प्रेमचंद जहां ठहरे, वहीं से आगे बढ़ना है : आरपी सिंह
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Aug 2019 5:47 AM
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सिलीगुड़ी : ‘आपका तिस्ता हिमालय’ पत्रिका की ओर से संपादक डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में प्रेमचंद जयंती के उपलक्ष्य में तेरापंथ भवन में ‘प्रेमचंद और आज का भारत’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. अपने संबोधन में डॉ सिंह ने कहा हिंदी साहित्य में प्रेमचंद ऐसे पहले साहित्यकार हैं, जो कोरी कल्पना […]
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सिलीगुड़ी : ‘आपका तिस्ता हिमालय’ पत्रिका की ओर से संपादक डॉ राजेन्द्र प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में प्रेमचंद जयंती के उपलक्ष्य में तेरापंथ भवन में ‘प्रेमचंद और आज का भारत’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया. अपने संबोधन में डॉ सिंह ने कहा हिंदी साहित्य में प्रेमचंद ऐसे पहले साहित्यकार हैं, जो कोरी कल्पना की भावभूमि से कथा साहित्य को मुक्त कर यथार्थ के ठोस धरातल पर लाये.
उन्होंने अपने साहित्य में मानव जीवन के जो जीवंत चित्र उकेरे हैं, वह अन्यत्र दुर्लभ है. हिंदी साहित्य में उन्होंने यथार्थ की जिस धारा को विकसित किया, उसने हिंदी कथा साहित्य के लिए संजीवनी का काम किया. प्रेमचंद भारतीय किसानों की व्यथा-कथा के अनोखे चित्रकार हैं.
डॉ सिंह ने कहा कि आज धार्मिक उन्माद और कट्टरता का जमाना है और संपूर्ण देश व समाज को इससे जूझना पड़ रहा है. प्रेमचंद के साहित्य में मानवतावाद का हम चरम विकास पाते हैं. प्रेमचंद जहां ठहर गये हैं, हमें अपनी यात्रा वहीं से शुरू करनी होगी. तभी हम सर्वहारा साहित्य के सृजन कार्य को आगे बढ़ा सकते हैं.
इससे पूर्व संगोष्ठी की शुरुआत करते हुए सिलीगुड़ी महाविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर अजय कुमार साव ने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आदर्श से यथार्थ की ओर प्रस्थान रहा. लेकिन प्रेमचंद की प्रासंगिकता पर गर्व करना ‘कोढ़ पालने’ जैसा है. यानी, जो कटु यथार्थ उस समय था वह आज भी बदला नहीं है.
डॉक्टर ओम प्रकाश पांडेय ने कहां कि जिन कारणों से आज भी हम प्रेमचंद के सपनों के भारत से दूर हैं, उसमें छद्म राष्ट्रीयता, सांप्रदायिकता, कारपोरेट जगत, और सबसे आगे भटके हुए साहित्यकार की रचनाधर्मिता का व्यवसायीकरण है. डॉ भीखी प्रसाद वीरेंद्र ने कहा कि मोहक विचारों से मुक्ति का प्रयास आज कम है.
साहित्यकार कालिका प्रसाद सिंह ने कहा कि वर्तमान समाज में व्याप्त दोष राजनीतिक पतनशीलता के कारण है. देवेंद्र नाथ शुक्ल ने कहा कि प्रेमचंद ने जिस दृष्टि से रचना की, उसी दृष्टि से आज के भारत को नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि उनकी युगीन सीमा रही.
संगोष्ठी में करण सिंह जैन, बबीता अग्रवाल अग्रवाल, डॉक्टर वंदना गुप्ता ने भी अपने विचार रखे. कवयित्री मनीषा गुप्ता ‘अपूर्वा’, मधु चौधरी, राजीव कुमार तिवारी, प्रियंका भगत, काजल दास, दीपनारायण शाह, नेहा शाह के प्रश्नों ने संगोष्ठी को विचारोत्तेजक बनाया.
छात्रा स्नेहा सिंह ने प्रेमचंद के व्यक्तित्व और कृतित्व पर काव्य प्रस्तुति दी. इस अवसर पर डॉ मुन्नालाल प्रसाद, प्रो ब्रजेश कुमार चौधरी, शिक्षक रामचंद्र गुप्ता, रंजू सिंह एवं सिलीगुड़ी कॉलेज एवं बागडोगरा कॉलेज के विद्यार्थी उपस्थित रहे. शिक्षक दीपू शर्मा ने संगोष्ठी का कुशल संचालन किया.
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