जेलों की क्षमता नहीं बढ़ी, तो देंगे कैदियों को सामूहिक जमानत

संशोधनागारों के हालात पर हाइकोर्ट गरमाया, कड़े शब्दों में चेताया
कोलकाता. राज्य के संशोधनागारों में कैदियों की दयनीय स्थिति को लेकर कलकत्ता हाइकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. न्यायमूर्ति देबांग्शु बसाक की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने मंगलवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार जेलों की क्षमता नहीं बढ़ाती है, तो अदालत स्वतः संज्ञान लेते हुए सामूहिक रूप से कैदियों को जमानत दे देगी. खंडपीठ ने सवाल उठाया कि अदालत के पूर्व आदेशों के बावजूद क्या राज्य की जेलों की क्षमता में वास्तव में वृद्धि हुई है. इस पर राज्य सरकार के अधिवक्ता ने बताया कि बारुईपुर जेल में विस्तार किया गया है. इस पर न्यायाधीश ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि यह पाया गया कि किसी जेल की क्षमता 1,000 है और वहां उससे अधिक संख्या में कैदी बंद हैं, तो अदालत स्वतः संज्ञान लेते हुए कैदियों को सामूहिक जमानत दे देगी. अदालत ने टिप्पणी की कि राज्य की जेलों में मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन हो रहा है. इसके साथ ही खंडपीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के सभी जेलों की क्षमता और वहां बंद कैदियों की संख्या से संबंधित विस्तृत जानकारी अदालत में पेश करे. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पिछले चार से पांच वर्षों में राज्य की जेलों में 905 कैदियों की अस्वाभाविक मौतें हुई हैं, लेकिन अब तक इनमें से किसी भी मामले में एफआइआर दर्ज नहीं की गयी है. उन्होंने यह भी कहा कि वर्ष 2018 में हाइकोर्ट ने जेलों में 42 कैदियों की अस्वाभाविक मौत के मामलों में पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने का आदेश दिया था, लेकिन अब तक मुआवजा नहीं दिया गया है. याचिकाकर्ता पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि जेलों में कर्मचारियों की नियुक्ति से जुड़े अदालत के आदेशों को लागू नहीं किया गया है. राज्य में जेलों के लिए स्वीकृत मेडिकल ऑफिसर के 219 पदों में से 149 पद अब भी खाली हैं. इन सभी बिंदुओं पर गंभीरता दिखाते हुए हाइकोर्ट ने बुधवार तक राज्य सरकार से इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट तलब की है.
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