इस बार काफी कम संख्या में सिलीगुड़ी आये ढाकिये

Updated at : 14 Oct 2018 9:07 AM (IST)
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इस बार काफी कम संख्या में सिलीगुड़ी आये ढाकिये

सिलीगुड़ी : पंचमी से विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में देवी दुर्गा की आराधना शुरु हो जायेगी. अगले पांच छह दिनों तक बंगाल के साथ ही शहर सिलीगुड़ी के लोग माता के स्वागत में जुट जायेंगे. लेकिन आज के इस बदलते युग के साथ भी ढाक का महत्व कम नहीं हुआ है. आज भी मालदा, कालियागंज […]

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सिलीगुड़ी : पंचमी से विभिन्न दुर्गा पूजा पंडालों में देवी दुर्गा की आराधना शुरु हो जायेगी. अगले पांच छह दिनों तक बंगाल के साथ ही शहर सिलीगुड़ी के लोग माता के स्वागत में जुट जायेंगे. लेकिन आज के इस बदलते युग के साथ भी ढाक का महत्व कम नहीं हुआ है.
आज भी मालदा, कालियागंज जैसे इलाकों से सैकड़ों की तादाद में ढाक बजाने वाले पूजा के दौरान सिलीगुड़ी आते हैं.अभी इन ढाकियों का बसेरा सिलीगुड़ी टाउन स्टेशन है. वहीं से विभिन्न पूजा आयोजक कमेटी उन्हे किराये पर ले जाते है. जहां दशमी के विसर्जन तक ये ढाकी देवी दुर्गा के आगे ढाक बजाते हैं. लेकिन धीरे-धीरे कर यह कला भी लुप्त होने के कगार पर है.
लोग अब इस परंपरा को छोड़ कर कोई और काम करने लगे हैं या सरकार के विभिन्न जनहित योजनाओं का लाभ ले रहे हैं. इस परंपरा के लुप्त होने का एक और कारण नयी पीढ़ी को बताया गया है. युवा पीढ़ी अब पढ़ लिखकर कुछ बड़ा करना चाहती है. जिसके चलते ढाकियों के माथे पर चिंता की लकीरें देखी जा रही है. यही कारण है कि पहले के मुकाबले इस साल काफी कम संख्या में ढ़ाकिये आये हैं.
इस विषय पर मालदा के दक्षिण चंडीपुर बाली टोला से आये आलोक रविदास,दुलाल रविदास व अन्य ढाक बजाने वालों ने बताया कि वे पिछले 30-40 वर्षों से इस पेशे से जुड़े हुए है. उन्होंने दुर्गा पूजा को बंगाल का सबसे बड़ा त्योहार कहा जाता है.
इस दिन सभी लोग अपने परिवार वालों के साथ मिलकर माता की आराधना करते है. लेकिन एकमात्र ढाक बजाने वाले लोग ही ऐसे हैं, जो अपने घर से कई सौ किलोमीटर दूर पैसा कमाने की आश में सिलीगुड़ी आते हैं. जिससे कि जब वे घर लौटें तो उनके परिवार वालों को भरपेट दो वक्त की रोटी दे सकें. श्री दास का कहना है कि समाज में कमजोर होने के चलते उन्हें हेयदृष्टि से देखा जाता है.
उन्होंने बताया कि सरकारी योजनाओं का लाभ भी उन्हें ठीक से नहीं मिल रही है. जिसके चलते परिवार का भरन पोषण करने में उन्हें दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. एक अन्य ढ़ाकी विक्रम रविदास ने बताया कि वह अपनी पढ़ाई पूरी कर सरकारी अफसर बनना चाहता है. युवा पीढ़ी का ध्यान इस कला की ओर नहीं है.
अब वे ही कुछ गिने चुने ढाक बजाने वाले बच गये हैं. इस काम में ज्यादा लाभ नहीं होने के चलते युवा इस पेशे में कोई रुची नहीं दिखा रहे. उन्होंने ढाक बजाने की कला को जिंदा रखने के लिए राज्य सरकार से सहयोग की अपील की है. उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठाती है तो हो सकता है आने वाले वर्षों में लोगों को दुर्गा पूजा के मौके पर ढाक तिना तिन… नहीं सुनने को मिले.
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