रायगंज : बाहिन जमींदार की दुर्गापूजा की यादें भर बाकी

Published at :20 Sep 2017 9:29 AM (IST)
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रायगंज : बाहिन जमींदार की दुर्गापूजा की यादें भर बाकी

रायगंज: जमींदार परिवार की हवेली के पीछे से बहनेवाली नागर नदी के किनारे कभी दुर्गा पूजा बड़े धूमधाम से मनायी जाती थी. हवेली के खंडहर आज भी उस गौरव गाथा को बयान करते हैं. नागर नदी के घाट पर जमींदार परिवार का छोटा जहाज लंगर डालता था. लेकिन अब जमींदार परिवार के दुर्गा पूजा इतिहास […]

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रायगंज: जमींदार परिवार की हवेली के पीछे से बहनेवाली नागर नदी के किनारे कभी दुर्गा पूजा बड़े धूमधाम से मनायी जाती थी. हवेली के खंडहर आज भी उस गौरव गाथा को बयान करते हैं. नागर नदी के घाट पर जमींदार परिवार का छोटा जहाज लंगर डालता था. लेकिन अब जमींदार परिवार के दुर्गा पूजा इतिहास की यादें बन कर रह गयी हैं. अब स्थानीय ग्रामीण किसी तरह दुर्गा पूजा का आयोजन कर उन यादों को बचाये हुए हैं.
रायगंज शहर से करीब 14 किलोमीटर दूरी पर स्थित बाहिन जमींदार बाड़ी के अवशेष बचे हुए हैं. अब जमींदार परिवार का कोई भी सदस्य वहां नहीं रहता है. जीर्ण-शीर्ण जमींदार बाड़ी के निकट ही पुराना सिंहवाहिनी मंदिर है. हर साल की तरह इस बार भी वहां दुर्गा पूजा का आयोजन होता है. वैसे मंदिर के भीतर स्थापित सोने की मूर्ति बहुत पहले चोरी हो चुकी है. इसके बावजूद नियमित रूप से पूजा-अर्चना होती रहती है.
नागार नदी बिहार व बंगाल को करती हैं विभाजित
उल्लेखनीय है कि यहां की नागर नदी बिहार और बंगाल को विभाजित करती है. बिहार से भी काफी संख्या में श्रद्धालु इस दुर्गा पूजा को देखने आते हैं. स्थानीय निवासी और पूजा के प्रमुख आयोजक श्यामल चौधरी ने बताया कि इस बार हमलोग सादगी से पूजा का आयोजन कर रहे हैं. नागर का पानी घुस आने से काफी क्षति पहुंची है. ग्रामीणों का कहना है कि कभी इटाहार के चूड़ामणि राय चौधरी परिवार के सदस्य ने जमींदार बाड़ी का निर्माण कराया था. इसके बाद से ही दुर्गा पूजा का आयोजन शुरू हुआ.
हाथियों पर सवारी कर जमींदार परिवार के सदस्य इलाके का करते हैं भ्रमण : उस समय जमींदार बाड़ी के सामने बड़ा बागान में हाथी बांधे जाते थे. हाथी बांधने के लिए बने कंक्रीट के खंभे आज भी वहां हैं. वहां तकरीबन चार-पांच हाथी रहते थे. उन हाथियों पर सवारी कर जमींदार परिवार के सदस्य इलाके का भ्रमण करते. आज भी इस दुर्गा पूजा के दर्शन के लिए बिहार के बारसोई, गांजन, कादना गांव से काफी तादाद में दर्शनार्थी आते हैं. इसके लिए हर साल नागर नदी पर अस्थायी बांस का पुल बनता रहा है. लेकिन इस बार वह भी संभव नहीं हो सका.
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