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आज भी ढेंकी से चावल कूट बनता है मकर संक्रांति का पीठा

Updated at : 02 Jan 2020 2:12 AM (IST)
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आज भी ढेंकी से चावल कूट बनता है मकर संक्रांति का पीठा

पानागढ़ : आधुनिकता की होड़ ने ढेंकी को अब काफी पीछे छोड़ दिया है. अब ग्रामीण अंचलों में ढेंकी का प्रचलन प्रायः ना के बराबर हो गया है. पुराने जमाने की यह घरेलू ढेंकी अब विलुप्ती की कगार पर पहुंच गई है. यह अब संग्रह की वस्तु बनती जा रही है. लेकिन इन सब के […]

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पानागढ़ : आधुनिकता की होड़ ने ढेंकी को अब काफी पीछे छोड़ दिया है. अब ग्रामीण अंचलों में ढेंकी का प्रचलन प्रायः ना के बराबर हो गया है. पुराने जमाने की यह घरेलू ढेंकी अब विलुप्ती की कगार पर पहुंच गई है. यह अब संग्रह की वस्तु बनती जा रही है. लेकिन इन सब के बावजूद आज भी पश्चिम बर्दवान जिले के कांकसा जंगलमहल के आदिवासी बहुल इलाकों में ढेंकी से मकर संक्रांति के उपलक्ष में जहां इसकी पूजा की जाती है.वहीं इससे चावल कूटने का काम किया जाता है.

आज भी परंपरागत रूप से कांकसा के जंगलमहल के सुदूर आदिवासी ग्रामीण इलाकों में इसका प्रयोग जारी है. विशेषकर मकर संक्रांति के मद्देनजर बंगाल में बनने वाले नए चावल से पीठे तथा अन्य सामग्रियों के उपयोग को लेकर उक्त ढेंकी से ही स्थानीय महिलाएं परंपरागत रूप से चावल कूटने का काम करती हैं. उक्त चावल से तरह-तरह के मकर संक्रांति में उपयोग होने वाले मिठाईयां तैयार की जाती हैं. इसका अद्भुत स्वाद आज भी लोग रहे हैं. कांकसा के कुलडीहा गांव निवासी वृद्धा मायारानी चट्टोपाध्याय बतातीं है कि अल्पायु में ही विवाह हो गया था.
मूल रूप से गांव में ही ससुराल था. जब भी मकर संक्रांति पर्व होता घर में ही मौजूद ढेंकी से चावल कूटने का काम चलता. उस दौरान इस ढेंकी का कितना महत्व था. प्रातः से ही मकर संक्रांति के 3 दिन पूर्व से ही ढेंकी पर चावल कूटने के लिए गांव की महिलाएं एकत्र हो जाती थीं. आपस में कंपटीशन लगता था कि कौन कितना चावल कूट सकता है. माया रानी बतातीं है कि ढेंकी से कुटे चावल से बनने वाले पीठों का स्वाद अलग ही होता था.
आज वह ढेंकी को देख कर कहती है कि अब बाज़ारों से चावल के पैकेट आ जाने से ढेंकी का अस्तित्व मिटने लगा है. उक्त गांव के सत्यनारायण बंधोपाध्याय बताते हैं कि विशेष रूप से मकर संक्रांति को लेकर गांव आए हुए हैं. इसका मूल कारण है कि ढेंकी से पारंपरिक रूप से कुटे चावल से पीठा तैयार कर ले जायेंगे. बताते हैं कि बाजारू पीठे में वह स्वाद नहीं मिलता है. जब तक ढेंकी से कुटे चावल के पीठे नहीं खा लेते तब तक उनका मकर संक्रांति पूरा नहीं होता. ढेंकी को देखने के लिए दुर्गापुर इस्पात की अनिंदिता पाल गांव आई हुई हैं.
अपनी दादी के पास वह ढेंकी से चावल कूटते हुए देखकर काफी प्रसन्न, काफी खुश है. इतना ही नहीं सेल्फी भी ले रही है .ढेंकी से बने पीठो में पौष्टिकता पर्याप्त रहती है. मिल की अपेक्षा ढेंकी से कुटे चावल के आटे की सुंगध मनमोहक बनी रहती है. और पकने के बाद स्वाद भी बेहतर होता है.
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