सात वर्ष तो गुजरे गये अब कब मिलेगी मदद

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नक्सलबाड़ी: सरकारी घोषणाओं के बावजूद एक विकलांग बेटी के पिता को उसकी बच्ची की देखरेख के लिए सरकारी मदद नहीं मिल रही है. यह सवाल नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र के स्टेशन रोड निवासी सुभाष साह का सरकार के उन नेताओं से है, जो विकलांगता को एक अभिशाप नहीं वरदान समझने की अपील कर सरकारी मदद का […]

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नक्सलबाड़ी: सरकारी घोषणाओं के बावजूद एक विकलांग बेटी के पिता को उसकी बच्ची की देखरेख के लिए सरकारी मदद नहीं मिल रही है. यह सवाल नक्सलबाड़ी विधानसभा क्षेत्र के स्टेशन रोड निवासी सुभाष साह का सरकार के उन नेताओं से है, जो विकलांगता को एक अभिशाप नहीं वरदान समझने की अपील कर सरकारी मदद का आश्वासन देते फिरते हैं.

नक्सलबाड़ी इलाके के बस स्टैंड रोड में सुभाष साह एक छोटी-मोटी चाय की दुकान चलाते हैं. इसी से उनके परिवार का भरन-पोषण होता है. इस अंचल में रहनेवाले हिंदीभाषी परिवारों के प्रति अपनाये जानेवाले उदासीन रवैये को लेकर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहनेवाले सुभाष का कहना है 1980 से नक्सलबाड़ी में बस गया हूं.

विवाह के बाद 2007 में बेटी सबिता साह ने जन्म लिया. जन्म से ही वह विकलांग है. सबिता के जन्म के साथ ही उसने उसकी विकलांगता का सर्टिफिकेट बनवाने के लिए सरकारी दफ्तरों का चक्कर लगाना शुरू कर दिया. दो वर्षों बाद बेटी के विकलांग होने का सर्टिफिकेट उन्हें मिला. अब सर्टिफिकेट हासिल करने के बाद मदद के तौर पर सरकार से मिलनेवाले विकलांग भत्ता के लिए उन्होंने कोशिश शुरू की.
वर्ष 2009 से लेकर 2016 तक सात वर्षों में नक्सलबाड़ी में होनेवाले सभी चुनाव में उम्मीदवार वोट हासिल करने के लिए उनसे तीन बार भत्ता पाने का आवेदन करवा चुके हैं, लेकिन उनकी बेटी को विकलांगता भत्ता अब तक नहीं मिला. सुभाष का कहना है कि एक परिवार का कोई सदस्य विकलांग हो तो काफी मुश्किलें आती हैं. मदद मिलने पर मुश्किलें कुछ हद तक कम होती हैं.
एक चाय की दुकान चला कर सात सदस्यों को पालना काफी मुश्किल काम है. नक्सलबाड़ी अंचल के लिए वह ऐसा उम्मीदवार चाहते हैं, जो हिंदीभाषी परिवार की समस्याओं को समझे. वोट के लिए उन्हें झूठे आश्वासन देकर ठगने के बजाय उनकी परेशानियों को दूर कर उनकी मदद करे.
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