हिंदी को लोकप्रिय बनाने में मीडिया व फिल्मों का महत्वपूर्ण योगदान
Updated at : 01 Oct 2019 2:18 AM (IST)
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सिलीगुड़ी : हर साल 14 सितंबर को पूरे देश के साथ विदेशों में भी हिंदी दिवस मनाया जाता है. इस साल भी पूरे तामझाम और विभिन्न साहित्यिक गोष्ठियों के माध्यम से हिंदी दिवस का आयोजन किया गया. इन आयोजनों में यह विषय चर्चा में आया कि आखिर क्या वजह है कि आज भी देश की […]
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सिलीगुड़ी : हर साल 14 सितंबर को पूरे देश के साथ विदेशों में भी हिंदी दिवस मनाया जाता है. इस साल भी पूरे तामझाम और विभिन्न साहित्यिक गोष्ठियों के माध्यम से हिंदी दिवस का आयोजन किया गया. इन आयोजनों में यह विषय चर्चा में आया कि आखिर क्या वजह है कि आज भी देश की राजभाषा बनाये जाने के करीब 70 साल बाद हिंदी को वह मुकाम नहीं मिल पाया जो उसे मिलना चाहिये था.
आज भी सरकारी कामकाज की भाषा हिंदी नहीं, बल्कि अंग्रेजी है. जबकि तत्कालीन सरकार की सोच थी कि प्रशासन को आमजनों से जोड़ने के लिए हिंदी और साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने का माध्यम बन जाना चाहिये था. इन मुद्दों पर प्रभात खबर ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल सम्मान से सम्मानित शैलेंद्र चौहान से बातचीत की.
उन्होंने कहा कि सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में हिंदी को अब तक वो मुकाम नहीं मिल पाया है, जो मिलना चाहिए. उनसे यह पूछे जाने पर कि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब यह कहा कि हिंदी में वह सामर्थ्य है कि वह भारत को एक सूत्र में जोड़ सकती है, के जवाब में शैलेंद्र चौहान ने कहा कि हिंदी को गैर हिंदी भाषी क्षेत्र के लोग स्वाभाविक तौर पर ही स्वीकार कर रहे हैं. लेकिन उन्हें जब भी ऐसा लगता है कि हिंदी उन पर थोपी जा रही है तो वे हिंदी के विरोध में उतर आते हैं. हालांकि सच्चाई यह भी है कि हिंदी को आगे नहीं बढ़ने देने में खुद हिंदी भाषी क्षेत्र के नेता और प्रशासनिक अधिकारी ही जिम्मेदार हैं. जो सारा पत्राचार अंग्रेजी में करते हैं.
शैलेंद्र चौहान ने कहा कि राजनेताओं ने अपने अधिकारियों पर जवाबदेही सौंपकर छुट्टी पा ली है. उन्होंने कहा कि राजनेताओं की सोच यह है कि हिंदी अपने आप प्रतिष्ठित हो जायेगी, यही सोच इसके विकास में सबसे बड़ी बाधा है. उन्होंने कहा कि आंचलिक बोलियों के साथ तालमेल पर जोर नहीं दिया गया, वरना हिंदी और अधिक समृद्ध हो सकती थी. हिंदी को आंचलिक बोलियों से अलग कर इसका अहित ही किया गया है. दूसरी बाधा है हिंदी में क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग.
एक तरह से क्लिष्ट शब्दों के प्रति कुछ विद्वानों का व्यामोह है जो उचित नहीं है. इसी तरह उर्दू को विदेशी भाषा बताकर उसे हिंदी से दूर कर दिया गया. एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि हिंदी को लोकप्रिय बनाने में हिंदी फिल्मों से अधिक देश के स्वतंत्रता आंदोलन का योगदान है. इसमें हमारी सेना और खेल की भी महत्वपूर्ण भूमिका है. आगे चलकर मीडिया, दूरदर्शन और अन्य टेलिविजन चैनलों ने भी हिंदी के प्रसार में महत्वपूर्ण रोल अदा दिया. हिंदी के राजभाषा नहीं बनने के पीछे हमारे देश का नव औपनिवेशिक ढांचा है जिसे बदलने में राजनैतिक नेतृत्व ने कभी दिलचस्पी नहीं दिखायी.
शिक्षा का व्यवसायीकरण भी हिंदी के पिछड़ने के पीछे एक मुख्य वजह रही. इसलिये सरकारी स्कूलों और कॉलेजों पर सरकार को अधिक ध्यान देने की जरूरत है. चूंकि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में हिंदी ज्यादातर उपेक्षित ही रह जाती है. हिंदी में ज्ञान-विज्ञान की पुस्तकों का भारी अभाव है. ऐसे में हिंदी में पठन-पाठन की कठिनाई होती है. विद्यार्थियों को अंग्रेजी की पुस्तकों पर ही निर्भर करना पड़ता है. उनके सामने विकल्प नहीं है. उन्होंने यह माना कि हिंदी रोजगार की भाषा बन रही है. लेकिन उसे अधिक व्यापक बनाने के लिये उसे आधुनिक प्रौद्योगिकी की भाषा भी बनाया जाना चाहिये.
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