हिंदी डिजिटल मीडिया के अनुभवी पत्रकार हैं और वर्तमान में प्रभातखबर.कॉम में सीनियर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्यरत हैं. 15 वर्षों से अधिक के पत्रकारिता अनुभव के दौरान उन्होंने टेक्नोलॉजी और ऑटोमोबाइल सेक्टर की हजारों खबरों, एक्सप्लेनर, एनालिसिस और फीचर स्टोरीज पर काम किया है. सरल भाषा, गहरी रिसर्च और यूजर-फर्स्ट अप्रोच उनकी लेखन शैली की सबसे बड़ी पहचान है. राजीव की विशेषज्ञता स्मार्टफोन, गैजेट्स, एआई, मशीन लर्निंग, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), साइबर सिक्योरिटी, टेलीकॉम, इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, ICE और हाइब्रिड कारों, ऑटोनोमस ड्राइविंग तथा डिजिटल ट्रेंड्स जैसे विषयों में रही है. वे लगातार बदलती टेक और ऑटो इंडस्ट्री पर नजर रखते हैं और रिपोर्ट्स, आधिकारिक डेटा, कंपनी अपडेट्स तथा एक्सपर्ट इनसाइट्स के आधार पर सटीक और भरोसेमंद जानकारी पाठकों तक पहुंचाते हैं. डिजिटल मीडिया में राजीव की खास पहचान SEO-ऑप्टिमाइज्ड और डेटा-ड्रिवेन कंटेंट के लिए भी रही है. गूगल डिस्कवर और यूजर एंगेजमेंट को ध्यान में रखते हुए वे ऐसे आर्टिकल्स तैयार करते हैं, जो न केवल जानकारीपूर्ण होते हैं, बल्कि पाठकों की जरूरत और सर्च ट्रेंड्स से भी मेल खाते हैं. टेक और ऑटो सेक्टर पर उनके रिव्यू, एक्सपर्ट इंटरव्यू, तुलना आधारित लेख और एक्सप्लेनर स्टोरीज को पाठकों द्वारा काफी पसंद किया जाता है. राजीव ने अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआत वर्ष 2011 में प्रभात खबर दैनिक से की थी. शुरुआती दौर में उन्होंने देश-विदेश, कारोबार, संपादकीय, साहित्य, मनोरंजन और फीचर लेखन जैसे विभिन्न बीट्स पर काम किया. इसके बाद डिजिटल प्लैटफॉर्म पर उन्होंने ग्राउंड रिपोर्टिंग, वैल्यू-ऐडेड स्टोरीज और ट्रेंड आधारित कंटेंट के जरिए अपनी अलग पहचान बनाई. जमशेदपुर में जन्मे राजीव ने प्रारंभिक शिक्षा सीबीएसई स्कूल से प्राप्त की. इसके बाद उन्होंने रांची यूनिवर्सिटी से बॉटनी ऑनर्स और भारतीय विद्या भवन, पुणे से हिंदी पत्रकारिता एवं जनसंचार में डिप्लोमा किया. पत्रकारिता के मूल सिद्धांत 5Ws+1H पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें खबरों की गहराई समझने और उन्हें आसान, स्पष्ट और प्रभावी भाषा में पाठकों तक पहुंचाने में मदद करती है. राजीव की सबसे बड़ी पहचान है, क्रेडिब्लिटी, क्लैरिटी और ऑडियंस-फर्स्ट अप्रोच. वे सिर्फ टेक ऐंड ऑटो को कवर नहीं करते, बल्कि उसे ऐसे पेश करते हैं कि हर व्यक्ति उसे समझ सके, उससे जुड़ सके और उससे फायदा उठा सके. जुड़िए rajeev.kumar@prabhatkhabar.in पर

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola