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बांगुर में सावित्री को मिला जीवन दान

– शिव कुमार राउत – कोलकाता : बांगुर इंस्टीटय़ूट ऑफ न्यूरोसाइंस में पहली बार डिजिटल सब्सट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) मशीन के जरिये एक मरीज की सफल सजर्री की गयी है. पूर्वी भारत में पहली बार सरकारी अस्पताल में डीएसए मशीन के जरिये इस तरह की सजर्री की गयी है. इस सफल सजर्री से मेडिकल के क्षेत्र […]

– शिव कुमार राउत

कोलकाता : बांगुर इंस्टीटय़ूट ऑफ न्यूरोसाइंस में पहली बार डिजिटल सब्सट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) मशीन के जरिये एक मरीज की सफल सजर्री की गयी है. पूर्वी भारत में पहली बार सरकारी अस्पताल में डीएसए मशीन के जरिये इस तरह की सजर्री की गयी है.

इस सफल सजर्री से मेडिकल के क्षेत्र में बांगुर का ग्राफ काफी ऊपर उठेगा. मालदा की रहनेवाली सावित्री सरकार (55) लंबे समय से सिर दर्द को लेकर परेशान थी. इस बीमारी की वजह से कई बार वह बेहोश भी हो जाती थी. इलाज के लिए वह विभिन्न स्थानीय अस्पतालों चिकित्सकों के पास गयी, लेकिन उसके मर्ज की दवा किसी चिकित्सक के पास नहीं थी.

अंत में सावित्री इलाज के लिए महानगर स्थित बांगुर इंस्टीटय़ूट ऑफ न्यूरोसाइंस पहुंची. यहां पहुंचने पर अस्पताल के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ सुमित देव की देखरेख में सावित्री का इलाज शुरू हुआ.

डॉ देव ने बताया कि मरीज लंबे समय से सिर दर्द से परेशान थी. यहां पहुंचने के बाद मरीज का सीटी स्कैन किया गया. इसके बाद मरीज की बीमारी पकड़ में आयी. सावित्री ब्रेन ऐंयरिजम नामक बीमारी से पीड़ित थी.

क्या है ब्रेन ऐंयरिजम

डॉ देव ने बताया कि इस बीमारी की वजह से मस्तिष्क के भीतर ब्लीडिंग होती रहती है. इससे रक्त जमतेजमते बैलून की तरह फूल जाता है. इसके फटने से मरीज की मौत हो सकती है.

कैसे संभव हुआ इलाज

इस बीमारी का इलाज काफी जटिल माना जाता है. चिकित्सक की एक छोटी सी चूक मरीज के लिए मौत का कारण बन सकती थी. डॉ देव ने बताया कि मरीज उच्च रक्तचाप मधुमेह से पीड़ित थी. इस वजह से किसी बड़ी सजर्री, जिसमें रक्त का काफी क्षय हो, इसके लिए मरीज का शरीर पूरी तरह तैयार नहीं था.

इसे देखते हुए मरीज के इलाज के लिए डिजिटल सब्सट्रैक्शन एंजियोग्राफी (डीएसए) कैथ लैब में ले जाया गया. वहां डॉ देव ने यह तय किया वह मरीज का इलाज इंटरवेंशनल रेडियोथेरपी टेक्निक के माध्यम से करेंगे. इलाज के लिए मरीज के कमर के शिरे से एक तार को उसके मस्तिष्क तक ले जाया गया. इसके बाद इस तार की मदद से ब्रेन में बने रक्त बैलून को सुरक्षित उसके स्थान पर रखने की व्यवस्था कर दी गयी, ताकि रक्त बैलून फटे और वह आपने स्थान पर सुरक्षित रहे. इस सजर्री के दौरान मरीज के किसी अंग में चीरफाड़ करने की जरूर नहीं पड़ी.

डॉ देव ने बताया कि सावित्री सही समय पर अस्पताल पहुंची थी.इस सजर्री के लिए उसके परिजनों को लगभग 1.10 लाख रुपये खर्च करना पड़ा. इस सजर्री को किसी निजी अस्पताल में करवाने पर मरीज के परिजनों को लगभग पांच गुणा अधिक खर्च करना पड़ता. डॉ देव ने बताया कि पूर्वी भारत के किसी सरकारी अस्पताल में पहली बार उक्त मशीन के माध्यम से इस प्रकार की सजर्री की गयी है. इसके सफल रहने पर अस्पताल के अन्य चिकित्सकों का आत्मविश्वास बढ़ा है.

Prabhat Khabar Digital Desk
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