संतरा बाजार में हाहाकार

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 17 Nov 2016 12:34 AM

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सिलीगुड़ी. पुराने 500 एवं 1000 रुपये के नोटबंदी का असर करीब एक सप्ताह बाद देखने को मिलने लगा है. इस योजना से काला धन को रोक पाने में कहां तक कामयाबी मिली है, इसका पता तो बाद में चलेगा, लेकिन फिलहाल सरकार के इस फैसले में सिलीगुड़ी के संतरा बाजार की आर्थिक स्थिति को खस्ताहाल […]

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सिलीगुड़ी. पुराने 500 एवं 1000 रुपये के नोटबंदी का असर करीब एक सप्ताह बाद देखने को मिलने लगा है. इस योजना से काला धन को रोक पाने में कहां तक कामयाबी मिली है, इसका पता तो बाद में चलेगा, लेकिन फिलहाल सरकार के इस फैसले में सिलीगुड़ी के संतरा बाजार की आर्थिक स्थिति को खस्ताहाल करदिया है. सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट के संतरा बाजार में वीरानी छायी हुई है. यहां उल्लेखनीय है कि सिलीगुड़ी के आसपास दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र तथा सिक्किम में बड़े पैमाने पर संतरे की खेती होती है. आम बोलचाल की भाषा में यह संतरा का सीजन है.

सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट के लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, ठंड के शुरू होते ही पहाड़ से बड़े पैमाने पर नारंगी की आवक शुरू हो जाती है. दार्जिलिंग चाय जिस तरह से मशहूर है उसी तरह से दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में उत्पादित संतरा की भी अपनी एक अलग पहचान है. आम तौर पर संतरे का सबसे अधिक उत्पादन महाराष्ट्र के नागपुर इलाके में होता है और सिलीगुड़ी में भी नागपुर से भारी मात्रा में संतरे आते हैं. उसके बाद भी पहाड़ के संतरे की बात ही कुछ और है. माना जाता है कि पहाड़ के संतरे की मिठास काफी अधिक होती है. यही वजह है कि यहां के संतरे की मांग बांग्लादेश तथा नेपाल में भी काफी अधिक है. लेकिन सरकार के नोटबंदी का सीधा असर संतरा उद्योग पर पड़ा है. पहाड़ से सिलीगुड़ी में संतरे की आवक लगभग नहीं के बराबर हो रही है.

जाड़े के मौसम में प्रतिदिन करीब 100 ट्रक संतरे की आवक सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में होती थी. अब यह संख्या घटकर मात्र दो से तीन ट्रकों की रह गई है. सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट में न केवल संतरा कारोबारी, बल्कि इस काम से जुड़े मजदूर, ट्रक चालक एवं मालिक हाथ पर हाथ धरे बैठे हुए हैं. रेगुलेटेड मार्केट में ट्रक लेकर खड़े एक चालक श्रवण साहा ने बताया है कि आठ दिन हो गये हैं और ट्रक का चक्का नहीं घुमा है. जाड़े के मौसम में वह लोग आम तौर पर पहाड़ के विभिन्न स्थानों से संतरा लेकर सिलीगुड़ी आते थे. आठ दिन से पहाड़ का रूख किया ही नहीं. दरअसल इसके पीछे सबसे बड़ी समस्या नगदी को लेकर है. सिलीगुड़ी के प्रमुख संतरा कारोबारी रंजीत प्रसाद ने बताया है कि यदि सात-आठ दिनों में स्थिति नहीं सुधरी, तो न केवल कारोबारी, बल्कि किसानों की भी कमर पूरी तरह से टूट जायेगी. यह संतरे के पकने का मौसम है. छह से सात दिनों के बाद संतरे गिरकर सड़ने लगेंगे. इसका लाभ किसी को नहीं होगा.

कैसे होता है काम
श्री प्रसाद द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार, यह सारी समस्या नोटबंदी को लेकर हो रही है. सरकार ने पुराने नोट तो बंद कर दिये, लेकिन पर्याप्त मात्रा में नये नोटों को बाजार में जारी नहीं किया. बगैर नगदी के कोई काम संभव नहीं है. पहाड़ से संतरा लाने के लिए किसानों के साथ-साथ बिचौलियों को भी नगद भुगतान करना पड़ता है. इसके अलावा संतरा तोड़ने एवं ट्रकों से माल लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले मजदूरों को भी नगद में भुगतान करना पड़ता है. ट्रक ड्राइवर भी नगद में भी भुगतान लेते हैं. अब जब कारोबारियों के पास नगदी ही नहीं है तो काम कैसे होगा.
पहाड़ पर और भी समस्या
सिलीगुड़ी रेगुलेटेड मार्केट के कारोबारियों तथा मजदूरों ने सरकार के इस निर्णय को हड़बड़ी में उठाया गया कदम बता रहे हैं. ऐसा नहीं है कि सिर्फ संतरा बाजार में ही वीरानी छायी हुई है. दरअसल पूरा रेगुलेटेड मार्केट ही वीरान है. हर दिन यहां 300 से 400 ट्रकों की आवाजाही होती है. इसके अलावा अकेले संतरा बाजार में ही करीब 300 मजदूर अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं. यहां के लोगों का कहना है कि नोटबंदी को लेकर पहाड़ पर स्थिति सुधरने की संभावना नहीं है, क्योंकि जिन इलाकों में संतरे की खेती होती है, उनमें से अधिकांश इलाकों में डाकघर अथवा बैंक है ही नहीं. यहां के लोग नोट बदलने जायेंगे भी तो कहां. इसी वजह से आने वाले दिनों में भी संतरे के बाजार में सुधार की कोई संभावना नहीं दिख रही है.
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