मालदा और दार्जिलिंग के लिए वरदान ना साबित हो जाय तृणमूल की हार
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 26 May 2016 2:53 AM
मालदा. मालदा और दार्जिलिंग जिले में तृणमूल को एक तरह से शाप के रूप में वरदान मिल गया है. जिला तृणमूल नेताओं का मानना है कि मालदा और दार्जिलिंग से पार्टी को एक भी सीट नहीं मिलना एक तरह से दोनों जिले के लिये वरदान है. इन नेताओं का तर्क है कि अब इन दोनों […]
चुनाव परिणाम के बाद सृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने स्वयं कहा कि दोनों जिलों के विकास की निगरानी वह स्वयं करेंगी. मुख्यमंत्री की इस घोषणा को सभी वरदान मान रहे हैं. तृणमूल नेताओं का कहना है कि यदि मुख्यमंत्री स्वयं इन दोनों जिलों की निगरानी करेंगी तो अन्य जिलों के मुकाबले ये दोनों जिले काफी आगे निकल जायेंगे. वर्ष 1972 से 1977 के बीच मालदा का काफी विकास हुआ था. तब तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय मालदा से ही थे. तृणमूल खेमे के अनुसार अतीत के वो दिन फिर से लौटने वाले है.उल्लेखनीय है कि इस बार विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने एतिहासिक जीत दर्ज की है. फिर भी मालदा और दार्जिलिंग जिले में एक भी सीट पर पार्टी जीत हासिल नहीं कर सकी. दोनों जिलों में तृणमूल की इस स्थिति के लिये जिला नेतृत्व को ही दोषी ठहराया जा रहा है. स्वयं ममता बनर्जी ने भी पार्टी में गुटबाजी को इसका जिम्मेदार ठहराया है. इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने जिला नेतृत्व को आड़े हाथों लिया है. एक उच्च माध्यमिक विद्यालय की प्रधान शिक्षिका ने कहा कि यदि जिले की कमान स्वयं मुख्यमंत्री के हाथों में हो तो बात ही कुछ और होगी. जिले के नागरिकों की समस्या सीधे मुख्यमंत्री तक पहुंचेगी. जिला प्रशासन के एक उच्च अधिकारी ने कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हमेशा कर्मचारियों के साथ रही हैं. पे कमिशन आदि को लेकर कुछ समस्या है. जिले की बागडोर उनके हाथों में होगी तो कर्मचारी भी लाभान्वित होगें.
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