सीइओ की तरह संसदीय क्षेत्र का प्रबंधन
पेशेवर कैरियर में सफल लोगों का राजनीति में बढ़ा दखल यह उदारीकरण के बाद का भारत है. इसमें विचारधारा और प्रतिबद्धता की जगह उत्पादकता और सफलता ने ले ली है. अब हर क्षेत्र में पेशेवर लोगों का बोलबाला है, चाहे फिर वह खेती हो या राजनीति. अपने देश में, विभिन्न क्षेत्रों में आये कुछ बदलावों […]
पेशेवर कैरियर में सफल लोगों का राजनीति में बढ़ा दखल
यह उदारीकरण के बाद का भारत है. इसमें विचारधारा और प्रतिबद्धता की जगह उत्पादकता और सफलता ने ले ली है. अब हर क्षेत्र में पेशेवर लोगों का बोलबाला है, चाहे फिर वह खेती हो या राजनीति. अपने देश में, विभिन्न क्षेत्रों में आये कुछ बदलावों को हम अपनी नयी श्रृंखला में ला रहे हैं. आज पढ़िए, राजनीति में आये बदलाव के बारे में.
एक समय था, जब नेता अपनी विचारधारा से पहचाने जाते थे. कोई कांग्रेसी, तो कोई जनसंघी. कोई सोशलिस्ट, तो कोई कम्युनिस्ट. इन नेताओं की बोली-भाषा, कपड़ा-लत्ता, रंग-ढंग भी अपनी पार्टी या विचारधारा के मुताबिक ढले होते थे, क्योंकि शुरुआत से ही वे इसी तरह प्रशिक्षित होते थे. अक्सर छात्र जीवन से ही उन पर राजनीति का रंग चढ़ चुका होता था.
लेकिन, अब भारतीय राजनीतिका चेहरा तेजी से बदल रहा है. राजनीतिक दलों में पेशेवर लोगों की तादाद बढ़ रही है. इनके लिए राजनीति वैसा ही एक पेशा है, जैसे किसी डॉक्टर, वकील या चार्टर्ड एकाउंटेंट का. ये अपनी राजनीति का संचालन किसी कंपनी के सीइओ की तरह करते हैं.
इस बार कोटा से सांसद बने, भाजपा के ओम बिड़ला को ही ले लें. 51 साल के बिड़ला पहले तीन बार विधायक रह चुके हैं. भारतीय जनता युवा मोरचा के कार्यकर्ता के रूप में राजनैतिक जीवन शुरू करनेवाले बिड़ला भावी सांसदों के सलाहकार हो सकते हैं और उन्हें चुनाव जीतने के गुर सिखा सकते हैं.
वह अपने मतदाताओं के जन्मदिन, शादी की सालगिरह, उनके यहां बरसी की पूरी जानकारी रखते हैं. यह सब वह अपने चुनाव प्रबंधन सॉफ्टवेयर की मदद से करते हैं, जिसका डाटाबेस और सॉफ्टवेयर वोटरों की नयी से नयी जानकारी देता रहता है. वह इन अवसरों पर अपने मतदाताओं को बधाई संदेश भेजते हैं, फोन करते हैं या खुद जाकर उन्हें शुभकामनाएं देते हैं.
इस बार आम चुनाव में निर्वाचित सांसदों में से 315 पहली बार सांसद बने हैं. छह नये सांसदों- अशोक गजपति राजू (टीडीपी, विजयनगरम), महबूब अली कैसर (लोजपा, खगड़िया), नागेंद्र सिंह (भाजपा, खजुराहो), अरका केशरी सिंह (बीजेडी, कालाहांडी), हेमेंद्र चंद्र सिंह (बीजेडी, कंधमाल) और कुंवर सर्वेश कुमार (बीजेपी, मुरादाबाद) का संबंध रजवाड़ों से है, लेकिन ये आम आदमी की तरह रहना पसंद करते हैं. दरअसल, आज का युवा चाहता है कि उसका नेता भी उसके बीच का ही आदमी लगे.
राजू को राष्ट्रीय राजनीति में आते ही नागरिक उड्डयन मंत्री बना दिया गया. अपने साधारण तौर-तरीकों के लिए जाने जानेवाले राजू हवाई अड्डे पर आम लोगों की तरह सुरक्षा जांच के लिए कतार में खड़े होते हैं और विमान तक आने-जाने के लिए बाकी यात्रियों के साथ बस में चढ़ते हैं.
आज की राजनीति में विचारधारा से ज्यादा चर्चा विकास मॉडल की होती है. जमीनी नेताओं से ज्यादा आकर्षण उन लोगों का है जो पहले अपने पेशेवर कैरियर में कोई बड़ी लकीर खींच चुके हैं. लोगों खासकर मध्यवर्ग को लगता है कि ये अपनी पेशेवर काबिलीयत का इस्तेमाल राजनीति में भी बेहतर ढंग से करेंगे.
‘विकास’ राजनीति का नया मंत्र बन कर सामने आया है. यही वजह है कि लोकसभा में इस बार पहली बार चुन कर आये सांसदों में से 15 ऊंचे सरकारी पदों पर रह चुके हैं.
पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह और पूर्व गृह सचिव आरके सिंह इनमें सबसे नामी हस्ती हैं. भाजपा में शामिल होने से पहले ये दोनों सेवानिवृत्त हो चुके थे, लेकिन सत्यपाल सिंह मुंबई पुलिस आयुक्त का पद छोड़ कर चुनाव लड़े. भाजपा के टिकट पर उन्होंने केंद्रीय मंत्री अजित सिंह को बागपत से हराया. उन्होंने पिछले दिनों लोकसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिये पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों के बकाये का मुद्दा उठाया.
इस बार संसद में अच्छी-खासी तादाद में कारोबारी भी चुन कर आये हैं. पहली बार चुने गये सांसदों में से 65 कारोबारी हैं. रवींद्र कुमार जेना (बीजेडी, बालेश्वर), के श्रीनिवास (टीडीपी, विजयवाड़ा) और कुंवर हरिवंश सिंह (अपना दल, प्रतापगढ़) जैसे नये सांसदों के पास राजनैतिक जीवन का कोई खास अनुभव नहीं है. जेना खनन व्यवसायी हैं तो श्रीनिवास ट्रांसपोर्टर हैं और हरिवंश सिंह रियल एस्टेट कारोबारी.
पहली बार बने 315 सांसदों में से 19 डॉक्टर, 31 वकील और 15 शिक्षक हैं. मनोरंजन जगत के पेशेवर प्रतिनिधियों की संख्या 12 है, जिनमें किरण खेर, परेश रावल, बाबुल सुप्रियो और मुनमुन सेन शामिल हैं. दिलचस्त बात यह है कि पहली बार के सांसदों में से सिर्फ सात ने राजनीति को अपना पेशा बताया है. असल में राजनेता खुद को सामाजिक कार्यकर्ता या किसान बताना पसंद करते हैं. 315 नये सांसदों में से 37 ने अपना पेशा सामाजिक कार्य बताया है.
(इनपुट : इंडिया टुडे)
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