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दुधवा टाइगर रिजर्व में चार बाघों की मौत मामले की जांच में नया मोड़, ग्रामीणों ने लोहे के कीलों को दिया दोष

Updated at : 13 Jul 2023 6:12 PM (IST)
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दुधवा टाइगर रिजर्व में चार बाघों की मौत मामले की जांच में नया मोड़, ग्रामीणों ने लोहे के कीलों को दिया दोष

दुधवा टाइगर रिजर्व में चार वयस्क बाघों-तीन नर और एक मादा-की मौत हो गई थी. इस घटना ने यूपी सरकार को जांच शुरू करने और जिम्मेदार अधिकारियों को ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर दिया था. अब जांच कमेटी के रिपोर्ट में जंगली बिल्लियों की गश्त और निगरानी में खामियां सामने आईं है.

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Lucknow : लखीमपुर खीरी स्थित दुधवा टाइगर रिजर्व में दो महीने के अंदर चार बाघों की मौत के मामले में गठित जांच कमेटी ने शासन को रिपोर्ट सौंप दी है. जांच कमेटी ने बाघों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के आधार पर उनके मौत की वजह का खुलासा किया है. एक वन अधिकारी ने बताया कि 21 अप्रैल, 2023 और 9 जून, 2023 के बीच चार वयस्क बाघों-तीन नर और एक मादा-की कथित रूप से विभिन्न कारणों से मौत हुई थी.

इस घटना ने यूपी सरकार को जांच शुरू करने और जिम्मेदार अधिकारियों को ट्रांसफर करने के लिए मजबूर कर दिया. जांच में पहली बार जंगली बिल्लियों की गश्त और निगरानी में खामियां सामने आईं थी.

बरेली मंडल के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि शव परीक्षण से पता चलता है कि मौतें प्राकृतिक कारणों से हुईं न कि किसी परिस्थितियां अथवा अन्य कारणों से हुई थी. अलग-अलग मामलों में अन्य बाघों से लड़ते समय चोट लगने से दो बाघों की मौत हुई थी. इस प्रक्रिया में अन्य बाघ घायल हो गए और ठीक होने की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं. ये झगड़े जंगली जानवरों के प्राकृतिक गुणों का हिस्सा थे. बाघ क्षेत्रीय हैं और अक्सर विवाद होते रहते हैं.

ऐसा प्रतीत होता है कि इन बाघों के बीच लड़ाई नर मादा में संबंध स्थापित करने अथवा इलाके पर कब्जा करने को लेकर हुई थी, परिणामस्वरूप झड़पें हुईं और अंततः चोट लगने के कारण मौतें हो गई. अधिकारियों के अनुसार अन्य दो बाघों की मौत संक्रमण के कारण हुई थी. जब बाघों की प्रतिरक्षा शक्ति कमजोर होती है तो वायरल संक्रमण से पीड़ित होते हैं.

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फील्ड स्टाफ और गश्त की कमी भी उजागर

वहीं, विशेषज्ञों का कहना है की बाघों के संक्रमण और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया, परिणामस्वरूप मौतें हुईं. सभी बाघ वयस्क थे और अपने चरम पर थे. साथ ही अपना वंश बढ़ाने के लिए आतुर भी थे. जांच रिपोर्ट में प्रशासन की कई खामियां भी उजागर हुईं. रिपोर्ट में टाइगर रिजर्व में फील्ड स्टाफ की कमी और गश्त की कमी को भी उजागर किया गया है.

वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा कि बाघों की मौतों के बाद से स्टाफ बढ़ाना प्राथमिकता है. कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने के लिए नए रेंज अधिकारियों का एक समूह नियुक्त किया गया है. हालांकि तुलनात्मक रूप से कम अधीनस्थ वन रक्षक हैं और रिक्त पदों को जल्द भरने का प्रयास किया जा रहा है.

200 से अधिक कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी

वर्तमान में टाइगर रिजर्व कुल कर्मचारियों की 40-45 प्रतिशत क्षमता पर काम कर रहा है. अधिकारियों ने कहा, हमें उम्मीद है कि पदों को भरने और बाघ अभयारण्य को कुशलतापूर्वक संचालित करने के लिए 200 से अधिक कर्मचारियों की भर्ती की जाएगी. टाइगर रिजर्व का हिस्सा दुधवा नेशनल पार्क फिलहाल मानसून के कारण बंद है. इसके बावजूद बाघों की सुरक्षा के लिए गश्त जोरों पर जारी है.

उद्यान की सीमाओं के चारों ओर लगाईं कीलें भी पहुंचाती हैं नुकसान

स्थानीय लोगों को संदेह है कि संक्रमण से मरने वाले बाघों को लोहे की कीलों से घायल किया गया था. दुधवा के आसपास रहने लोगों का कहना है कि वन अधिकारियों ने ग्रामीणों को संरक्षित क्षेत्र में प्रवेश करने से रोकने के लिए राष्ट्रीय उद्यान की सीमाओं के चारों ओर मोटी कीलें लगा दी हैं. अगर ये गलती से बाबू के पंजों पर अथवा शरीर के अन्य किसी भाग पर पड़ जाए तो उन्हें भी चोट पहुंचती है.

यह विशेष रूप से नए अभ्यस्त बाघों के मामले में हैं, जो नया इलाका बनाने के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में आते जाते रहते हैं. ऐसे दौर में बाघों के घायल होने की घटनाएं ग्रामीणों ने देखी हैं. राष्ट्रीय उद्यान के निकट एक गांव के निवासी भी इस बात पर सहमति जताते हैं कि ग्रामीणों और उनके जानवरों को बाहर रखने के लिए बिजली की बाड़ और अन्य सामग्रियों के साथ-साथ कीलों से बाघों को नुकसान पहुंचता है. जब ग्रामीणों के जानवर कभी-कभी एक दिन के लिए भी अकेले भटक जाते हैं, तो ये कीलें उनके पैरों में पाई जाती हैं.

हालांकि अधिकारियों का कहना है कि बाघों की आबादी को प्रभावित करने वाली ऐसी घटनाएं संभव नहीं हैं. बाघ शारीरिक रूप से मजबूत जानवर हैं और मुख्य रूप से वन क्षेत्रों तक ही सीमित हैं. ये कीलें जंगल के किनारों पर हैं और बाघ शायद ही कभी उन क्षेत्रों की ओर जाते हैं, क्योंकि वे किसी भी मानवीय दखलंदाजी से बचते हैं. ऐसी घटनाएं तेंदुए जैसे जानवरों के लिए संभव हो सकती हैं, जिनमें वन क्षेत्रों और शहरी या मानव आवासों के बीच घूमने की प्रवृत्ति होती है.

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Sandeep kumar

लेखक के बारे में

By Sandeep kumar

Sandeep kumar is a contributor at Prabhat Khabar.

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