केंद्र सरकार शीघ्र बुलाये त्रिपक्षीय बैठक : बारला
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :05 Sep 2017 8:29 AM (IST)
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सिलीगुड़ी. अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर पहाड़ पर जो आंदोलन चल रहा है, वह पहाड़ तक ही सीमित रहे तो अच्छा है. पहाड़ की अशांति अगर तराई डुआर्स में लाने की कोशिश की गयी, तो यहां के आदिवासी इसको किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे. जिस तरह से 2010-11 में तराई डुआर्स […]
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सिलीगुड़ी. अलग गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर पहाड़ पर जो आंदोलन चल रहा है, वह पहाड़ तक ही सीमित रहे तो अच्छा है. पहाड़ की अशांति अगर तराई डुआर्स में लाने की कोशिश की गयी, तो यहां के आदिवासी इसको किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे. जिस तरह से 2010-11 में तराई डुआर्स में गोजमुमो द्वारा अशांति की कोशिश का विरोध हुआ था, वैसे ही आगे भी गोजमुमो के किसी भी आंदोलन का तराई डुआर्स में विरोध किया जायेगा.
यह बातें आदिवासी नेता जॉन बारला ने कही. वह डुआर्स के लक्ष्मी चाय बागान स्थित अपने आवास पर हमारे संवाददाता से विशेष बातचीत कर रहे थे. श्री बारला ने कहा कि गोरखालैंड की मांग को लेकर पहाड़ पर आंदोलन से स्थिति काफी बिगड़ गयी है. वहां 80 दिनों से भी अधिक समय से बेमियादी बंद जारी है. राज्य सरकार अब तक इस समस्या का समाधान नहीं कर सकी है. दरअसल द्विपक्षीय बातचीत से इस समस्या का समाधान नहीं हो सकता. राज्य सरकार और गोजमुमो के बीच जो भी बातचीत हुई, उससे मामला सुलझने के बजाय उलझ गया है. गोरखालैंड की समस्या को लेकर केंद्र सरकार को तत्काल त्रिपक्षीय बैठक करनी चाहिए. उन्होंने इस मुद्दे को लेकर राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पर निशाना साधा.
आदिवासियों के लिए भी विकास बोर्ड बनायें सीएम
श्री बारला ने कहा कि ममता बनर्जी के फूट डालो और शासन करो की नीति से ही पहाड़ पर स्थिति इतनी गंभीर हुई है. इसके अलावा उन्होंने पहाड़ पर विभिन्न जातियों के लिए डेवलपमेंट बोर्ड बना कर तुष्टीकरण की राजनीति की. पहाड़ पर विभिन्न जातियों के लिए लगभग 15 विकास बोर्ड बनाये गये. दूसरी तरफ तराई डुआर्स के आदिवासियों के कल्याण के लिए राज्य की ममता सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया. आदिवासियों के लिए भी विकास बोर्ड मुख्यमंत्री को बनाना चाहिए. वर्ष 2007-08 में पहाड़ पर जब नये सिरे से गोरखालैंड आंदोलन की शुरूआत हुई, तभी से वह लोग इसका विरोध करते रहे हैं. तब भी गोजमुमो ने डुआर्स में अशांति फैलाने की कोशिश की थी. आदिवासियों ने इसका करारा जवाब दिया. लेकिन इसका कोई लाभ आदिवासियों को नहीं हुआ है. उलटे राज्य सरकार ने उनके तथा कई अन्य आदिवासी नेताओं के खिलाफ कई मुकदमे लाद दिये. वह लोग तभी से पूरे डुआर्स को 6 सिड्यूल में शामिल करने की मांग करते रहे हैं, लेकिन इसका भी कोई लाभ नहीं हुआ.
तराई डुआर्स हमार हके हमार रही का दिया नारा
श्री बारला ने एक बार फिर से ‘तराई डुआर्स हमार हके हमार रही’ का नारा दिया. श्री बारला ने कहा कि तराई डुआर्स आदिवासियों की जमीन है. लेकिन अब तक उन्हें जमीन का मालिकाना हक नहीं मिला है. इसलिए वह एक बार फिर से तराई डुआर्स की जमीन आदिवासियों की है और उन्हीं की रहेगी, का नारा दे रहे हैं. उन्होंने तत्कालीन वाममोर्चा सरकार को भी आदिवासियों के मसले को लेकर कटघरे में खड़ा किया. श्री बारला ने कहा कि तब न तो वाममोर्चा सरकार और अब ना ही तृणमूल सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए कुछ कर रही है. वह तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य तथा वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ आदिवासियों के कल्याण को लेकर कई बार बैठक कर चुके हैं, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं हुआ है.
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