गोरखालैंड आंदोलन :इतिहास के आइने में - 5>> टाडा कानून लागू होते ही 40 दिनों के लिए पहाड़ बंद

सिलीगुड़ी: दार्जिलिंग पार्वत्य क्षेत्र में गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन अपने चरम पर था. हालात की गंभीरता को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्री सरदार बूटा सिंह के बुलावे पर सुभाष घीसिंग 24 जून 1988 को नई दिल्ली गये और उन्होंने उनसे भेंट की. बूटा सिंह ने सुभाष घीसिंग से पहाड़ में जारी हिंसक […]
जीएनएलएफ सुप्रीमो के कड़े तेवर को देखते हुए गतिरोध टूटने लगा. आमंत्रण मिलने पर मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने 25 जून को सरदार बूटा सिंह से भेंट की. उल्लेखनीय है कि 20 जून से आहूत 13 दिवसीय बंद के दौरान सार्वजनिक संपत्ति की व्यापक क्षति हुई. आनुमानित 30 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ. तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के बीच हुई वार्तालाप में कई बिंदुओं पर सहमति बनी. उसके अनुसार सुभाष घीसिंग स्वतंत्र गोरखालैंड की मांग छोड़ेंगे और वह बंगाल के विभाजन पर जोर नहीं देंगे. इसके अलावा पहाड़ में अगर हिंसा रुकती है तो त्रिपक्षीय वार्ता बुलाई जा सकती है.
उस समय वरिष्ठ पत्रकार इंद्रजीत खुल्लर ने केंद्र सरकार और सुभाष घीसिंग के बीच मध्यस्थता की. जीएनएलएफ में समझौते के पक्ष में सर्वानुमति बनाने के लिये सुभाष घीसिंग को केंद्र सरकार ने विमान से बागडोगरा भेजा. वहां से उन्हें हेलीकॉप्टर से 27 जून को दार्जिलिंग भेजने की व्यवस्था की गई. सुभाष घीसिंग ने 29 जून को बंद वापस लेने की घोषणा की.
इस बीच दार्जिलिंग शहर से माकपा के दो काडरों के अपहरण किये जाने के विरोध में माकपा ने सिलीगुड़ी महकमा क्षेत्र में 12 घंटा बंद का आह्वान किया. उसके बाद जीएनएलएफ की ओर से फिर से आगजनी और पुलिस पर हमले की घटनाएं तेज हो गईं. बीच बीच में अपहरण की घटनाएं भी घटने लगीं. इस अराजकता पर काबू पाने के लिये राज्य सरकार ने पहाड़ में आतंकवाद व विध्वसंक गतिविधियां यानी टाडा एक्ट को लागू कर दिया. इसके जवाब में 10 फरवरी 1988 को सुभाष घीसिंग ने 40 दिनों के बंद की घोषणा कर दी. इस दौर में हालात काफी संगीन हो चुके थे. इस अवधि में पूरा पहाड़ केंद्रीय सुरक्षा बल के नियंत्रण में था. 20 मार्च 1988 को बंद समाप्त हुआ. सुभाष घीसिंग के आह्वान पर विदेशों में तैनात बहुत से गोरखा सैनिक नौकरी छोड़कर पहाड़ लौट आये.
इसी वर्ष जून के आखिर में आयोजित त्रिपक्षीय वार्ता के लिये सहमति बनी. बातचीत के लिये अनुकूल माहौल तैयार करने के लिये जीएनएलएफ ने एकपक्षीय रुप से हिंसक क्रियाकलाप बंद रखने का ऐलान किया. सुरक्षा बलों पर हमले बंद कर दिये गये. इसके प्रत्युत्तर में मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने जीएनएलएफ के कई काडरों को जेल से रिहा कर दिया. विशेष सुरक्षा प्रावधानों को वापस ले लिया. सीआरपीएफ की जगह पहाड़ की सुरक्षा का जिम्मा बीएसएफ को सौंप दिया गया. इसके बाद राजनैतिक गतिरोध को तोड़ते हुए 10 जुलाई को जीएनएलएफ में वार्तालाप के लिये सुभाष घीसिंग को अधिकृत करने वाला प्रस्ताव पारित किया गया. संगठन में स्वायत्तशासी दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल के गठन को लेकर सर्वसम्मति बनाते हुए प्रस्ताव लिया गया.
उसमें डुवार्स और सिलीगुड़ी संलग्न कुछ मौजा को भी हिल काउंसिल में सम्मिलित करने पर सहमति बनी. 25 जुलाई को नई दिल्ली में आयोजित त्रिपक्षीय वार्ता में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल यानी दागोपाप पर सहमति बनी. इसी के बाद 22 अगस्त 1988 को कलकत्ता के राजभवन में समझौते पर औपचारिक रुप से हस्ताक्षर किये गये. नई व्यवस्था के तहत डीजीएचसी को प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा, संस्कृति, स्वास्थ्य, कुटीर उद्योग, सिंचाई, कृषि, पर्यटन, व्यावसायिक शिक्षा, पीडब्लूडी, परिवहन, राष्ट्रीय व राज्य मार्ग को छोड़कर अन्य सभी सड़कों का निर्माण व देखरेख, पशुपालन, जलापूर्ति, मत्स्यपालन, भूमि व भवन संरक्षण, शवदाहगृह व कब्रिस्तान और पंचायत निकाय विभाग सुपुर्द किये गये. समझौते पर हस्ताक्षर होने के बाद अक्टूबर 1988 में हिल काउंसिल ने अपना कार्यभार संभाला. काउंसिल के प्रथम चेयरमैन बने जीएनएलएफ सुप्रीमो सुभाष घीसिंग.
इसके अलावा जो सबसे बड़ी कमयाबी सुभाष घीसिंग की रही वह थी गोरखा समुदाय को भारतीय नागरिकता की संवैधानिक मान्यता दिलाना. डीजीएचसी के लिये जो कानून संसद में पारित किया गया उसमें स्पष्ट तौर पर दार्जिलिंग जिले के पार्वत्य क्षेत्र में रहने वाले नेपाली भाषियों को गोरखा के रुप में भारतीय नागरिकता की पहचान मिली. यह कम उपलब्धि नहीं थी. लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि जिस विकास के बयार की उम्मीद लेकर जनता ने गोरखालैंड के नाम पर डीजीएचसी हासिल किया था वह आज भी उनसे कोसों दूर है. गोरखालैंड राज्य के नाम पर पूरा मामला सत्ता के भाग बंटवारे में ही सीमित होकर रह गई. डीजीएचसी के नाम पर जो सत्ता का सिंहासन हासिल हुआ उसमें धीरे धीरे घीसिंग इस कदर खो गये कि उन्हें गोरखा समुदाय के दुख-कष्ट का इल्म ही नहीं रहा.
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