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एसीआरए, एपीडीआर ने विभिन्न मुद्दों पर आयोजित किया जन-कन्वेंशन, फासिस्ट राजसत्ता डरती है सही सवालों से

Updated at : 24 Sep 2018 3:36 AM (IST)
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एसीआरए, एपीडीआर ने विभिन्न मुद्दों पर आयोजित किया जन-कन्वेंशन, फासिस्ट राजसत्ता डरती है सही सवालों से

आसनसोल : एपीडीआर से जुड़े मानवाधिकारकर्मी सुजात भद्र ने कहा कि फासिस्ट शासन में सवाल पूछने पर पाबंदी होती है तथा गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, बरबरा राव, सोमा सेन सरीखे मानवाधिकार कर्मियों की गिरफ्तारी का मूल कारण यह है कि वे इस राजसत्ता से सवाल पूछते हैं. वे स्थानीय गुजराती भवन में आसनसोल सिविल राइट्स […]

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आसनसोल : एपीडीआर से जुड़े मानवाधिकारकर्मी सुजात भद्र ने कहा कि फासिस्ट शासन में सवाल पूछने पर पाबंदी होती है तथा गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, बरबरा राव, सोमा सेन सरीखे मानवाधिकार कर्मियों की गिरफ्तारी का मूल कारण यह है कि वे इस राजसत्ता से सवाल पूछते हैं. वे स्थानीय गुजराती भवन में आसनसोल सिविल राइट्स एसोसिएशन तथा दुर्गापुर एपीडीआर की ओर से आयोजित जन-कन्वेंशन को रविवार को संबोधित कर रहे थे. इसमें चार प्रस्ताव पारित कर उनकी बिना शर्त्त रिहाई तथा तमाम काले कानूनों की वापसी की मांग की गई.
श्री भद्र ने कहा कि श्री नवलखा तथा अन्य मानवाधिकार कर्मियों ने काश्मीरी न होते हुए भी कश्मीर में सैन्य व पुलिस, जुल्मों के खिलाफ लगातार लेखनी चलाई है, यही कारण है कि उन्हें विगत 28 अगस्त से उनके ही घरों मे उन्हें नजरबंद रखा गया है. उन्होंने कहा कि बंगाल की जनता ने 70 के दशक की पुलिस जुल्म को देखा है कि कैसे एक युवा पीढ़ी को समाप्त कर दिया गया. सैकड़ों फर्जी मुठभेड़ किये गये. उन्होंने कहा कि मानवाधिकार किसी की हत्या की योजना बना ही नहीं सकते.
वे अन्याय का प्रतिवाद करने के लिए या तो सड़क पर उतरते हैं या फिर कोर्ट के समक्ष जाते हैं. इसके बाद वे अपनी कलम चलाते हैं. उन्होंने कहा कि कश्मीर में मानवाधिकारों का जो हनन हो रहा है, वह अन्यत्र नहीं दिखता. उसका राजनीतिक हल निकालना होगा, वहां की जनता का दिल जीतना होगा. लेकिन राजसत्ता सिर्फ बंदूक की भाषा इस्तेमाल कर रही है. फलस्वरूप स्थिति लगातार बगड़ती जा रही है.
उन्होंने कहा कि यही स्थिति असम की है. वहां के 41 लाख लोगों को झटके से गैर नागरिक घोषित कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि इस मामले में बांग्लादेश से बात होनी चाहिए, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना से इस मुद्दे पर कभी बात नहीं की. पौने तीन लाख लोगों को अपने साक्ष्य ही नहीं देने दिये गये. उनका क्या होगा.
उन्होंने कहा कि इस समय चुनौतियां काफी विकट हैं. मानवाधिकार हमेशा राजसत्ता के अत्याचारों का विरोध करते हैं, यही कारण है कि कोई राजनीतिक पार्टी उनका समर्थन नहीं करती. सिर्फ उनका उपयोग करती है. उन्होंने कहा कि राजसत्ता की शक्तियां किसी की मौत पर रोती नहीं है, बल्कि जश्न मनाती है तथा हत्या में शामिल शक्तियों को सम्मानित करती हैं. इस कारण इसके खिलाफ लगातार आंदोलन चलाना होगा.
फिल्म निदेशक सौमित्र दस्तकार ने कहा कि असम की स्थिति बेहद खराब है. उन्होंने ऐतिहासिक तथ्यों का जक्रि करते हुए कहा कि बंगाल के बड़े हिस्से को अंग्रेजों ने असम में मिलाया. इसके बाद विभिन्न राज्यों से लोग खेती करने वहां गये. इनके साथ ही बड़ी संख्या में मुशलमान खेती से जुड़े. उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई कि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी राज्य में घुस रहे हैं. इसके बाद कोर्ट ने इस संबंध में सर्वे करने का आदेश दिया.
अचानक 40 लाख सूचीबद्ध तथा एक लाख और यानी 41 लाख लोगों को गैर नागरिक घोषित कर दिया गया. 2.70 लाख लोगों को शामिल होने का भी मौका नहीं मिला. यानी 44 लाख लोगों का भविष्य खतरे में हैं. उन्होंने कहा कि कोर्ट ने 15 पहचान पत्रों की मान्यता दी थी, लेकिन उसे घटा कर 10 कर दी गई है तथा उसमें पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों को शामिल किया गया है. राशन कार्ड को हटा दिया गया है. उन्होंने कहा कि घुस पैठियों तथा शरणार्थियों में फर्क किया जाना चाहिए.
कश्मीर से आये तथा जामिया मीलिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर बशारत अली डार ने कहा कि कश्मीर की समस्या काफी जटिल होती जा रही है. राजसत्ता इस मामले को निष्पादित करना ही नहीं चाहती है. उन्होंने कहा कि काश्मीर की छवि देश के सामने कभी सही तरीके से रखी ही नहीं गई. फिल्मों में या को उन्हें जंगली कहा गया या फिर प्रकृति को दिखाया गया.
वहां की जनता के संघर्षो को कभी दिखाया ही नहीं गया. वहां की जनता की मनोभावों को समझने की कोशिश की नहीं की गई. पढ़ाई तथा रोजगार की सभी संभावनाएं समाप्त हो गई है. युवा पीढ़ी आक्रोशित तथा हताश है. इसके कारण आतंकी घटनाएं बढ़ रही है. जनता के साथ बात कर ही इसका हल निकाला जा सकता है.
कन्वेंशन को पीयूडीआर(दिल्ली) के आशीष गुप्ता, सीडीआरओ के तापस चक्रवर्ती आदि ने भी संबोधित किया. इसमें चार प्रस्ताव पारित किये गये. इनमें मानवाधिकार कर्मियों की बिना शर्त्त रिहाई, जन विरोधी कानूनों की वापसी, काश्मीर में जन भावना को देखते हुए वातचीत शुरू करने तथा फासिस्ट शक्तियों के खिलाफ लगातार संघर्ष के मुद्दे शामिल थे.
आयोजन में आसनसोल सिविल राइट्स एसोसिएशन की सचिव डॉ स्वाति घोष, सुमन कल्याण मल्लिक, जयन्त बसु, श्रमिक नेता सोमनाथ चटर्जी, दुर्गापुर एपीजडीआर के बाबूराम दास आदि सक्रिय थे. असीम गिरि, नीतीश राय तथा संदीपन मित्रा के नेतृत्व में रेडिकल कल्चरल टीम ने गीत-संगीत पेश किया.
राजसत्ता को सिर्फ कश्मीर की जमीन से लेना है : बशारत
आसनसोल. जेकेसीसीएस के नेता बशारत अली डार ने कहा कि यदि कश्मीर का दल सही तरीके से न निकला तो दस वर्ष के बाद स्थिति काफी भयावह होगी. निजी भेंट में उन्होंने कहा कि राजसत्ता को सिर्फ कश्मीर की जमीन से मतलब है. उसकी जनता से कुछ लेना-देना नहीं है. उन्होंने कहा कि देश के विभाजन के समय जो नीतियां तय हुई थी, उनके अनुसार तथा भौगोलिक कारणों से भी काश्मीर पाकिस्तान के काफी करीब था. तत्कालीन शासक कर्ण सिंह के खिलाफ भारी जन मानस था.
इसके बाद भी यदि काश्मीरी जनता भारत के साथ है तो इसकी सही समीक्षा होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि पूरे देश में जो आतंक तथा खौफ का माहौल हाल के चार वषोर् में बना है, वह माहौल में काश्मीर में पिछले सात दशकों से हैं. वहां सिर्फ सैन्य और आतंकवादी को ही दिखाया जा रहा है. काश्मीरी जनता के बारे में कुछ नहीं कहा जाता.
पीडीपी तथा भाजपा सरकार गठन के समय कहा गया था कि सभी संगठनों को अपनी बात रखने का मौका दिया जायेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि जनता के सामने सिर्फ दो विकल्प रखे गये हैं- भारत या पाकिस्तान. लेकिन तीसरा विकल्प भी है. इसे कभी गंभीरता से नहीं लिया गया.
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