आपके बच्चे के दिमाग पर क्या असर डाल रहे हैं मोबाइल फोन? देर होने से पहले स्क्रीन टाइम कर लें कंट्रोल

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बच्चों के लिए कितना खतरनाक है ज्यादा स्क्रीन टाइम / सिम्बॉलिक पिक एआई से

लगातार मोबाइल इस्तेमाल बच्चों की नींद, फोकस, भाषा और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है. जानिए एक्सपर्ट्स क्यों मान रहे हैं ज्यादा स्क्रीन टाइम को बच्चों के लिए बड़ा खतरा.

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आज मोबाइल फोन बच्चों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. खाना खिलाने से लेकर पढ़ाई और एंटरटेनमेंट तक, हर जगह स्क्रीन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है. कई घरों में छोटे बच्चे घंटों मोबाइल पर वीडियो देखते या गेम खेलते नजर आते हैं. लेकिन अब एक्सपर्ट्स चेतावनी दे रहे हैं कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के दिमाग के विकास पर गहरा असर डाल सकता है. डॉक्टरों और रिसर्चर्स का कहना है कि लगातार मोबाइल इस्तेमाल करने से बच्चों की सोचने, सीखने और ध्यान लगाने की क्षमता प्रभावित हो रही है. सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि यह बदलाव उस उम्र में हो रहे हैं, जब बच्चों का दिमाग तेजी से विकसित हो रहा होता है.

ध्यान और फोकस पर पड़ रहा असर

विशेषज्ञों के मुताबिक मोबाइल पर लगातार तेज और रंगीन कंटेंट देखने की आदत बच्चों के दिमाग को तुरंत प्रतिक्रिया देने वाला बना रही है. इसका असर यह होता है कि बच्चे लंबे समय तक किसी एक चीज पर ध्यान नहीं लगा पाते. स्कूल की पढ़ाई, किताबें पढ़ना या शांत माहौल में बैठना उन्हें मुश्किल लगने लगता है. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि बार-बार स्क्रीन बदलने और इंस्टैंट एंटरटेनमेंट की वजह से बच्चों की फोकस करने की क्षमता धीरे-धीरे कमजोर हो सकती है.

भाषा और सीखने की क्षमता भी हो सकती है प्रभावित

रिसर्च में यह भी सामने आया है कि जब बच्चे असली बातचीत की जगह ज्यादा समय स्क्रीन के साथ बिताते हैं, तो उनकी भाषा विकसित होने की गति धीमी पड़ सकती है. मोबाइल वीडियो शब्द तो दिखा सकते हैं, लेकिन इंसानी बातचीत की तरह भावनाएं, प्रतिक्रिया और संवाद नहीं दे सकते. छोटे बच्चों के लिए माता-पिता और परिवार के साथ बातचीत बेहद जरूरी होती है. यही बातचीत उनकी शब्दावली, समझ और भावनात्मक विकास को मजबूत बनाती है.

नींद और मानसिक स्वास्थ्य पर बढ़ रही चिंता

मोबाइल फोन का असर सिर्फ दिमागी विकास तक सीमित नहीं है. देर रात तक स्क्रीन देखने से बच्चों की नींद खराब हो सकती है. डॉक्टरों का कहना है कि स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट शरीर के नैचुरल स्लीप साइकल को प्रभावित करती है. इसका असर मूड, याददाश्त और व्यवहार पर भी पड़ता है. कई मामलों में ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में चिड़चिड़ापन, तनाव और एंग्जायटी जैसी समस्याओं से भी जुड़ा पाया गया है.

असली दुनिया से दूर हो रहे बच्चे

विशेषज्ञ मानते हैं कि सबसे बड़ा नुकसान यह है कि मोबाइल बच्चों का वह समय छीन रहा है, जो उन्हें बाहर खेलने, दोस्तों से मिलने, नई चीजें एक्सप्लोर करने और क्रिएटिव एक्टिविटी में लगाना चाहिए. स्क्रीन पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चे अक्सर फिजिकल एक्टिविटी कम करते हैं, जिससे उनकी सोशल स्किल्स और इमोशनल डेवलपमेंट भी प्रभावित हो सकता है.

एक्सपर्ट्स क्या सलाह दे रहे हैं?

डॉक्टर यह नहीं कहते कि मोबाइल पूरी तरह गलत है. उनका मानना है कि सही तरीके और सीमित समय तक टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल फायदेमंद भी हो सकता है. लेकिन छोटे बच्चों को बिना निगरानी लंबे समय तक फोन देना नुकसानदायक साबित हो सकता है. एक्सपर्ट्स सलाह देते हैं कि माता-पिता बच्चों के स्क्रीन टाइम को कंट्रोल करें, सोने से पहले मोबाइल इस्तेमाल बंद करवाएं और बच्चों को ज्यादा से ज्यादा आउटडोर एक्टिविटी और परिवार के साथ समय बिताने के लिए प्रेरित करें.

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Rajeev Kumar

लेखक के बारे में

By Rajeev Kumar

राजीव, 14 वर्षों से मल्टीमीडिया जर्नलिज्म में एक्टिव हैं. टेक्नोलॉजी में खास इंटरेस्ट है. इन्होंने एआई, एमएल, आईओटी, टेलीकॉम, गैजेट्स, सहित तकनीक की बदलती दुनिया को नजदीक से देखा, समझा और यूजर्स के लिए उसे आसान भाषा में पेश किया है. वर्तमान में ये टेक-मैटर्स पर रिपोर्ट, रिव्यू, एनालिसिस और एक्सप्लेनर लिखते हैं. ये किसी भी विषय की गहराई में जाकर उसकी परतें उधेड़ने का हुनर रखते हैं. इनकी कलम का संतुलन, कंटेंट को एसईओ फ्रेंडली बनाता और पाठकों के दिलों में उतारता है. जुड़िए [email protected] पर

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