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नोबेल का सपना देख रहे IVF के ‘जनक’ डॉ सुभाष मुखोपाध्याय ने क्यों की आत्महत्या, सुसाइड नोट में लिखी ये बात

Updated at : 07 May 2018 9:13 AM (IST)
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नोबेल का सपना देख रहे IVF के ‘जनक’ डॉ सुभाष मुखोपाध्याय ने क्यों की आत्महत्या, सुसाइड नोट में लिखी ये बात

अजय विद्यार्थी कोलकाता : अाइवीएफ तकनीक से भारत को पहले टेस्ट ट्यूब का उपहार देनेवाले भारतीय वैज्ञानिक व चिकित्सक डॉ सुभाष मुखोपाध्याय अपने ही शहर (कोलकाता) में गुमनाम हैं. डॉक्टरों और मेडिकल के छात्रों को छोड़ कर महानगर के बहुत कम लोगों को डॉ सुभाष के योगदान याद हैं. यहां तक कि जिस घर में […]

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अजय विद्यार्थी
कोलकाता : अाइवीएफ तकनीक से भारत को पहले टेस्ट ट्यूब का उपहार देनेवाले भारतीय वैज्ञानिक व चिकित्सक डॉ सुभाष मुखोपाध्याय अपने ही शहर (कोलकाता) में गुमनाम हैं. डॉक्टरों और मेडिकल के छात्रों को छोड़ कर महानगर के बहुत कम लोगों को डॉ सुभाष के योगदान याद हैं.
यहां तक कि जिस घर में वह रहते थे, उसके आसपास के लोगों को भी पता नहीं है कि उस घर में रहनेवाले डॉक्टर सुभाष कितनी बड़ी शख्सियत थे. उनका पैतृक आवास बेनाम है. बंगाल की धरती को कर्मभूमि बना कर देश को पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का उपहार देनेवाले डॉ सुभाष अपने ही लोगों के बीच बेगाना हैं.
हैरत तो तब हुई जब हमारे संवाददाता उनका पैतृक आवास का पता ढूंढ़ते-ढूंढ़ते इंटाली स्थित कोलकाता नगर निगम के गैरेज के पास स्थित गली 79/17 एजेसी बोस रोड, कोलकाता पहुंचे, उस गली में न तो कोलकाता नगर निगम ने और न ही बंगाल सरकार ने कोई ऐसा प्रतीक चिह्न लगाया है, जिससे यह पता चले कि इस गली में डॉ सुभाष का पैतृक आवास है.
स्थानीय लोगों को भी डॉ सुभाष के पैतृक आवास के बारे में जानकारी नहीं है. मध्य कोलकाता के वार्ड नंबर 14 नंबर में यह मकान स्थित है. मुख्य सड़क पर स्थित आवास की स्थिति लगभग बदहाल है. इस मकान में डॉ सुभाष के छोटे भाई दिवंगत प्रभाष मुखर्जी की पत्नी रेवा मुखर्जी अपने परिवार के साथ रहती हैं. मां को अंतिम समय तक नहीं थी.
डॉ सुभाष के निधन की जानकारी रेवा मुखर्जी बताती हैं कि उनकी सास यानी डॉ सुभाष की मां ज्योत्सना मुखर्जी इसी घर में रहती थीं तथा डॉ सुभाष के निधन के बाद छह माह तक जीवित रहीं. डॉ सुभाष उनके बड़े पुत्र थे. वह अपने बड़े बेटे से काफी प्यार करती थीं. परिवार के सदस्यों ने उन्हें डॉ सुभाष के निधन की जानकारी नही‍ं दी थी. रेवा मुखर्जी बताती हैं : मां निधन के पहले तक कहा करती थीं : जानो एमन लागचे, बुके भीतरे पाथर चापा आछे.
वह कहती हैं : इतिहास ने डॉ सुभाष के साथ न्याय नहीं किया है, लेकिन वह चाहती हैं कि सरकार व निगम डॉ सुभाष की स्मृतियों को जीवित रखने के लिए और उनके योगदान को सम्मान देने के लिए कोई कदम उठाये.
डॉ सुभाष को आज की नयी पीढ़ी भी जाने और उनसे प्रेरणा ले. इसलिए वह कोलकाता निगम से अपील करती हैं कि 79/17 एजेसी बोस गली का नाम डॉ सुभाष के नाम से किया जायेगा या उनके नाम से कोई स्मारक बनायी जाये. झारखंड के हजारीबाग में उनका जन्म हुआ था. झारखंड सरकार उनके जन्म स्थान को उचित सम्मान दे.
किसी ने अभी तक नहीं ली है कोई खोज-खबर : रेवा मुखर्जी
जिस प्रशासन ने डॉ सुभाष के योगदान को याद नहीं रखा था. उन्हें योग्य सम्मान नहीं दिया था, वो भला उनके पैतृक आवास की खोज-खबर क्या लेता. डॉ सुभाष के भाई की पत्नी रेवा मुखर्जी हैरत के साथ बताती हैं : पहली बार कोई मीडियाकर्मी हमारे घर आये हैं. देखिये, इसी घर की तीसरी मंजिल में भाई साहब (डॉ सुभाष मुखोपाध्याय) रहते थे. मुझे आज भी याद है जब मैं ब्याह कर आयी थी, तब उनका पांव छूने उनके कमरे में गयी थी, तो देखा, भाई साहब तपती गर्मी में बनियान और लुंगी पहने हुए किताबों की ढेर के बीच बैठकर कुछ लिख रहे थे.
वह अक्सर अपनी मां (ज्योत्सना मुखर्जी) से कहते थे : देखना मुझे एक दिन नोबेल जरूर मिलेगा. वह बताती हैं : जब डॉ मुखोपाध्याय ने आत्महत्या की थी, तो उन्होंने अपने सुसाइड नोट में लिखा था : हृदय ते वेदना सौज्जो ना कोरते पेरे चोले गेलम (हृदय की वेदना नहीं सहने के कारण इस दुनिया से विदा ले रहा हूं).
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