गुरु नानक देव की यादों से भी जुड़ा है गुरु दोंगमार लेक

Published at :07 Apr 2018 5:57 AM (IST)
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गुरु नानक देव की यादों से भी जुड़ा है गुरु दोंगमार लेक

बौद्धों के लिए भी है परम पावन झील सिक्किम और भूटान के लोगों की जुड़ी है आस्था हाइकोर्ट में जारी है मुकदमा,सुनवाई स्थगित अदालत से बाहर समझौते की कोशिश नाकाम मनोरंजन पांडेय सिलीगुड़ी : सिक्किम के लाचेन के निकट गुरु दोंगमार झील जाने पर इन दिनों सिख पर्यटकों पर राज्य सरकार ने अघोषित रोक लगा […]

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बौद्धों के लिए भी है परम पावन झील

सिक्किम और भूटान के लोगों की जुड़ी है आस्था

हाइकोर्ट में जारी है मुकदमा,सुनवाई स्थगित

अदालत से बाहर समझौते की कोशिश नाकाम

मनोरंजन पांडेय

सिलीगुड़ी : सिक्किम के लाचेन के निकट गुरु दोंगमार झील जाने पर इन दिनों सिख पर्यटकों पर राज्य सरकार ने अघोषित रोक लगा रखी है. हालांकि आधिकारिक तौर पर किसी तरह का प्रतिबंध सिखों के जाने पर नहीं है. उल्लेखनीय है कि लाचेन स्थित गुरु दोंगमार लेक को सिख समुदाय के लोग भी अपने आदि गुरु नानक देव की स्मृति को लेकर पवित्र मानते हैं.

सिखों की मान्यता है कि गुरु नानकदेव 15 वीं सदी में तिब्बत से लौटने के क्रम में गुरु दोंगमार लेक गये थे. उसी को दृष्टिगत रखते हुए लाचेन सीमा पर तैनात भारतीय सेना के सिख रेजिमेंट ने 17,800 फीट की ऊंचाई पर स्थित गुरु दोंगमार लेक के करीब एक गुरुद्वारे का निर्माण कराया था. लेकिन इस संबंध में विवाद गहराने के बाद सेना ने 6 जुलाई 2001 को गुरुद्वारे को लाचेन मठ को सौंप दिया.

दरअसल, सिक्किम सरकार ने इस संबंध में एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी का गठन किया था. कमेटी तादोंग स्थित नामग्याल इंस्टीच्यूट ऑफ टिबेटोलॉजी ने दस्तावेज के जरिये इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि सिखों के दावे के पीछे कोई ठोस आधार नहीं है.

गुरु दोंगमार लेक दरअसल, तिब्बत में बौद्ध धर्म के संस्थापक गुरु पद्मसंभवा जिन्हें भूटान और सिक्किम में आदर से गुरु रिमपोछे कहा जाता है ने लाचेन लेक को अपने स्पर्श से पवित्र कर उसके पानी को जाड़े में भी पीने योग्य बनाया था. उसके बाद से ही यह लेक बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा पवित्र माना जाने लगा. गौरतलब है कि सिक्किम राज्य को भारतीय संविधान में 371एफ के तहत विशेष दर्जा उसी तरह प्राप्त है जैसा जम्मू-कश्मीर को मिला हुआ है. जानकारों का मानना है कि इसी वजह से राज्य सरकार ने मसले की संवेदनशीलता के मद्देनजर लाचेन जाने वाले सिखों पर अघोषित रोक लगा रखी है. हालांकि यह रोक कहां तक न्यायसंगत है यह कहना मुश्किल है.

इस मामले में शहर के एक व्यवसायी और मुकदमे से जुड़े व्यक्ति ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि बीते 30 मार्च को हाई कोर्ट में मुकदमे की सुनवाई की तारीख थी. लेकिन गुड फ्राइडे के चलते सुनवाई स्थगित कर दी गयी. उन्होंने बताया कि प्रशासन उत्तर सिक्किम के चुंगथांग तक पर्यटकों को जाने दे रही है. लेकिन गुरु दोंगमार लेक तक जाने पर रोक बनी हुई है. लाचेन स्थित गुरुद्वारे से गुरुग्रंथ साहिब सहित अन्य सामान हटा दिये गये हैं.

नई दिल्ली में बीते दिसंबर में सिक्किम के सांसद के साथ बैठक हुई थी. लेकिन सिक्किम के पक्षकार ने कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दिखायी. हालांकि हम लोग चाहते हैं कि इस संवेदनशील मसले को लेकर अदालत के बाहर कोई समझौता हो जाये तो यह दोनों ही पक्षों के लिये बेहतर होगा.

इस बीच शहर के सिख समुदाय के लोगों के अलावा टूर ऑपरेटरों में भी इस घटना को लेकर नाराजगी है. लाचेन पहुंचने वाले सिख पर्यटकों को रोक दिया जा रहा है. जबकि किसी भी व्यक्ति को देश के अंदर कहीं भी अवस्थित तीर्थ स्थल तक जाने के लिये किसी को रोका जाना न्यायसंगत नहीं लगता.

बौद्ध, सिख व हिंदुओं की आस्था से जुड़ाव

उल्लेखनीय है कि गुरु दोंगमार लेक बौद्ध, सिख और हिंदुओं द्वारा समान रुप से पवित्र माना जाता है. गुरु पद्मसंभवा ने 8वीं सदी में सिक्किम का भ्रमण भूटान से आने के दौरान किया था. बताते हैं कि उस समय लेक का पानी पूरे साल जमा रहता था

मान्यता है कि गुरु पद्मसंभवा के स्पर्श से लेक का पानी पिघल गया. तब उन्होंने कहा था कि लेक का पानी पूरे साल पीने के लिये उपलब्ध रहेगा. तब से लेक को बौद्ध पवित्र मानने लगे हैं. इसी तरह की मान्यता गुरु नानकदेव से भी जुड़ी है.

कहते हैं जब गुरु नानकदेव लाचेन लेक पहुंचे तो उन्होंने अपनी छड़ी से झील के पानी का स्पर्श किया. उसके बाद ही लेक का पानी पिघल गया. उन्होंने भी कहा कि लेक का पानी पूरे साल पिया जा सकता है. उन्होंने यह भी कहा कि इस लेक का पानी पीने से शारीरिक ताकत बढ़ती है.

अधिकार को लेकर काफी दिनों से जारी है विवाद

गुरु दोंगमार लेक को लेकर विवाद तब शुरु हुआ जब भारतीय सेना के सिख रेजिमेंट ने 1997-98 में लेक के बगल में गुरुद्वारे का निर्माण कराया. उस सिक्किम के बौद्ध अनुयायियों ने इस निर्माण को अवैध और उनके धर्म में अनावश्क हस्तक्षेप बताया.

इसके बाद ही राज्य सरकार ने एक उच्च स्तरीय जांच कमेटी गठित की. गुरु दोंगमार झील को लेकर शुरु हुए विवाद के दौरान शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने तत्कालीन प्रतिरक्षा मंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए गुरुद्वारा को तोड़े जाने पर रोक लगवाने के लिये कदम उठाने का अनुरोध किया था. चूंकि यह लेक गुरु नानकदेव की स्मृतियों से जुड़ा है. जिससे सिख्ख समुदाय से जुड़े हुए लोगों की भावनाओं का आहत न किया जाए.

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