कोलकाता : भजन से प्रेम और भगवान दोनों मिल जाते हैं : पं. गोपाल व्यास
Updated at : 08 Dec 2018 6:34 AM (IST)
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कोलकाता : बिन्नानी में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के अद्भुत आयोजन के षष्टम् सोपान में शुक्रवार को कथा वाचक पं. श्री गोपालजी व्यास ने उपस्थित भक्तों को महारास के आंनद का अनुभव कराया. महाराजश्री ने कहा भगवान श्रीकृष्ण के महारास में शामिल होने का लोभ संवरण देवी-देवता भी नहीं कर पाते. क्योंकि इस […]
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कोलकाता : बिन्नानी में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ के अद्भुत आयोजन के षष्टम् सोपान में शुक्रवार को कथा वाचक पं. श्री गोपालजी व्यास ने उपस्थित भक्तों को महारास के आंनद का अनुभव कराया. महाराजश्री ने कहा भगवान श्रीकृष्ण के महारास में शामिल होने का लोभ संवरण देवी-देवता भी नहीं कर पाते. क्योंकि इस महारास में भगवान का असीम प्रेम और आनंद बरसता प्रतीत होता है.
प्रसंग आता भी है कि भगवान श्री कृष्ण के महारास के बारे में सुन भगवान शंकर ने भी महारास में शामिल होने की इच्छा माता पार्वती से जताई. भगवान शंकर ने पार्वती मैया से कहा- देवी मैं भी आपके साथ श्रीकृष्ण के महारास में चलूंगा. इस पर माता बोली- नाथ आप महारास में शामिल नहीं हो सकते, क्योंकि श्रीकृष्ण के महारास में सिर्फ स्त्रियां ही शामिल होती है, पुरुष नहीं.
लेकिन.. भगवान भोलेनाथ ने भी जिद पकड़ ली. माता ने लाख समझाया पर शिवजी नहीं माने. आखिरकार मां पार्वती ने शिव को महारास में ले चलने के लिए एक उपाय ढूंढ़ निकाला. वह बोलीं- श्री कृष्ण के महारास में सिर्फ गोपियां ही शामिल होती हैं, इसलिए अगर आप महारास में चलना चाहते हैं तो गोपी बनकर चलें. माता पार्वती की बात मानते हुए भगवान शिव ने साड़ी पहन ली और जूड़ा लगाकर महारास में शामिल होने के लिए चल पड़े.
भगवान शंकर का नाम तभी से गोपेश्वर भी पड़ा. महारास के इस कथा प्रसंग अनुसार एक दिन वो भोले भंडारे, बनकर के बृज नारी गोकुल में आ गये… भजन को सुनाकर पं. श्री गोपालजी व्यास ने उपस्थित सभी भक्तों को भाव-विभोर कर दिया. व्यासजी बोले- महारास में शामिल होने वाली गोपियों का तात्पर्य यहां भाव से है.
गोपी का अर्थ प्रेम और समर्पण है. वासना का यहां कोई स्थान नहीं. जब हम मन में किसी प्रकार की कामना रख कर भगवान को पाना चाहते हैं तो वे हमें मिलते नहीं, परंतु यदि हम उनसे सच्चा प्रेम करने लगते हैं तो वे हमें सहज मिल जाते हैं. हम यह भी कह सकते हैं कि जो निरपेक्ष भाव से भगवान को भजते हैं या भजन करते हैं, वे प्रेम और भगवान दोनों को पा लेते हैं.
भक्ति का नाम ही समर्पण है. जब हृदय में समर्पण के भाव आ जायेंगे तो भगवान भी इस हृदय में खुद आकर विराजमान हो जायेंगे. व्यासजी ने कहा कि निष्काम महारास का आनंद कल्पना से भी परे है. इस महारास में भगवान में एकीकार हो जाने का मूल भाव है.
महाराजश्री ने कहा- कथायें अमृत समान हैं, जो इन कथाओं का मनन कर लेता है वो अमृत के समापन भगवान को पा जाता है. कथाओं का श्रवण-मनन हृदय से करने वाले व्यक्ति का चित्त धीरे-धीरे परमात्मा की तरफ मुड़ने लगता है.
महाराजश्री ने कहा कि इस रास कथा का आनंद तब तक हमारे हृदय तक नहीं पहुंचेगा जब तक हम गोपी भाव से इसे नहीं सुनेंगे. रुक्मिणी विवाह के प्रसंग का सुंदर वर्णन करते हुए महाराजश्री ने कहा- भगवान को पा जाने वाले विरले होते हैं. भगवान को पाने के लिए हृदय में सबसे पहले समर्पण और प्रेम का बीज अंकुरित करना होता है.
इसलिए ठाकुरजी को अगर पाना है तो मन में उनके प्रति सच्चे प्रेम को सबसे पहले जागृत करो. आज की कथा में मुख्य यजमान संजय अग्रवाल ने व्यासपीठ के पूजन के साथ आरती का सौभाग्य पाया.
पं. राजीव किराडू, राजेश व्यास, राहुल थानवी, सिद्धार्थ किराडू, श्याम ओझा, गोपू किराडू, पंकज थानवी, अरविंद किराडू, नंदकिशोर किराडू, पुरुषोत्तम व्यास व अन्य आयोजन की व्यवस्था में सक्रिय रहे. आयोजन के मुख्य प्रेेरणा स्त्रोत पं. श्री शिव कुमारजी व्यास ने बताया कि शनिवार की कथा में सुदामा चरित्र और कृष्ण उद्धव संवाद मुख्य होगा.
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