1947 में नहीं मिली वैचारिक, बौद्धिक आजादी

Updated at : 01 Oct 2018 3:17 AM (IST)
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1947 में नहीं मिली वैचारिक, बौद्धिक आजादी

आसनसोल : वरिष्ठ पत्रकार तथा भारतीय भाषाओं के संवर्धन के पक्षपाती राहुल देव ने कहा कि वर्ष 1947 में सिर्फ राजनीतिक आजादी मिली थी, वैचारिक और बौद्धिक आजादी नहीं मिली थी. देश की बहुप्रतिभाएं विदेशी भाषा के ज्ञान के अभाव में उपेक्षित ओर कुंठित हो रहे हैँ. वे रविवार को हिंदी भवन में आसनसोल नगर […]

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आसनसोल : वरिष्ठ पत्रकार तथा भारतीय भाषाओं के संवर्धन के पक्षपाती राहुल देव ने कहा कि वर्ष 1947 में सिर्फ राजनीतिक आजादी मिली थी, वैचारिक और बौद्धिक आजादी नहीं मिली थी. देश की बहुप्रतिभाएं विदेशी भाषा के ज्ञान के अभाव में उपेक्षित ओर कुंठित हो रहे हैँ. वे रविवार को हिंदी भवन में आसनसोल नगर निगम हिंदी अकादमी के स्तर से आयोजित सेमिनार को संबोधित कर रहे थे, जिसका विषय- ‘भारत को बचाना है तो भाषाएं बचाइये’ था.
मेयर जितेंद्र तिवारी, कोलकाता यूनिवर्सिटी के प्रो. अमरनाथ शर्मा, विधासागर यूनिवर्सिटी के डीन डॉ दामोदर मिश्र, काजी नजरूल यूनिवर्सिटी के डीन सह हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ विजय भारती, हिंदी अकादमी अध्यक्ष उमा सर्राफ, उर्दू अकादमी अध्यक्ष डॉ शाबरा हीना खातून, पार्षद बाच्चू रॉय चौधरी ने उदघाटन किया. संचालन अकादमी सचिव मनोज यादव ने किया.
श्री देव ने कहा कि जाति, धर्म, आर्थिक विभाजन से बड़ा विभाजन भाषा का है. अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को सर्वोपरि बतानेवालों की सोच को हास्यास्प्द और मुर्खतापूर्ण बताते हुए उन्होंने कहा कि जो लोग अपनी भाषा को नहीं जानते हैँ, वो कभी दूसरी की भाषा को सीख नहीं पायेंगे. अंग्रेजी के पीछे भाग कर भाषिक अपाहिज पैदा कर रहे हैं.
जो बड़े होकर बौद्धिक अपाहिज बन जायेंगे. उन्होंने हिंदीभाषियों को विश्वगुरू बताते हुए कहा कि पूरी दुनिया के देशों को भारत से अपेक्षाएं हैं, वह पाकिस्तान, बांगलादेश, अफ्रीका या अन्य से नहीं है. जिस संपन्नता, समृद्धता, प्रभुता को लूटने और खरीदने के लिए विदेशी भारत आते थे वह अंग्रेजों की देन नहीं है. वह संपन्नता भाषाओं ने विकसित की है. उन्होंने भारतीय भाषाओं के प्रति चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि अगर यही स्थिति रही तो दो पीढ़ी बाद भाषाएं समाप्त हो जायेंगी और गरीबों की भाषाएं बन कर रह जायेंगीं. उन्होंने लोगों से अपनी भाषाओं को पर गर्व करने और उन्हें बचाने का आग्रह किया.
मेयर श्री तिवारी ने कहा कि बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्य प्रदेश से रोजी-रोटी की उम्मीद में बंगाल आये हिंदी भाषी की तीसरी व चौथी पीढ़ी बदलती सोच के साथ बंगाल में ही रह रही है. पहले हिंदी भाषियों के प्रति यहां के मूल निवासियों की सोच कुछ और थी. सत्ता परिवर्तन के बाद सत्ता में शामिल लोगों और यहां के लोगों की सोच में परिवर्तन हुआ. उन्होंने कहा कि बिहार, यूपी के लोगों ने कोलियरियों, इस्पात कारखानों में काम कर यहां के औधोगिक उन्नयन में जिस स्तर का योगदान दिया
उस स्तर का योगदान हिंदीभाषियों ने मेधा के क्षेत्र में अधूरा है. पहले दिन विधालय एवं महाविधालय स्तरीय आयोजित प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया. आयोजित नौ प्रतियोगिताओं समूह गायन, एकल गायन, निंबंध लेखन, स्वरचित कविता, प्रश्नोत्तरी, कहानी लेखन आदि में सात सौ प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था. प्रत्येक श्रेणी से बेहतर प्रदर्शन करने वाले सात प्रतिभागियों कुल 45 को पुरस्कृत किया गया. बिजेंद्र कुमार, उदित नारायण, मुकेश झा, गौतम लांबा, मोहम्मद शमीम, राजकुमार आदि ने योगदान दिया.
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